अभिलेखों में प्राचीन भारत का धार्मिक इतिहास

By | October 10, 2020

अभिलेखों में प्राचीन भारत का धार्मिक इतिहास

प्राचीन भारतीय लेखों के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि अधिकांश अभिलेखों का प्रणयन धार्मिक भावना से प्रेरित है। राजाओं के अभिलेखों के प्रारम्भ में इष्ट देवता का ध्यान मिलता है। अनेक प्रलेखों के वर्ण्य विषयों में भी विशिष्ट देतों की विस्तृत चर्चा की गयी है। बहुसंख्यक लेखों के विषय भूमि-दान से संबंधित है। दान प्राप्त करने वाले वाहमणों के गोत्र, प्रवरों आदि का वर्णन इन लया में मिलते हैं। इस प्रकार विभिन्न युगों की धार्मिक अवस्था पर अभिलेख महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। उनसे निम्नांकित प्रमुख धर्मों से संबंधित विशेष जानकारी प्राप्त होती है।

बौद्ध धर्म चर्चा की गयी है। अशोक ने अपने प्रज्ञापन नैतिक प्रचार तथा धार्मिक सिद्धान्तों के प्रतिपादन हेतु उत्कीर्ण कराये थे। वह अपने हि ग्यारहवें शिलाप्रज्ञापन में लिखवाता है कि “ऐसा कोई दान नहीं है जैसा धम्म दानः ऐसी कोई मित्रता नहीं है जैसी धम्म के साथ मित्रता, ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं है जैसा धम्म के साथ सम्बन्ध। धर्म यह है कि दासों और सेवकों से अच्छा व्यवहार किया जाये, माता-पिता की भलीभांति सेवा की जाये, मित्रों, परिचितों, सम्बन्धियों, ब्राहमणों और श्रमणों को दान दिया जाये, जीवों की हिंसा न की जाये। ऐसा करने से मनुष्य को इस लोक में सुख मिलता है और परलोक के लिए भी वह अनन्त पुण्य प्राप्त करता है।

धम्म – प्रचार के लिये ही अशोक ने अपने धर्मलेख लिखाये और धर्ममहामात्रों की नियुक्तियां कीं। उसने धर्मयात्राएं प्रारम्भ की, विदेशों में दूत भेजे और स्तूपों, विहारों, स्तंभों आदि का निर्माण कराया। उसके वैराट स्तम्भलेख में बौद्धसाहित्य के अध्ययन का अनुरोध उपासकों से किया गया है। सारनाथ लघुस्तम्भलेख/ से प्रकट होता है कि अशोक संघ की एकता का प्रबल समर्थक था और संघ में फूट डालने वाले भिक्षुओं को संघ से निष्कासित कर देना आवश्यक मानता था।


मौर्यों के उत्तराधिकारी शुंग लोग वैदिक धर्म के उपासक होते हुए भी बौद्धधर्म के प्रति पर्याप्त सहिष्णु थे। उनके शासनकाल में भरहुत, मथुरा, बोधगया, सांची आदि में अनेक बौद्ध स्तूपों का निर्माण हुआ। भरहुत स्तूप के पूर्वी तोरण पर उत्कीर्ण एक लेख है, जिसमें शुंग नरेश धनभूति का उल्लेख इस प्रकार है :

सुगनं रजे रञो गागीपुतस विसदेवस-

पुतेन गोतिपुतस अगरजसपुतेन

वाछिपुतेन धनभूतिन कारितं तोरणं ।

( अर्थात् शुंगों के राज्य में वात्सीपुत्र राजा धनभूति के द्वारा, जो गार्गीपुत्र राजा विश्वदेव का पौत्र तथा गौप्तीपुत्र अंगराज का पुत्र था, तोरण लगवाया गया। )

इसी राजा धनभूति ने मथुरा में भी तोरणयुक्त स्तूप और रत्नगृह का निर्माण कराया। इसीप्रकार सांची स्तूप के दक्षिणी तोरणद्वार की सबसे ऊपरी बड़ेरी पर उत्कीर्ण अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसे सातवाहन वंशी राजा सातकर्णि के मुख्य स्थपति आनन्द ने दान में दिया।

उत्तर-पश्चिमी भारत पर शासन करने वाले अनेक यूनानी शासक बौद्धधर्म के समर्थक थे। उनमें से मेनेण्डर का स्थान सर्वोच्च है। उसकी कुछ ताम्रमुद्राओं पर धर्मचक्र का चिन्ह और “ध्रमिक” उपाधियां मिलती हैं। अनेक अभिलेखों से ज्ञात हुआ है कि भारत में बसे यूनानियों ने अपने बौद्ध-भिक्षुओं के लिए अनेक दान दिये। जुन्नर में इरिल नामक यूनानी ने अपने व्यय से बौद्ध भिक्षुओं के लिए दो जलाशयों का निर्माण कराया। यहीं एक अन्य यूनानी ने बौद्ध संघ को भोजन मंडप का दान किया। कार्ले के गुहालेखों में सिंहध्वज द्वारा धर्मदान का उल्लेख है। यवन धर्मदेव के पुत्र इन्द्राग्निदत्त ने नासिक की 17 वीं गुफा खुदवायी और उसके अन्दर चैत्यगृह तथा जलाशय बनवाये। हिन्द-यूनानी शासकों के अतिरिक्त पहलवों तथा तक्षशिला मथुरा एवं पश्चिम भारत के शक-क्षत्रपों ने भी बौद्ध धर्म की उन्नति में प्रभूत योगदान दिया।

