अभिलेखों में प्राचीन भारत की सामाजिक स्थिति

By | October 10, 2020

अभिलेखों में प्राचीन भारत की सामाजिक स्थिति

भारतीय समाज में वर्णाश्रम धर्म की प्रमुखता थी। धर्मशास्त्रों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — ये चार प्रमुख वर्ण बताये गये हैं। अभिलेखों में वर्णाश्रम धर्मपालन की बात विशेषरूप से मिलती है। शासन या दान के प्रसंग में वर्णों का उल्लेख हुआ है। अशोक के प्रज्ञापनों में ब्राहमणों तथा श्रमणों को दान देना श्रेयस्कर बताया गया है ।

(ब्राह्मण समणानं साधुदानं ) । सातवाहन-नरेश स्वयं को “एक बम्हण” ( एक ब्राह्मण ) कहते हैं । गुप्तयुग के कई प्रलेखों में तीन वर्णों का उल्लेख है। गुप्तयुग के पश्चात् वर्णाश्रम धर्म में ढील आ गयी। इसीलिए संक्षोभ के खोह ताम्रपत्र, हर्षवर्द्धन के बांसखेड़ा ताम्रपत्र आदि में “वर्णाश्रम व्यवस्थापन प्रवृत्त” पद का उल्लेख मिलता है। वर्गों का संक्षिप्त वर्णन निम्नांकित है – ब्राहमण प्राक्-गुप्तयुगीन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि ब्राह्मण अपनी विटता, शुद्ध उच्चारण तथा सरल व्यवहार के कारण अन्य वर्गों से श्रेष्ठ माने जाते थे। गुप्तकाल में भी उनकी यह प्रतिष्ठा अक्षुण्ण रही। किन्तु बाद में गोत्रों, चरणों आदि में वृद्धि के कारण तथा जीविका-साधनों की विभिन्नता के कारण ब्राह्मणों का सम्मान कम होता गया ( “नाना गोत्रेभ्यश्चतुश्चरणवतुः श्रुति पाठकेभ्यः पंच शत संख्येभ्य बाहमणेभ्यः”) चन्देल-शासक परमर्दि के सेमरा-ताम्रपत्र में 35 गोत्रों के नाम मिलते हैं। ब्राह्मण लोग षट्कर्मों (यजन, याजन, अध्ययन, अध्यापन, दान, प्रतिग्रह) के अतिरिक्त जीविकोपार्जन-हेतु पौरोहित्य, मन्त्रित्व सेनापतित्व आदि के भी कार्य करने लगे। परिस्थितिवश उन्होंने स्थानान्तरण भी प्रारम्भ कर दिया। पूर्व मध्ययुग में पाल, चन्देल, परमार, गाहड़वाल आदि वंशों के शासन में जीविका उपार्जन हेतु ब्राह्मण बाहर से उनके राज्यों में आकर बस गये।

क्षत्रिय

अभिलेखों में क्षत्रियों के भी उल्लेख मिलते हैं। सातवीं शती ई. से विशेष सत्ता में आने के कारण वे समाज में अग्रणी हो गये और उनकी प्रतिष्ठा बढ़ गयी। उनके लिए “राजपुत्र” शब्द का प्रयोग प्रारम्भ हुआ। राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में मतभेद है। अभिलेखों से प्रमाणित होता है कि वे प्राचीन क्षत्रियों के वंशज थे। पूर्वमध्य युग के राजपूतों को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है
(1) शासक वर्ग, और (2) साधारण क्षत्रिय वर्ग। शासकों की श्रेणी में कुछ विदेशी जातियों का मिश्रप्प हुआ तथा कालान्तर में वे भी भारतीय समाज की अंग बन गयीं। एक कलचुरि-अभिलेख से ज्ञात होता है कि शासक लक्ष्मीकर्ण का विवाह हूण-राजकुमारी अवल्लदेवी से हुआ था। इसी प्रकार मेवाड़ के 953 ई. के एक अभिलेख में एक हूण सरदार को मंदिर प्रबन्ध समिति का सदस्य कहा गया है। साधारण श्रेणी के राजपूत लोग सैनिक का कार्य करते थे। युद्ध में मारे जाने पर शासन की ओर से उन्हें वृति प्रदान की जाती थी। एक चन्देल-ताम्रपत्र में इसके लिए “मृत्युक वृति” शब्द का प्रयोग किया गया है।

