अभिलेखों में प्राचीन भारत की भाषाएँ व सामान्य गणित और अन्य विषय

By | October 10, 2020

अभिलेखों में प्राचीन भारत की भाषाएँ व सामान्य गणित और अन्य विषय

पालि-प्राकृत

हम जो कुछ बोलते हैं, वह भाषा है। प्राचीन समय में लोक में प्रचलित भाषा को ही लेखों में स्थान देने का प्रयत्न किया गया था। भारत में प्राप्त विदेशी भाषा के आधतम अभिलेख अरमइक भाषा में हैं। उनका समय तीसरी शती ई.पू. है और वे भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र से मिले है। प्राचीनकाल में यह क्षेत्र भारत के उत्तरापथ का भाग था। भारतीय शासकों के आद्यतम अभिलेख पालि-प्राकृत भाषा में मिलते है। अभिलेखों में संस्कृत का प्रयोग बाद में प्रारम्भ हुआ। पहली शती ई.पू. के उत्तरार्द्ध से धीरे-धीरे संस्कृत ने देश के सभी भागों में भारतीय पुराविद्या के क्षेत्र से प्राकृत का स्थान ले लिया। उत्तर भारत में यह प्रक्रिया तीसरी शती ई. तक और दक्षिण भारत में चौथी शती ई. तक पूर्ण हो सकी।

अशोक के स्तम्भलेख तथा धौली, जौंगड़, और एरागुड़ी के शिलाप्रज्ञापन मागधी भाषा ( मगध क्षेत्र में प्रचलित ) में लिखवाये गये। इस भाषा में “र” के स्थान पर “ल” तीनों ऊपम वर्गों के स्थान पर “स” तथा द्वित्व (दो बार प्रयुक्त ) व्यंजनों के स्थान पर एक ही अक्षर का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही समुच्चय बोधक शब्दों को या तो छोड़ दिया गया है या उनका बिल्कुल अभाव है। उत्तर भारत के पश्चिमी भाग गिरनार, सोपारा, शहबाजगढी और मानसेहरा में प्राप्त अशोक के अभिलेखों की भाषा में “र” का अवरोध तथा कहीं-कहीं “ल” के स्थान पर “र” का प्रयोग मिलता है। शहबाजगढी और मानसेहरा के अभिलेखों में संस्कृत के समुच्चय बोधकों को स्थान दिया गया है।

दक्षिण भारत में प्राप्त अशोक के लघुलेखों और कलसी के शिलाप्रज्ञापनों में प्राकृत और संस्कृत भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से न्यूनाधिक मात्रा में मिलता है।

उत्तर-पश्चिमी भारत से प्राप्त अशोक के शिलाप्रज्ञापनों की भापा उनके अन्य अभिलेखों की अपेक्षा संस्कृत के अधिक निकट है। आद्य प्राकृत के अनेक अभिलेख उल्लेखनीय हैं। इनमें खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख और पुलुमाचि के उन्नीसवें राज्यवर्ष का नासिक गुहालेख 30 महत्वपूर्ण है। इनकी शैली काव्यमय है। तीसरी शती ई.पू. का पिप्रहवा मंजूषा लेख भी कुछ इसी प्रकार का है।

संस्कृत

हिन्द-यूनानीकाल के अभिलेखों में अशोक के शहबाजगढ़ी और मानसेहरा प्रज्ञापनों की भांति भाषागत विशेषताएं मिलती है। इस सन्दर्भ में हेलियोदोर का बेसनगर स्तम्भलेख उल्लेखनीय है जिसमें संस्कृत तथा साहित्यिक प्राकृत का कुछ प्रभाव दर्शनीय है। इसी प्रकार शक-पार्थियन और कुपाण शासकों के कुछ अभिलेख प्राकृत और मिश्र संस्कृत में लिखवाये गये है। शक नरेश शोडास और रुद्रदामा प्रथम के अभिलेखों से प्रतीत होता है कि पश्चिमी भारत के विदेशी शासकों के दरबार में संस्कृत को संरक्षण प्राप्त था। धीरे-धीरे संस्कृत की लोकप्रियता बढ़ने लगी। विदेशी या देशी शासकों के दरबारो में संस्कृत की लोकप्रियता का मुख्य कारण वैयाकरण थे जिनके प्रयत्नों के फलस्वरूप आर्ष संस्कृत को नियमबद्ध किया गया।