कुषाण सम्राट कनिष्क प्रथम का राज्यकाल बौद्धधर्म के इतिहास में विशेष महत्व का है। उसके शासनकाल की एक बड़ी घटना चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन है। इस संगीति के बाद महायान सम्प्रदाय का उन्नयन हुआ। कनिष्क के शासनकाल में बहुसंख्यक लेख बौद्ध प्रतिमाओं की चौकियों पर उत्कीर्ण कराये गये। उसके द्वितीय राज्य वर्ष की बुद्धमूर्ति कौशाम्बी से तथा तृतीय वर्ष की सारनाथ से प्राप्त हुई है। सारनाथ प्रतिमा लेख में कनिष्क के प्रशासकों वनस्पर और खरपल्लान के नाम मिले हैं। कनिष्क के कुर्रम ताम-मंजूषा अभिलेख में बौद्धदर्शन के “प्रतीत्यसमुत्पाद” की चर्चा है। सातवाहन-नरेश वासिष्टीपुत्र पुलुमावि के नासिक गुहालेख से प्रकट होता है कि बौद्धों की भद्रायणीय शाखा को शासन की ओर से एक गुहा भेट की गयी। इसी प्रकार वाशिष्ठीपुत्र पुलुमावि के कार्ले गुहालेख से ज्ञात होता है कि महासंधिक शाखा को एक मण्डप प्रदान किया गया।


गुप्त सम्राट मुख्यतः भागवत या वैष्णव धर्म के अनुयायी होते हुए भी अन्य धर्मों के प्रति उदार थे। उनके समय में बौद्ध एवं जैन धर्मों का भी विकास हुआ। चन्दुगुप्त द्वितीय के सांची अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने आपकार्दव नामक एक बौद्ध मतावलम्बी को उच्च पद पर नियुक्त किया। आपकार्दव ने सांची स्थित महाविहार को पचीस दीनार दान में दिये।

इसके ब्याज से महाविहार में दीपक जलाया जाता था तथा पांच भिक्षुओं को : भोजन कराया जाता था। कुमारगुप्त प्रथम का मानकुंवर – प्रतिमालेख बुद्धों के प्रति नमस्कार से प्रारम्भ होता है। लेख में कहा गया है कि भिक्षु बुद्धमित्र द्वारा सम्यक् संबुद्ध भगवान् की- प्रतिमा महाराज श्रीकुमारगुप्त के शासनकाल में प्रतिष्ठापित की गयी। कुमारगुप्त द्वितीय के सारनाथ बुद्ध मूर्तिलेख137 एवं बुधगुप्त के सारनाथ बुद्ध प्रतिमालेख138 में क्रमशः बुद्ध की संज्ञाएं “शास्ता” और “शाक्य भिक्षु” दी गयी हैं।

गुप्तकाल के बाद सातवीं शती से बौद्धधर्म में व्रजयान का संवर्धन हुआ तथा पूर्व भारत में वह लोकप्रिय हुआ। पूर्व-मध्यकालीन अनेक राजवंशों ने धार्मिक सहिष्णुता के लिए और पाल शासकों ने बौद्ध-धर्म स्वीकार कर उसे विस्तार देने के लिये इस धर्म को आश्रय दिया। यही कारण है कि बिहार तथा बंगाल के अधिकांश लेख “ऊं नमो बुद्धाय” और “भगवन्त बुद्धं भट्टारकं” से प्रारम्भ होते हैं। गाहड़वाल नरेश गोविन्दचन्द्र की रानी कुमारदेवी ने सारनाथ में धर्मचक-जिन का जीर्णोद्धार कराया और वहीं बौद्ध भिक्षुओं के आवास हेतु एक विहार का निर्माण कराया। बंगाल के पाल शासक महिपालदेव के सारनाथ लेख में बुद्ध प्रतिमा-दान के साथ निम्नांकित बौद्ध मंत्र उत्कीर्ण है –

ये धर्मा हेतु प्रभवा हेतु स्तेषां तथागतो हयवदत।
तेषां च यो निरोधः एवंवादी महाश्रमणः ।। 5 ।।