वैश्य

वर्गों में वैश्य तीसरे स्थान पर थे। उनका कार्य कृषि और पशुपालन था। अभिलेखों में इस वर्ग के लिए प्रायः ‘वणिक्” शब्द का प्रयोग मिलता है। व्यवसाय-व्यापार के अनुसार वणिक् कई श्रेणियों में विभक्त थे। सियादोणी अभिलेख में अनेक प्रकार की श्रेणियों का वर्णन किया गया है। स्थानीय व्यापारी घोड़ों या बैलगाड़ियों से सामान एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाते थे। वर्णाश्रम धर्म में शूद्रों का स्थान चौथा था। उनका कार्य द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) की सेवा करना था। अशोक के प्रज्ञापनों में “दास” शब्द मिलता है। उस समय शूद्र अस्पृश्य नहीं माने जाते थे।

चाण्डाल

दानपत्रों में प्रायः चाण्डालों का उल्लेख मिलता है। वे निम्नतम कोटि के थे। स्मृतियों में कहा गया है कि शूद्र को भी चाण्डालों का स्पर्श किया जल ग्रहण नहीं करना चाहिए। चीनी यात्री फाह्यान- लिखता है कि चांडाल नगर के बाहर रहते हैं तथा मांस-मदिरा का सेवन करते हैं।

कायस्थ

इस शब्द का प्रारम्भिक उल्लेख मथुरा के कुपाण-कालीन कतिपय अभिलेखों में मिलता है, जो महत्वपूर्ण है। पूर्व मध्ययुगीन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि कायस्थ लोग मुख्यतः लेखन-कार्य करते थे। प्रायः प्रशस्तियों के अन्त में “कायस्थेन लिखितं” वाक्य का प्रयोग किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि यह लेखकों का एक वर्ग था।

प्रतीकात्मक तस्वीर

आश्रम संस्था

धर्मशास्त्रों में द्विजों द्वारा आचरित जीवन के चार आश्रम कह गये है : ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास । कलचुरि कादिव के गढ़वा-ताम्रपत्र म इस प्रकार है –

“नीतेषु प्रमदावियोगविधिना प्राग्वटमबारिव्रत
साटै बन्धुतया गृहस्थ पदवीं कारागृहग्यापनात
वानप्रस्थपदं वनाश्रयवशात् भैक्षाच्चतिक्षो:स्थितिः ।।

प्रतीहार भोज के एक अभिलेख में आश्वलायन शाखा के एक विद्यार्थी (ब्रह्मचारी) का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार एक चाहमान अभिलेख में एक आजन्म ब्रह्मचारी का नाम मिलता है। विद्या समाप्त कर विद्यार्थी गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता था।

परिपक्व अवस्था में घर-संसार त्याग कर वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना विहित था। गुर्जर प्रतीहारवंशी तात नामक शासक संसार को नाशवान समझकर अपने अनुज को राज्य सौप जंगल चला गया। कलचुरि नरेश गांगेयदेव’ ने अपनी सौ रानियों के साथ प्रयाग में आत्म-विसर्जन किया। चन्देल शासक धंग ने सौ वर्ष की आयु पूर्णकर संगम में शरीर त्याग किया। संगम पर
मृत्यु-वरण को अत्यन्त पवित्र माना जाता था।

बहुपत्नीत्व

अभिलेखों से विदित होता है कि प्रजा एक पत्नीव्रत का पालन श्रेयस्कर मानती थी। राजघराने तथा अन्य संभ्रात वर्ग इसके अपवाद थे। प्रतीहार-नरेश हरिश्चन्द्र की दो पलियां थीं। गाहड़वाल नरेश गोविन्दचन्द्र ने पांच राजकुमारियों से विवाह किया। सबसे रोचक उदाहरण गांगेयदेव कलचुरि का है, जिसके एक सौ विवाहों का उल्लेख मिलता है।

सती प्रथा

प्राचीन भारत में सती प्रथा के उल्लेख स्मृतियों तथा अन्य ग्रन्थों में मिलते हैं। इस प्रथा का एक उल्लेखनीय आभिलेखिक प्रमाण एरण (जि. सागर) से प्राप्त 510 ई. के भानुगुप्त के स्तम्भलेख में मिला है। मध्यकाल में यह प्रथा मध्यप्रदेश तथा राजस्थान में बहुतं प्रचलित हो गयी। इन क्षेत्रों में बहुसंख्यक सती स्तम्भ मिले हैं। अधिकांश अभिलेख अभिलिखित हैं।

