अभिलेखों में प्राचीन भारत की शिक्षा एवम कला

By | October 10, 2020

अभिलेखों में प्राचीन भारत की शिक्षा एवम कला

प्रारम्भिक अभिलेखों में शिक्षण से सम्बन्धित जानकारी का अभाव है। जिससे यह ज्ञात होता है कि शिक्षा केन्द्रों का विकास परवर्ती है। प्रारम्भ में अध्यापक व्यक्तिगत रूप से शिक्षा देते थे। कालान्तर में गुरु के घर ने ही गुरुकुल का रूप ले लिया। दूसरी शती ई. के बहुसंख्यक नासिक अभिलेखों में भिक्षुओं के चीवर तथा भोजन के निमित्त अग्रहारों के दान का वर्णन मिलता है। महावग्ग से विदित होता है कि शिक्षण कार्य गुहाओं में होने लगा था। तदुपरान्त तक्षशिला, काशी, पाटलिपुत्र, कन्नौज, मिथिला, धारा आदि नगरों में विश्वविख्यात शिक्षा केन्द्रों का जन्म हुआ।

नालन्दा महाविहार

अभिलेखों से नालन्दा के महान् शिक्षा केन्द्र पर प्रकाश पड़ता है। एक पूर्व मध्ययुगीन अभिलेख में यहां के विहारों को गगनचुम्बी बताया गया है। इनमें भिक्षु तथा विद्यार्थी निवास करते थे, जहां उनके भोजन, निवास तथा चिकित्सा की समुचित व्यवस्था थी। विश्वविद्यालय को प्रभूत राशि तथा भूमि दान में मिलती थी। पाल नरेश देवपाल के ताम्रपत्र से प्रकट होता है कि जावा नरेश ने यहां दो विहार बनवाये थे। देवपाल ने यहां के विद्यार्थियों के भोजन तथा औषधि हेतु दान दिया था।

काठियावाड़ का वलभी भी शिक्षा का एक विख्यात केन्द्र था। यहां के स्नातक उच्च पदों पर आसीन होते थे। अपनी ख्याति के ही कारण यह विद्यापीठ उत्तर भारत तक के विद्यार्थियों को आकर्षित करता था। यहां का मैत्रक राजवंश साधारण व्यय के अतिरिक्त पुस्तकों के लिये भी विशेष अनुदान देता था।

उपर्युक्त विद्याकेन्द्रों के अतिरिक्त बहुत से छोटे विद्यापीठ थे जो स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। 12 वीं शती में दक्षिण अरकाट जिले में एन्नारियरम् विद्यापीठ तथा चिंगलपुट के व्यंकटेश पेरुमल विद्यालय महत्वपूर्ण संस्थाएं थी। यहां विद्यार्थियों को खाद्य सामग्री निः शुल्क प्रदान की जाती थी। आचार्य योगेश्वर पंडित के शिष्यों को शिक्षा तथा भोजन के लिये 1200 एकड़ भूमि दान में दी गयी थी। इस प्रकार प्राचीन अभिलेखों से शिक्षा केन्द्रों, छात्रावासों, भोजनवस्त्र, पुस्तक और औषधादि व्यवस्था पर समुचित प्रकाश पड़ता है।

अध्ययन के विषय

अभिलेखों में अध्ययन और अध्यापन से सम्बन्धित उल्लेख प्रसंगवश ही मिलते हैं। ताम्रपत्रों में प्रायः दानग्राही की विद्वता तथा उसके द्वारा अधीत विषयों का वर्णन किया गया है। इस प्रकार के उल्लेख मौर्योत्तर काल के बाद से प्राप्त होते हैं। कनिष्ककालीन सारनाथ बुद्ध प्रतिमालेख में भिक्षु के नाम के आगे “त्रैपिटकस्य” शब्द उत्कीर्ण है जिससे पता चलता है कि त्रिपिटक साहित्य का अध्ययन किया जाता था। पूर्व मध्यकालीन अभिलेखों से प्रकट होता है कि वेद, वेदांग, दर्शन, उपवेद तथा इतिहास आदि विषयों का अध्ययन किया जाता था। चाहमान अभिलेखों में यजुर्वेद के अनुसार यज्ञ करने का विवरण मिलता है। इसी से मिलता-जुलता वर्णन बंगाल के सेन अभिलेखों में प्राप्त होता है।

अतः प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण उत्तरी भारत में वेदों का अध्ययन होता था। इस समय के अभिलेखों में वेदों की निम्नांकित शाखाओं का वर्णन मिलता है-