पाल शैली के प्रायः बहुसंख्यक बौद्ध प्रतिमालेखों में उपर्युक्त मंत्र मिलता है। पूर्वी भारत के अतिरिक्त देश के अन्य क्षेत्रों में प्राप्त बहुसंख्यक प्रतिमाओं पर मुहरों आदि पर यह मंत्र लिखा हुआ मिलता है। कुछ पर अन्य पवित्र मंत्र भी मिलते हैं। धर्मपालदेव के खालिमपुर ताम्रपत्र और नारायणपाल के भागलपुरताम्रपत्र से प्रकट होता है कि दोनों शासक बुद्ध के परम उपासक होते हुए अन्य धर्मों के प्रति उदार थे। उन्होंने विष्णु और शिव मंदिरों को भी समान रूप से दान दिये।
जैन तथा आजीविक मत ई.पू. छठी शती में भगवान् महावीर द्वारा जैनधर्म के प्रचार के पश्चात् देश में इस धर्म का व्यापक प्रसार हुआ। अशोक के प्रज्ञापनों में इस मत के लिए “निग्रंथ” शब्द मिलता है। खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख ११ “नमो अरहतानं” से प्रारम्भ होता है। उसकी पटरानी के मंचपुरी – गुहालेख से विदित राता है कि उदयगिरि पहाड़ियों पर कलिंग देश के जैन भिक्षुओं के लिए गुहाओं का निर्माण कराया गया था। अभिलेखों से प्रमाणित होता है कि ई. सन् के आरम्भ से मथुरा में जैनधर्म का अधिक प्रचार हुआ। मथुरा के कंकाली टीला तथा अन्य स्थलों से बहुसंख्यक जैन प्रतिमाएं मिली हैं। मथुरा के आयागपट्ट लेख तथा जैन मूर्ति लेख146 प्रायः “नमो अरहतो वर्धमानस” से आरम्भ होते हैं।

मथुरा से कुषाण तथा गुप्तकालीन अनेक अभिलिखित सर्वतोभद्र प्रतिमाएं भी मिली है। जयदामा के पौत्र के जूनागढ़ प्रस्तर अभिलेख147 में जरा – मरण से मुक्त होकर कैवल्य ज्ञान प्राप्त ऐतिहासिक भारतीय अभिलेख विदिशा करने का उल्लेख है। इस अभिलेख से प्रमाणित होता है कि दूसरी शती ई. तक गुजरात में जैनमत का प्रसार हो गया था। कुषाणकालीन अनेक जैन प्रतिमाओं पर लेख प्राप्त हुए हैं, जो तत्कालीन जैन मत के प्रभाव का परिचय देते हैं। गुप्तकाल में जैनधर्म का विकास हुआ। 1989 ई. में विदिशा (म.प्र.) के समीप दुर्जनपुर में तीन अभिलिखित तीर्थकर प्रतिमाएं मिलीं। पहली आठवे तीर्थकर चन्द्रप्रभु की, दूसरी नवे पुष्पदन्त की और तीसरी किसी अज्ञात तीर्थकर की है। इन तीनों का निर्माण गुप्त सम्राट् रामगुप्त के शासनकाल में हुआ ।

उदयगिरि के एक गुहाद्वार पर कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल में शंकर नामक व्यक्ति द्वारा पार्श्वनाथ की प्रतिमा स्थापित किये जाने का उल्लेख एक अभिलेख में प्राप्त हुआ है। मथुरा से प्राप्त एक जैन तीर्थकर प्रतिमालेख से ज्ञात हुआ है कि कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल में गृहभित्रपालित की पत्नी, भट्टिभव की पुत्री, समाध्या ने उस प्रतिमा की स्थापना की। बुधगुप्तकालीन पहाड़पुर – ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि जैनाचार्य गुहनन्दि ने वटगोहली में एक जैन विहार स्थापित कराया। उक्त विहार में अतिथिशासा के निर्माण तथा अर्हत की पूजा हेतु ब्राह्मण नाथशर्मा और उसकी पत्नी रामी ने कुछ भूमि प्रदान की।

स्कन्दगुप्तकालीन कहौम-लेख से प्रकट होता है कि भट्टिसोम के पौत्र, रुद्रसोम के पुत्र भद्र ने पांच जिनेन्द्रों की प्रस्तरमूर्तियां स्थापित करायीं। उक्त तथा अन्य अभिलेखों से विदित होता है कि गुप्तकाल में जैनधर्म विकसित अवस्था में था। पूर्व-मध्ययुगीन अनेक राजवंशों ने सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता का व्यवहार किया। राजस्थान से उपलब्ध अभिलेखों से प्रकट होता है कि वहां जैनधर्म का व्यापक प्रचार था। चाहमान शासक सोमेश्वर के बिझौली प्रस्तर-अभिलेख से ज्ञात होता
है कि दिगम्बर मतानुयायी लोलाक ने तेइसवे तीर्थकर पार्श्वनाथ के एक मंदिर का निर्माण कराया। इस अभिलेख में ऋषभनाथ, शान्तिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ, वर्द्धमान आदि तीर्थकरों का उल्लेख किया गया है। एक परमार अभिलेख में ऋषभनाथ के मंदिर को अत्यन्त सुन्दर तथा पृथ्वी का भूषण कहा गया है।

चन्देलों के उत्कर्ष में जैनधर्म विकसित अवस्था में था। 954 ई. के खजुराहो मंदिर लेख155 में जैन मतानुयायी पाहिल के उपहारों का वर्णन है। उसने जिननाथ मंदिर को अनेक उद्यान भेंट किये। खजुराहो से प्राप्त तीन अन्य प्रलेखों में से दो में गृहपति-वंशी’ जैन भक्त पाणिधर का उल्लेख है। तीसरे अभिलेख में साधु द्वारा प्रदत्त एक जैन मूर्ति का वर्णन है।

खजुराहो के अतिरिक्त मध्यप्रदेश के तुमैन, थूबोन, चंदेरी, अहार, एक पपौरा आदि स्थानों के बहुसंख्यक जैन मूर्तिलेखों से इस युग में है कि जैनधर्म की लोकप्रियता सिद्ध होती है। दक्षिण भारत में चालुक्यों, शासन चोलों, और शिलाहारों के शासनकाल में बहुसंख्यक जैन मंदिरों तथा तथा प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। कर्नाटक में श्रवणबेलगोला, मूडबिदरी, कारकल आदि अनेक स्थानों में जैन अवशेषों की संख्या बहुत बड़ी है।