गणिका

प्राचीन भारतीय नागरिक सभ्यता में गणिकाओं का विशेष अस्तित्व था। उनके साथ संगीत, मदोत्सव आदि का सम्बन्ध था। संगीत, नाट्यादि आयोजन “समाजों” में होते थे। इनके प्रचुर वानि प्राचीन साहित्य में उपलब्ध हैं। मौर्य शासक अशोक ने अपने प्रज्ञापनों में प्रजा को “समाजों” से दूर रहने को कहा है। गीत गाती हुई या नृत्य करती हुई प्रमदाओं का अंकन प्राचीन कला में बहुलता से प्राप्त है। अभिलेखों में भी उनके वर्णन यत्र-तत्र मिलते है। देवपारा प्रशस्ति13 में अप्सराओं का वर्णन सामन्तसेन का यशगान करते हुए किया गया है। तेजपुर ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि भूदान में ग्राम की गणिका भी दान-प्राप्तकर्ता को सौंप दी जाती थी। 12 वीं शती के एक चाहमान-अभिलेख से प्रकट होता है कि वेश्याओं पर कर लगाया जाता था। इस प्रकार गणिकाएं समाज की एक महत्वपूर्ण अंग थीं।

अभिलेखों में वस्त्राभूषण के भी उल्लेख है। अशोक के कौशाम्बी, सांची और सारनाथ स्तम्भलेखों में कहा गया है कि वस्त्राभूषण संघ में फूट डालने वाले पीत वस्त्रधारी भिक्षु या भिक्षुणी को श्वेतवस्त्र पहनाकर संघ से बहिष्कृत कर दिया जायगा। इस तथ्य से प्रकट होता है कि गृहस्थ श्वेत और भिक्षु पीले वस्त्र धारण करते थे। क्षहरात शासक नहपानकालीन नासिक गुहालेख” और वैन्यगुप्त के गुणधर तासपत्र में भिक्षुओं के लिए चीवर देने का उल्लेख मिलता है। गुप्तकाल तथा मध्यकाल के अनेक अभिलेखों में वस्त्राभूषणों के रोचक विवरण उपलब्ध हैं। कुमारगुप्त प्रथम तथा बन्धुवर्माकालीन मन्दसौर के मालव सं. 493 और 529 के प्रसिद्ध शिलालेख में रेशम के व्यापारियों ने अपने मुलायम सुन्दर वस्त्र का विज्ञापन बड़े रोचक ढंग से किया है। साथ ही तरुणियों के प्रिय सुवर्णहार, पान, पुष्पमंडन का भी कथन है।

श्रृंगार-प्रसाधन में बाल-संवारने, सिन्दूर लगाने और अंजन लगाने के उल्लेख पुरालेखों में स्फुट रूप से प्राप्त हैं। महेन्द्रपाल की पहेवा प्रशस्ति में स्त्रियों के सीधे बालों का वर्णन है क्योंकि वे विधवा हो गयीं थी। चन्देलों के खजुराहो अभिलेख से विदित होता है कि सौभाग्यवती स्त्रियां कुंकम का प्रयोग करती थी। आंखों में अंजन लगाने का वर्णन धनिकनगर लेख में मिलता है।

खानपान

मथुरा से प्राप्त कुषाणकालीन “पुण्यशाला” अभिलेख में ब्राह्मणों तथा दीनजनों को भोजनदान का रोचक वर्णन है। नहपानकालीन गुहालेख में ब्राह्मणों के भोजनार्थ सोलह ग्रामों के दान का वर्णन है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के सांची प्रस्तर अभिलेख में भिक्षुओं के भोजन के लिए पचीस दीनार दिये जाने का उल्लेख है। छठी शती ई. से अभिलेखों में निःशुल्क भोजन वितरण के स्थान के लिए सत्र शब्द का प्रयोग होने लगा। कुमारगुप्त प्रथम के बिलसद-लेख में धर्मसत्र, पाल शासकों के नालन्दा और
भागलपुर ताम्रपत्रों में सत्र तथा चाहमान ताम्रपत्रों में “अन्नसत्र” की चर्चा है। आठवीं शती के नालन्दा ताम्रपत्र में भोजन में घी दूध, दही आदि का विवरण मिलता है। भगवान् के भोग के लिए अन्न से नैवेद्य तैयार किया जाता था। इसके लिए दो सेर आटे में आठ कलश घी की आवश्यकता पड़ती थी।

गन्ना की प्रचुर खेती होने से गुड़ और शर्करा बनते थे। खाने के अतिरिक्त तेल और घी का प्रयोग मंदिर में दीपक जलाने के लिए होता था। गाहड़वाल अभिलेखों में “समत्स्य” शब्द का प्रचुरता से प्रयोग हुआ है, जिससे ज्ञात होता है कि कुछ लोग मत्स्याहारी थे।