इनमें पाणिनि का नाम सर्वोपरि है। सातवाहन शासकों के सारे लेख प्राकृत में हैं जिससे पता चलता है कि देशी राजदरबारों में वैयाकरणों का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ रहा था। संस्कृत में लिखित अभिलेखों में एक घोसुण्डी – हाथीवाड़ा लेख है जो गाजायन सर्वतात का उल्लेख करता है। इसी श्रृंखला में धनदेव का अयोध्या अभिलेखभी है। ये दोनों अभिलेख पहली शती ई.पू. के उत्तरार्द्ध के हैं।

प्रारम्भिक अभिलेखों की संस्कृत से प्रतीत होता है कि मध्यभारत में पाणिनि के व्याकरण का प्रभाव नगण्य था। पूर्वी भारत के दूसरी शती के अभिलेखों में आर्य विश्वामित्र का केलवन अभिलेख मिश्र संस्कृत में तथा कौशाम्बी नरेशों के अभिलेख शुद्ध संस्कृत में लिखे गये। चौथी शती ई. में गुप्तवंश का अभ्युदय हुआ। अतः उनके अभिलेखों में संस्कृत का प्राधान्य हो गया।

इक्ष्वाकु राजाओं के नागार्जुनी कोंडा से प्राप्त बहुसंख्यक अभिलेखों से प्रतीत होता है कि दक्षिण भारत में प्राकृत चौथी शती ई. के उत्तरार्द्ध तक लोकप्रिय रही। हम पहले ही लिख चुके हैं कि प्रारम्भिक अभिलेखों की प्राकृत में द्वित्व व्यंजनों के स्थान पर एक ही अक्षर का प्रयोग मिलता है। यह विशेषता दूसरी शती ई. के सातवाहन अभिलेखों और तीसरी शती ई. के तीसरे चरण में हुए इक्ष्वाकु राजा वीर पुरुपदत्त के अभिलेखों में दृष्टिगोचर होती है। ये अभिलेख प्राकृत की अपेक्षा संस्कृत के अधिक निकट हैं। वाकाटक विन्ध्यशक्ति द्वितीय के बासिम तामपत्र इसी भाषा में लिखे गये। इनका एक भाग संस्कृत में दकन के तेलुगु भापी क्षेत्र में वेंगी के शालकायनों के आद्य अभिलेख साहित्यिक शैली की प्राकृत में हैं। ये चौथी शती ई. के हैं। किन्तु इसी वंश के पांचवीं शती ई. के लेख संस्कृत में मिलते हैं। इस प्रकार दक्षिण भारतीय पुरालेख विद्या संस्कृत द्वारा प्राकृत का पराभव चौथी शती ई. के उत्तरार्द्ध में माना जा सकता है।

अंकों का विकास

लिपि के विकास के साथ ही भारत में अंकों का आविष्कार हुआ। शिलालेखों, ताम्रपत्रों तथा मुद्राओं के अध्ययन से प्रकट होता है कि लिपियों के समान प्राचीन तथा अर्वाचीन अंकों में भी उल्लेखनीय अन्तर है। अंकों की आकृति तथा लेखन शैली दोनों में ही अन्तर है। प्राचीन पद्धति में शून्य के लिये कोई स्थान न था। दहाई, सैकड़ा, हजार आदि की संख्याओं के लिये पृथक चिन्ह थे। किन्तु नवीन शैली में इनका सर्वथा अभाव है।

प्राचीन अंक प्राचीनकाल में 1 से 9 तथा 10,20,30, 40, 50,60, 70, 80, 90 अंकों की नव दहाइयों के लिये नव और 100 के अलग-अलग चिन्ह थे। 11 से 99 तक लिखने के लिये पहले दहाई का अंक और बाद में ईकाई का अंक लिखा जाता था।

उदाहरण के लिये 45 लिखने के लिये 40 + 5 लिखा जाता था। 1, 2, 3 के लिये क्रमशः 1, 2, या 3 आड़ी रेखाएं बनाई जाती थीं जिन्होंने आगे चलकर 1, 2, 3 अंकों का रूप ले लिया। प्रशस्तियों में शब्दों तथा अंकों में तिथियों का उल्लेख किया गया है। अशोक के रूपनाथ लेख में 256 के लिए 200 + 50 +6, मीनेण्डर के शीनकोट लेख में 14 के लिये 10 + 4 के स्थान पर 4 +4+4+1+1, गोण्डोफर्नीज के तख्तेवाही लेख में 26 के लिये 20 + 4 + 1 + 1, कुमारगुप्त के धनैदह ताम्रपत्र में 113 के लिये 100 + 10 + 3 लिखा गया है।