जब महावीर और बुद्ध अपने-अपने धर्मों का प्रचार कर रहे थे, लगभग उसी समय आजीविक सम्प्रदाय का अविर्भाव हुआ। अभि इस धर्म को लोकप्रिय बनाने का मुख्य श्रेय मंखलिपुत्त गोसाल को सात है। अशोक तथा उसके पौत्र दशरथ ने आजीविकों को संरक्षण क्रम प्रदान किया। अभिलेखीय प्रमाणों से प्रकट है कि इन दोनों ने इस भाग सम्प्रदाय के भिक्षुओं के लिए गुहाओं का निर्माण कराया।

वैदिक धर्म – मौर्ययुग के पश्चात शुंग-सातवाहनकाल में वैदिक धर्म का प्राधान्य हुआ। इस धर्म के पुनरुत्थान का कार्य न केवल शुंग राजाओं ने अपितु सातवाहन, इक्ष्वाकु आदि वंशों के शासकों ने किया। राजा सर्वतात के धोमुंडी प्रस्तर अभिलेख में इस शासक द्वारा एक अश्वमेधयज्ञ किये जाने का उल्लेख है। शुंग-शासक पुष्यमित्र ने दो अश्वमेध किये। सातकर्णि प्रथम तथा उसके वंशजो में से अनेक ने विविध वैदिक यज्ञ किये। कुपाण दि शासनकाल में वैदिक यज्ञों की स्मृति में स्थापित मथुग आदि स्थानों से अनेक स्तम्भलेख मिले हैं। उनसे विदित होता है कि वैदिक यज्ञों की परम्परा अक्षुण्ण थी और ब्राहमणों द्वारा इन यज्ञा का सम्पादन कराया जाता था। सातवाहना, शहराता, शक-क्षत्रपा एवं इक्ष्वाकु राजाओं के अभिलेखों में ब्राह्मणां को दिये जाने वाले दानों का वर्णन प्रचुरता से मिलता है। नहपानकालीन नासिक में देवताओं और ब्राहमणों को 16 गांव दान करने का तथा बहुसंख्यक ब्राह्मणों को वर्षभर भोजन कराने का वर्णन है।

गुप्त-युग तथा मध्यकाल में वैदिक यज्ञों के स्मारक यूप-स्तम्भी की स्थापना के उल्लख भारत में ही नहीं, इस देश के बाहर कंबुज में प्रचुरता से मिल है। वैष्णव मत वैष्णव मत को पांचरात्र तथा भागवत धर्म भी कहा गया है। ई.पू. दूसरी शती तक इस मत का प्रभाव भारत के बाहर यूनानी क्षेत्र तक फैल गया। बसनगर गरुड स्तम्भलख में प्रकट होता है कि यूनानी राजा ऐटिअल्काइडिस ( अतलिकित ) न तक्षशिला निवासी हेलियोदोर को विदिशा-शायक भागभट्र के दरबार में राजदूत के रूप में भेजा। उसने विदिशा म विणण मदिर के सामन का विकास हुआ।

एक गरुडध्वज स्थापित किया। उस पर अंकित लेख से ज्ञात हुआ है कि वह यूनानी शासक भागवत धर्मानुयायी था। हाल में यूनानी शासक अगायोक्लीज की एक प्रकार की मुद्रा पर वासुदेव विष्णु तथा बलराम की मूर्तियों का अंकन है। यह मुद्रा ई.पू. द्वितीय शती के मध्य की है। मुद्रा पर विष्णु का अंकन प्रायः उसी प्रकार है जैसा मल्हार (जि. बिलासपुर, म.प्र.) से प्राप्त विष्णु की प्रारंभिक शुंगकालीन मूर्ति का है। पहली शती ई.पू. से तीसरी शती ई. तक के कई अभिलेखिक प्रमाण वैष्णवधर्म की लोकप्रियता सिद्ध करते हैं। सातवाहन गजा सातकर्णि प्रथम तथा गौतमीपुत्र यज्ञ सातकर्णि के क्रमशः नानाघाट और चिन्नगंजाम अभिलेखों से ज्ञात होता है कि भागवत धर्म दक्षिण भारत में भी फैल चुका था और वहां पर्याप्त लोकप्रिय था।

गुप्तकाल में वैष्णवधर्म के प्रसार के अनेक अभिलेखीय प्रमाण उपलब्ध है। मुण्डेश्वरी ( शाहाबाद, बिहार) से प्राप्त एक खण्डित प्रस्तर अभिलख ज्ञात हुआ है कि दण्डनायक गामिभट ने श्रीनारायण के मंदिरों में विनीतेश्वर मठ का समावेश किया और उसके लिए दो प्रग्य चावल और एक पल तेल भेंट किया। लिपि के आधार पर यह लेख प्रारम्भिक गुप्तकाल का है।