“किराउडजा” (किराना) शब्द का प्रयोग प्रकट करता है कि भोजन में मसाले का इस्तेमाल होता था। पेय पदार्थों में सुरापान तथा रसवती या ताड़ी पान व्यापक रूप से प्रचलित था। बाउक के जोधपुर अभिलेख2 से ज्ञात होता है कि राजा हरिश्चन्द्र की दो रानियों में से एक ब्राह्मण कुल की और दूसरी राजपूत कुल की थी। राजपूत कन्या से उत्पन्न सन्तान सुरापान करती थी। भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में स्त्रियों द्वारा मद्यपान की चर्चा है। पूर्व मध्ययुग के दानपत्रों में आम तथा महुआ वृक्षों के साथ ग्रामदान किया जाता था। महुआ से शराब तैयार की जाती होगी। लेखों के आधार पर इस युग में मदिरा का प्रयोग लोकप्रिय था। कलचुरि अभिलेखों में “रसवती” शब्द मिलता है। यह एक प्रकार की ताड़ी थी जिसका सेवन निम्नवर्ग के लोग करते थे। शराब बनाने तथा बेचने वालों के नाम “कल्लपाल” आदि मिले हैं। मद्यभाण्डों की संख्या के अनुसार कल्लपालों से कर वसूल किया जाता था।

अन्ध विश्वास

किसी न किसी रूप में अन्धविश्वास समाज में सदा प्रचलित रहे है। अभिलेखों से भी इस सम्बन्ध में कुछ जानकारी मिलती है। अशोक के प्रज्ञापनों में परलोक में सुख मिलने की बात कही गयी है। शिलाप्रज्ञापन संख्या में “तुच्छ और निरर्थक कर्मकाण्डों की निन्दा की गयी है। गुप्त अभिलेखों में “आवाताय” की समता “भूतवास प्रत्याय” से की गयी है। यह एक प्रकार का कर था, जो भूत या वात के प्रभाव को झाड़फूंक कर समाप्त करने वालों से लिया जाता था। पूर्व-मध्ययुगीन अभिलेखों में स्वर्ग, नरक, राहु द्वारा सूर्य तथा चन्द्र ग्रहण, भूत-प्रेत आदि के उल्लेखों से विदित होता है कि तत्कालीन समाज पर इनका प्रभाव था। कुप्रभाव को कम करने हेतु राजाओं ने प्रायः सूर्य या चन्द्र ग्रहण के अवसर पर भूमिदान किये। चन्देल और गाहड़वाल प्रशस्तियों में भूत-प्रेत की चर्चा अधिक हुई है।

गाहड़वाल-नरेश गोविन्दचन्द्रदेव के दरबार में एक भविष्यवक्ता रहता था, जो असगुनों का फल बताया करता था। इसी प्रकार बंगाल से प्राप्त वेलवा और सुन्दरवन ताम्रपत्रों में घर से भूत हटाने के लिए गुनियों की नियुक्तियों का उल्लेख मिलता है।

उत्सव-मेले

राजतिलक, विवाह, विजय आदि के अवसरों पर उत्सवों के विशेष आयोजन होते थे। उनमें नाटको तथा संगीत का प्रमुख स्थान रहता था। अशोक के अभिलेखों में “समाज” शब्द विशेष अर्थ में व्यवहृत हुआ है। साधारण समाजो की निन्दा की गयी है तथा साधु मत समाजों की प्रशंसा। अशोक के साधुमत समाजों के स्थान पर खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख में संगीतमय समाजों का उल्लेख है। इस प्रकार के समाजों का मुख्य उद्देश्य प्रजा के विविध वर्गों का मनोरंजन करना था। गुप्त नरेश संगीत तथा नाटक के विशेष प्रेमी थे। 44egfdvbfbdfbf

गुप्तकालीन

साहित्य, अभिलेखों तथा गुप्त सम्राटों की मुद्राओं से इसकी पुष्टि होती है। छठी शती ई. से अभिलेखों में धार्मिक तथा सामाजिक उत्सवों का वर्णन बहुलता से मिलता है। इन उत्सवों में दीपोत्सव तथा वसन्तोत्सव महत्वपूर्ण है। रथयात्रा आदि धार्मिक अवसरों पर शासन की ओर से व्यापारियों पर कर लगाया जाता था अभिलेखों में पशु-मेलों के भी विवरण मिलते हैं। पूर्वी पंजाब के एक लेख में पशु मेला में घोड़ों की बहुलता का उल्लेख है। प्रतीहार शासक भोज की प्रशस्ति में “घोटकयात्रा” का वर्णन है जिसमें दूर-दूर के व्यापारी घोड़ा खरीदने आया करते थे। सिंध, पंजाब तथा राजस्थान में पशु मेलों के विशेष आयोजन किये जाते थे।

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