(1) ऋग्वेद की शाखायें – आश्वलायन, शांखायन
(2) शुवल यजुर्वेद – माध्यन्दिन, काण्व तथा वाजसनेय
(3) कृष्ण यजुर्वेद – मैत्राविणी, कठ, तथा तैत्तिरीय
(4) सामवेद – कौथुमी व राणायनीय
(5) अथर्ववेद – पिप्लाद

अधिकतर ब्राह्मण तीन वेद ही पढ़ते थे। बंगाल के अभिलेखों में वेद, वेदांग में पारंगत ब्राह्मणों के नाम मिलते हैं।गोविन्दपुर ताम्रपत्र में वेदांग के छः विषयों का वर्णन इस प्रकार किया गया है —

सकल्पप्रवणाः श्रुति प्रणयिनः शिक्षाभिरुद भासिताः
सज्जयोतिषगतियो निरुक्त विशदाश्छन्दों विधौ साधवः
ख्याता व्याकरण क्रमेण विदुषामत्युच्यथि शीलना
छेदांग प्रतिमाः षडेव भुवनेते विभ्रति भ्रातरः ।

उपर्युक्त विवरण से ज्ञात होता है कि व्याकरण और ज्योतिष का अध्ययन अत्यन्त आवश्यक था। ज्योतिष के पंडित को नैमित्तिक की संज्ञा दी गयी है। गाहड़वाल लेखों में उसकी गणना महत्वपूर्ण कर्मचारियों में की गयी है। भुवनेश्वर लेख में ब्राह्मण को सिद्धान्त, तंत्र, फलसंहिता तथा व्याख्या का पंडित बताया गया है। बंगाल की एक प्रशस्ति में दामोदर शर्मा को ज्योतिष के पांच सिद्धान्तो-पुलिश (पौलिश ), रोमक, वशिष्ठ, सूर्य (सौर ) तथा पितामह (पैतामह)” का ज्ञाता बताया गया है।

अन्य चार कल्प-निरुक्त, शिक्षा और छन्द का नाम प्रायः अभिलेखों में नहीं मिलता। अध्ययन के अन्य विषयों में षडदर्शन-न्याय, मीमांसा, सांख्य, योग, वैशेषिक और वेदान्त–अधिक प्रचलित था। उपवेदों में गान्धर्ववेद, आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की चर्चा स्फुट रूप से मिलती है। गुप्तकाल में गान्धर्ववेद की विशेष उन्नति हुई। प्रयाग प्रशरित में समुद्रगुप्त को गन्धर्व-विद्या में नारद और तुम्बरु को करने वाला कहा गया है। कुमारगुप्त के मन्दसौर अभिलेख अनुसार पट्टवाय श्रेणी के लोग गन्धर्व तथा धनुर्विद्या में पारंगत थे। धनुर्विद्या की शिक्षा केवल राजपरिवारों तक ही सीमित थी।

तो भी, साधारण जनता की रुचि इस ओर रही हेगी। प्रयाग प्रशस्ति में परशु-शर-शंकु आदि शस्त्रास्त्रों का उल्लेख मिलता है। आयुर्वेद की शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाता था। अशोक ने अपने तथा पड़ोसी राज्यों में मनुष्यों तथा पशुओं के चिकित्सा की व्यवस्था की थी। गाहड़वाल अभिलेखों में “भिपंग” चन्देल लेखों में “वैद्य” और पाल लेखों में “भैषज्य” शब्दों का प्रयोग किया है जिससे प्रमाणित होता है कि वैद्य आयुर्वेदिक पद्धति से चिकित्सा करते थे।

कला

अभिलेखों से कला और वास्तु के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी मिलती है। इनमें वास्तुकला, मूर्तिकला, ढालना और उत्कीर्ण करना उल्लेखनीय है। प्राचीन भारत में बड़ी संख्या में मंदिर तथा प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। सांची स्तूप की वेदिका पर अनेक दानकर्ताओं के नाम तो मिलते हैं किन्तु स्तूप के शिल्पियों और कारीगरों के नाम नहीं मिलते। गुप्तयुग तथा उसके बाद से भूमिदान या ग्रामदान के लिये तामशासनों का प्रयोग किया गया। ये शासन दानग्राही के वंशज के लिये आवश्यक राजकीय आज्ञापत्र थे जिसके आधार पर दानग्राही के उत्तराधिकारी उस दान का उपभोग वंश-परम्परानुसार करते थे। ताम्रशासन पर अभिलेख उत्कीर्ण करने की कला सबको ज्ञात न थी। चूंकि यह एक महत्वपूर्ण कार्य था, इसलिये तामफ लेखक की नियुक्ति का विशेष महत्व था। ताम्रपत्रों में उन्हें “शासनिक” और “धर्मलेखी” कहा गया है।

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