चन्द्रगुप्त द्वितीय के प्रसिद्ध मंहगेली स्तम्भलख में विष्णु ध्वज स्थापित किये जाने का उल्लख है। मन्दगौर से प्राप्त नरवर्मा (404 ई.) के एक अभिलख में वासुदेव कृष्ण की अत्यन्त हृदयग्राही स्तुति की गयी है। चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री वाकाटक-साम्राज्ञी प्रभावतीगुप्ता के रिद्धपुर अभिलख का प्रारम्भ “जित भगवता” से होता है। इसी लेख में रामगिरिस्वामी का भी उल्लेख है। प्रभावती के पूना ताम्रपत्र में भगवान् (विष्णु) के लिए भूदान-अर्पण का उल्लेख है।

छठी से बारहवीं शती ई. तक के अभिलेखों से वैष्णव धर्म के प्रसार पर प्रभूत प्रकाश पड़ता है। वैष्णवभक्त राजाओं के अभिलख प्रायः “नमा – नारायणाय” “आ भगवते वासुदेवाय” या “वासुदेव भट्टारक” से प्रारम्भ होते है। अनेक अभिलखा में विष्णु के विविध म्पा के ध्यान गंचक ढंगों में वर्णित है।

शैवमत

मोहनजोदड़ा की कई मुहरों में प्रकट होता है कि सिंधुघाटी सभ्यता के लोग पशुपति तथा लिंग की पूजा करते थे। शिवपूजा के पुरातात्विक प्रमाण ग्पष्ट रूप से शृंगकाल से मिलने लगते हैं। भीटा (जि. इलाहाबाद ) का अभिलिखित शिवलिंग ई. पूर्व दूसरी।शती का है। उज्जयिनी के अनक शृंगकालीन सिक्का पर शिव के नीचे उस्भुज विविध रूप अंकित हैं। कुपाण-सम्राट् विम कैडफाइसेस के सिक्कों पर नंदी सहित त्रिशूलधारी शिव का अंकन है। शिव का परम भक्त होने के कारण इस शासक ने सिक्कों पर अपनी उपाधि “परममाहेश्वर” लिखायी। मथुरा से प्राप्त क्षत्रपकालीन एक शिलालेख में भगवान् शिव के देवकुल ( मंदिर ) तथा मूर्ति निर्माण का उल्लेख है ( मथुरा संग्रहालय, सं. 71.8)। विम कालीन पंजतर प्रस्तर अभिलेख में उत्तर-पश्चिमी भारत की महावन पर्वतमाला के के मोइक द्वारा “शिवस्थल” (शिव-मंदिर) के निर्माण का उल्लेख है। तक्षशिला-उत्खनन में सिरकप नामक स्थान से मार्शल को पहली शती ई.पू. की एक कांसे की मुहर मिली थी, जिसमें शिव की मूर्ति सहित बाहमी तथा खरोष्ठी लिपियों में “शिवरक्षितस” लेख अंकित था। पल्लव शासक
गोण्डोफनीज की मुद्राओं पर उनके नाम के साथ “देवव्रत” या “सुदेवव्रत” की उपाधि मिलती है। यहां देवव्रत का अर्थ “महादेव” का उपासक है। विम कैडफाइसेस के पश्चात् कनिष्क प्रथम से लेकर प्रायः अन्तिम कुपाण शासकों तक के सिक्कों पर शिव का अकन मिला है। इससे प्रमाणित होता है कि कुपाण शासक शैबधर्म के प्रति भक्ति रखते थे। कुपाणों के पराभव के बाद उत्तर भारत में भारशिव नागों का प्रभुत्व स्थापित हुआ। वे अपने कन्धों पर शिवलिंग वहन करते थे, इसलिये वे भारशिव कहलाये।

नागों के शासन में मथुरा, पद्मावती. विदिशा आदि स्थानों में शैवधर्म का बड़ा विकास हुआ। गुप्तकाल में शिव समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति170 में मिलता है। वहां पशुपति के जटाजूट सं गगा के निकलने का कथन है । चन्द्रगुप्त ठिनीय के मथुरा स्तम्भलख से ज्ञात होता है कि आर्य उदिताचार्य ने गुर्वायतन में अपने गुरु कपिल के गुरु उपमित की स्मृति में कपिलेश्वर और उपमितेश्वर नामक शिवलिंग मूर्तियों की स्थापना करायी। इसी सम्राट के उदयगिरि गुहालेख 72 से प्रकट होता है कि वीरसन नामक एक अधिकारी ने उदयगिरि (विदिशा ) में शम्भू के मंदिर के रप में एक गुहा का निर्माण कराया। कुमारगुप्त प्रथम के करमटाण्डा प्रस्तर लिग अभिलेख से विदित होता है कि गुप्तयुग में लांग शिव की धर्मयात्रा निकालते थे. जो “शिवद्रोणी” कहलाती थी। इस अभिलेख का प्रारम्भ “नमो महादेवाय” से हुआ है। गुप्त सम्राटी के सामन्त परिव्राजक गजाओं का शासन विन्ध्यक्षेत्र पर था।


उनके भी ताम्रपत्रलेख “नमो महादेवाय” और “स्वस्ति महादेव पादानुध्यात” से प्रारम्भ होते है।

गुप्तोत्तर काल में इस धर्म का वर्चस्व बहुत बढ़ा। हर्प के मधुवन ताम्रपत्र75 में हर्प को “परममाहेश्वर” (शिव का परमभक्त) और “महेश्वर के समान प्राणिमात्र पर अनुकम्पा करने वाला” कहा गया है। अनेक विदेशी शासकों पर शैव धर्म का बड़ा प्रभाव पड़ा। हूण नरेश भिहिरकुल शिव का भक्त था। बगाल का शासक शशांक और बलभी के मैत्रक राजवंशी शासक भी शिवभक्त थे।

चन्देल राजा धंग के शासनकाल से बुन्देलखण्ड क्षेत्र में शैवधर्म अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। वि.सं. 1059 का खजुराहो अभिलेख “ओं नमः शिवाय” की सामान्य स्तुति से प्रारम्भ होता है और शिव के रुद्र, दिगम्बर, शूलधर, महेश्वर और पशुपति-स्पों का वर्णन करता है। अन्य अनेक चन्देल शासक शवधर्मावलंबा थे। कलचुरिया में शेवधर्म अत्यधिक लोकप्रिय था। उसे कलचुरियों का “कुलधर्म” कहा जा सकता है। शंकरगण तृतीय को छोड़कर. त्रिपुरी के सभी शासक शैव थे। इस शाखा के
प्राचीनतम ज्ञात अभिलेख शैवधर्म से सम्बद्ध हैं।78 त्रिपुरी के कलचुरि शासकों ने “परम माहेश्वर” उपाधि धारण की थी।

उनके ताम्रपत्रों पर अभिषेक-लक्ष्मी के साथ-साथ शिव के वाहन नन्दी का भी अंकन मिलता है। लक्ष्मणराज द्वितीय ने अपने सामन्तां और सेना के सहित सोमनाथ पाटन में समुद्र स्नानकर भगवान सोमेश्वर की पूजा की तथा इस अवसर पर शिव के एक स्त्रोत की रचना की। युवराजदेव द्वितीय ने भी एक शिव-स्तोत्र की रचना की।

अभिलेखों से ज्ञात होता है कि कलचुरि राजाओं तथा नोहला-जैसी रानियों ने शैव मंदिरों, मृर्तियों तथा मठों के निर्माण में बड़ा योग दिया। उनके समय में शैव धर्म और दर्शन का असाधारण विकास हुआ। नारायणपालदेव के भागलपुर-ताम्रपत्र से विदित होता है कि पाल नरेश ने भगवान् शिव के एक सहस्त्र देवालयों का निर्माण कराया था। इसी प्रकार विजयसेन के देवपाड़ा अभिलेख से ज्ञात होता है कि प्रद्युम्नेश्वर (शिव) का एक विशाल मंदिर बनवाया गया। गुर्जर-प्रतीहार शासक बाउक की ग्वालियर प्रशस्ति में सिद्धेश्वर महादेव के उनुग मंदिर का अत्यन्त मनोरम वर्णन है।

अभिलेखों से ज्ञात होता है कि भोजदेव आदि कई परमार शासकों ने अपने राज्य में शिव के विविध नामों पर मंदिरों एवं बहुसंख्यक प्रतिमाओं का निर्माण कराया। दक्षिण में चालुक्यों, राष्ट्रकूटों तथा चोल शासकों ने शैवधर्म के अभिलेखों का महत्व विकास में बड़ा योग दिया।

पाशुपत तथा कापालिक

पाशुपत सम्प्रदाय के संस्थापक लकुलीश थे। उन्हें शिव का अट्ठाईसवां या अन्तिम अवतार माना जाता है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के मथुरा स्तम्भलेख में कपिलेश्वर और उपमितेश्वर की दा शिवलिंग मूर्तियों की स्थापना पाशुपत सम्प्रदाय के गुरु उदिताचार्य द्वारा की गयी। कुशिक नामक गुरु से प्रारम्भ होने वाली आचार्य परम्परा में उदिताचार्य को दसवां आचार्य माना गया है। डा. डी. आर. भण्डारकर184 ने कुशिक का अभिज्ञान शिव के परम शिष्य लकुलीश के चार प्रधान शिष्यों में से एक के साथ किया है। कुशिक के अतिरिक्त अन्य तीन शिष्य मित्र, गर्ग और कोरप्य थे। उन्होंने पाशुपत सम्प्रदाय में चार विभिन्न शाखाएं स्थापित की।

यदि उदिताचार्य से पूर्व के दस आचार्यों में से प्रत्येक के लिए 25 वर्ष का समय निर्धारित किया जाये तो पाशुपत सम्प्रदाय के प्रवर्तक लकुलीश का समय दूसरी शती ई. का पूवार्द्ध माना जा सकता राजस्थान में उदयपुर से लगभग 25 किलोमीटर उत्तर एकलिंग मंदिर के समीप एक अभिलेख185 में उल्लेख मिला है कि भृगु की आराधना से प्रसन्न होकर शिव ने भृगुकच्छ देश में एक लकुन्धारी पुरुष के रूप में जन्म लिया। इसी लेख में पाशुपत-योग के ज्ञाता, भरम, वल्कल और जटाधारी कुशिक आदि मुनियों का भी वर्णन है। गुजरात से प्राप्त एक अभिलेख में कहा गया है कि शिव भट्टारक लकुलीश के रूप में अवतरित हुए और लाट देश के कारोहण स्थल में रहे। कर्नाटक प्रदेश के सीर तालुका में हेमावती से प्राप्त 943 ई. के अभिलेख187 से ज्ञात होता है कि लकुलीश अपने नाम और सिद्धान्तों की रक्षा के लिए मुनिनाथ चिल्लुक के रूप में उत्पन्न हुए।

कलचुरि-साम्राज्य में शैवधर्म के पाशुपत सम्प्रदाय का विशेप प्रचार हुआ। गयाकर्ण के कलचुरि संवत् 902 तवर अभिलेख में दो पाशुपत आचार्यों का वर्णन है। अभिलेख में कहा गया है कि आचार्य भावतेजा समस्त आगमों एवं योगशास्त्र में निष्णात था। उसने पाशुपत योग का अभ्यास किया और न्याय तथा वैशेषिक शास्त्रों की व्याख्या की। उसका प्रथम शिप्य भावव्रह्म था.। वह नित्य तपस्या में रत रहता, केवल कौपीन धारण करता, भस्म पर सोता एवं भिक्षा में प्राप्त अल्प भोजन पर निर्वाह करता था। वह व्रह्मचर्य में दूसरा सनत्कुमार था और पतंजलि द्वारा निरुपित योग का अभ्यास करता था। भिक्षा से अजित स्वर्ण, अन्न एवं वस्त्रों का दानकर वह अभ्यर्थियों को तृप्त करता था, बुद्धिमान लोगों को स्नेह तथा मधुर वचनों से प्रसन्न करता और दुःख दूर करने के लिये सदैव धार्मिक कार्यों में रत रहता था, मान्यता थी कि उसने शिव का साक्षात्कार किया था और कलियुग में उसक-जैसा पाशुपत तपरवी मिलना कठिन था।

अपने हदय कमल में वह शिव का ध्यान करता तथा योगी होने के नातं मेत्री, मुदिता, करुणा एवं उपेक्षा का अभ्यास करता था। उसने भिक्षा से एकत्र धन से त्रिपुरी ( तेवर ) में एक शिवालय का निर्माण कराया।

पाल नरेश नारायणपाल के भागलपुर ताम्रपत्र 189 में पाशुपत साधुओं के निमित्त स्थान तथा औपधि के लिए दान का वर्णन है। शैवमत की दूसरी प्रमुख उपशाखा “कापालिक” का उल्लेख भी पूर्वमध्ययुगीन अभिलेखों में मिलता है। कापालिक सम्प्रदाय के अनुयायी नर-कपाल में भोजन करते, शरीर पर भस्म रमाते. भरम खाते, लगुड़ धारण करते, सुरापात्र रखते तथा उसमें स्थित भैरव की पूजा करते थे। कापालिक साधुओं के उपर्युक्त वर्णन से उनमें व्याप्त तान्त्रिक प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है।


उदयपुर-प्रशस्ति में कापालिक साधुओं के लिए मठ-निर्माण का वर्णन मिलता है। राजस्थान से प्राप्त एक बारहवीं शती के अभिलेख से भी उदयपुर क्षेत्र में कापालिक मत की लोकप्रियता प्रमाणित होती है।

शाक्त मत

वैण्णवमत के समान शैवमत में अनेक देवी-देवताओं का प्रवेश हुआ, जिन्होंने शिव-परिवार के सदस्यों का रूप धारण कर लिया। देवियों की कल्पना शिव-पत्नी के रूप में की गयी। शिव के साथ देवी को सम्बद्र करना तांत्रिक मत का प्रभाव है, जिसमें शक्ति और शिव को अभिन्न माना जाता है। पूर्वमध्यकालीन अभिलेखों में शक्ति के उग्र रूप में दुर्गा पूजा का वर्णन मिलता है। एक गुर्जर-प्रतीहार लेख महिपमर्दिनी देवी की प्रार्थना से आरम्भ होता है तथा वटयक्षिणी देवी के मंदिर शैवसाधुओं को सौपने का वर्णन करता है। एक अन्य अभिलेख193 में कांचनदेवी, सर्वमंगला और अम्बा के नाम मिलते है। देवियों के बहुसंख्यक नामों का पता अभिलेखों, शैव-शावत तांत्रिक ग्रंथो तथा अनेक पुराणों एवं शिल्प-ग्रन्थों से चलता है।

सातवीं शती से तांत्रिक प्रभाव का प्राबल्य बढ़ा। इसका ज्ञान मध्यकालीन साहित्य तथा कलाकृतियों के देखने से होता है।

सौर मत

सूर्य एक वैदिक देवता थे। ऐसे देवता की पूजा का प्रचलित रहना स्वाभाविक था जो आकाश में प्रतिदिन दृष्टिगोचर होता है। कुछ विद्वान् विष्णु के मूल में सूर्य को ही पाते हैं। अन्य लोगों का विश्वास है गुप्तकालीन सूर्योपासना का एक प्रमुख स्वरुप इस देश में ईरानी मग-पुजारियों के आगमन के बाद निश्चित हुआ ।

अनुश्रुतियों से ज्ञात होता है कि यह धर्म शकद्वीप ( पूर्वी ईरान ) से भारत आया। कुमारगुप्त प्रथम तथा बन्धुवर्मा के मन्दसौर से ज्ञात होता है कि लाट-निवासी तन्तुवायों की श्रेणी ने दशपुर में सूर्य मंदिर का निर्माण कराया और उसके क्षतिग्रस्त होने पर उन्होंने ही उसका जीर्णोद्धार कराया। स्कन्दगुप्त के इन्दौर तासलेख में देवविष्णु के दान का उल्लेख है, जो एक सूर्यमंदिर में दीप जलाने के लिये दिया गया। उच्चकल्प के महाराज सर्वनाथ के खोह ताम्रपत्र लेख से विदित होता है कि इस नरेश ने आश्रमक स्थित सूर्यमंदिर के लिए दान दिया। हूण नरेश मिहिरकुल के पन्द्रहवें शासनवर्ष में एक सूर्य मंदिर का निर्माण हुआ। वर्द्धनवंश के राज्यवर्द्धन प्रथम, आदित्यवर्द्धन, प्रभाकरवर्द्धन आदि शासक सूर्यभक्त बताये गये हैं। गुर्जर-प्रतोहारों के शासनकाल में टीकमगढ़ जिला के मढ़खेरा नामक स्थान पर सूर्य-मंदिर का निर्माण हुआ। पूर्व मध्ययुगीन राजवंशों के अभिलेखों में सूर्यपूजा हेतु दान देने के अनेक उल्लेख मिले है।

धार्मिक सहिष्णुता

प्राचीन भारतीय अभिलेखों के अनुशीलन से भारतीय राजाओं की धार्मिक सहिष्णुता पर प्रकाश पड़ता है। मौर्य सम्राट अशोक से लेकर 13वीं शती ई. तक के उत्तर तथा दक्षिण के नरेश धर्म सहिष्णु थे। अशोक के बारहवें शिलाप्रज्ञापन से ज्ञात होता है कि उसने अपने राज्य के निवासियों को यह उपदेश दिया कि वे बिना मतलब अपने सम्प्रदाय की प्रशंसा और दूसरों की निन्दा न करें। प्रसंग आने पर भी निंदा बहुत कम की जाये। ऐसा करने से अपने सम्प्रदाय की वृद्धि होती है और दूसरों का उपकार। इसी कथन को ध्यान में रखते हुए अशोक तथा उसके पौत्र दशरथ ने आजीविक मतानुयायी साधुओं के निवास हेतु गुहाओं का निर्माण कराया। शुंग-सातवाहन शासक वैदिक धर्मावलम्बी थे। तो भी उनके शासनकाल में भरहुत, सांची, बोधगया, अमरावती, आदि स्थानों में बौद्ध कला केन्द्र बहुत विकसित हुए। गौतमीपुत्र सातकर्णि के शासनकाल में भदावनीय बौद्ध भिक्षु संघ के लिए गुहाएं दान में दी गयीं।

मथुरा, विदिशा, अहिच्छत्रा, मल्हार आदि स्थली के प्राचीन विवरणों तथा वहां सुरक्षित कलावशेषों से प्रमाणित होता है कि प्राचीन भारत में विभिन्न धर्मावलंबी साथ-साथ रहते तथा अपने धर्मों का विकास करते थे। उत्तर पश्चिम भारत में शासन करने वाले अनेक यूनानी तथा शक-पहलव राजा बौद्धधर्म के पीपक थे।

कुपाण शासनकाल में बौद्धधर्म का प्रभाव क्षेत्र बढ़ा। तो भी, कनिष्क की मुद्राओं पर अंकित ईरानी, यूनानी और वैदिक देवी-देवताओं से सहज ही कल्पना की जा सकती है कि युग में पर्याप्त धार्मिक सहिष्णुता विद्यमान थी। गुप्त शासक मुख्यतः भागवतधर्म के उपासक थे। किन्तु उन्होंने अन्य धर्मों के प्रति पूरी सहिष्णुता प्रदर्शित की। हर्षवर्धन के पूर्वज सूर्य के उपासक थे। उसका बड़ा भाई बौद्धधर्म का अनुयायी था। स्वयं हर्ष शैव था। दक्षिण में कदंबों, पल्लवों तथा बादामी के चालुक्यों ने धार्मिक सहिष्णुता को जारी रखा।

पूर्व मध्ययुग में जेजाकभुक्ति के चन्देलों ने धार्मिक सहिष्णुता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। खजुराहो में शैव-शावत देवालयों के अतिरिक्त वैष्णव मंदिरों और जैन आयतनों का भी. निर्माण हुआ। बंगाल के पाल शासक स्वयं बौद्ध मतानुयायी थे, फिर भी, उन्होंने शैव और वैष्णव मंदिरों का निर्माण कराया तथा उनके निमित्त प्रभूत धन दान में दिया। गाहड़वाल राजा गोविन्दचन्द्र की रानी कुमारदेवी बौद्ध मतानुयायी थी। सारनाथ में उसने एक विहार बनवाया। राजा ने, स्वयं ब्राह्मण धर्म का अनुयायी होते हुए भी, जेतवन विहार को कई ग्राम दान में दिये। भुवनेश्वर, ललितगिरि, ऐहोले, पट्टदकल महाबलीपुर, ऐलोरा, कांचीपुरं, हलेबीड आदि के प्राचीन अवशेष भारतीय धार्मिक सहिष्णुता के ज्वलंत उदाहरण उपस्थित करते हैं।

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