अंक व्यक्त करने की प्राचीन शैली

अंक लेखन विकास को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है – (1) खरोष्ठी (2) ब्राहमी और (3) शब्द तथा अक्षर। खरोष्ठी अंक ई.पू. चौथी शती से तीसरी शती तक हिन्द-यूनानियों द्वारा उत्कीर्ण अभिलेखों में मिलते हैं। ये अभिलेख प्रधान रूप से उत्तर-पश्चिम भारत में मिले है। वाहमी अंकों का प्रयोग अशोक के शासनकाल से प्रारम्भ हुआ। सातवाहन तथा शक शासकों के अभिलेखों में 1 से 9 तक के अंक मिलते हैं। शून्य के अभाव में उन अंकों का स्थान शून्य निश्चित नहीं किया जा सका। इसलिये प्रत्येक संख्या को पृथक-पृथक अंकों में लिखकर व्यक्त किया गया। तीसरी शैली में अंक शब्द और अक्षरों द्वारा व्यक्त किये जाते थे। यह हिन्दुओं की एक पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति थी। ब्रह्मगुप्त ने ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त में शक 867 लिखने के लिये गिरि (= 7) रस (=6) वसु (-8 ) शब्दों का प्रयोग किया है। ये शब्द दायीं ओर से बायीं ओर पढ़े जाते थे। इसी प्रकार वराहमिहिर ने शक 427 को व्यक्त करने के लिये संख्या ( =7) अश्विन (-2) वेद ( 4 ) शब्द लिखे है। उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुगक्षत विग के एक अभिलेख से होती है। इसमें निम्न वर्णन मिलता है —

वेदवस्वग्नि चन्द्रार्क संख्येब्दे विक्रमाक्र्कतः ।
पंचम्यां फाल्गुन सिते लिखित भौम वासरे।।

(वेद = 4, वसु = 8, अग्नि = 3 तथा चन्द्र = 1 को दायीं ओर से बायीं ओर पढने पर सं. 1384 हो जाता है)। ज्योतिष तथा गणित सम्बन्धी ग्रन्थों में संख्यावाचक सांकेतिक शब्द मनुष्य के अंग, ग्रह, नक्षत्र आदि से सम्बन्धित हैं। विशिष्ट संख्याओं को व्यक्त करने वाले शब्दों की तालिका इस प्रकार है

0 शून्य, (आकाश का रिक्त स्थल)
1 चन्द्र, पृथ्वी
2 यम, यमल, व्य, युग्म, छन्द, अश्विन् आंख, बाहु, पक्ष
आदि

  1. राम, गुण ( त्रिगुण ), संसार
  2. वेद, दिशा, आश्रम आदि।
  3. पाण्डव, रत्न, बाण आदि।
  4. रस, दर्शन, कार्तिकेय के मुख
  5. पहाड़, ऋषि, वार
  6. मंगल (अष्ट), दिग्गज
  7. ग्रह, निधि, अंक
  8. दिशाएं, अंगुलि, रावण के सिर, अवतार
  9. रुद्र, अक्षौहिणी
  10. मास, राशि, कार्तिकेय के नेत्र
  11. विश्वेदेवाः, काम, मन्मथ आदि।
  12. मनु, लोक (कहीं-कहीं 3 का सूचक)
  13. तिथि अर्हत्, सिद्ध आदि
  14. दांत
    100 धार्तराष्ट्र
    1000 गंगा के मुख आदि

आर्यभट्ट ने अक्षरों द्वारा अंक लिखने की पद्धति का आविष्कार किया। उसने व्यंजन से ही अंक को व्यक्त किया क्योकि स्वर अस्थायी रहते हैं तथा व्यंजन में लुप्त हो जाते हैं। शून्य के आविष्कारक का नाम ज्ञात नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत में उसका प्रयोग 500 ई. के लगभग प्रारम्भ हो चुका था क्योंकि वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में शून्य का प्रयोग किया है।

दशमलव प्रणाली

नवीन शैली के अंक का प्राचीनतम उल्लेख संवत 346-594 ई.) के एक गुर्जर लेख में मिलता है। इस प्रकार के अनेक अभिलेख प्रकाश में आये है जिनमें नवीन शैली के अंकों का उल्लेख मिलता है।248 सं. 933 के ग्वालियर लेख में पचास लिखने के लिये पांच पर शून्य (50) रखा गया है। यदि देवनागरी अंकों पर विचार किया जाये तो प्रतीत होता है कि वे नानाघाट तथा नासिक लेखों के अंकों से विकसित विकासक्रम इस प्रकार है


नागरी अंक 1 अशोक के 1
(खड़ी लकीर से
2 नानाघाट के,2 (दो = पड़ी लकीर से)
3 नानाघाट के 3 (तीन = पड़ी लकीर से)
4 नासिक गुहा के 4 से
5 पअक्षर से
6 अशोक के 6 से
7 नानाघाट के 7 से
8 नासिक गुहा के 8 से
9 नासिक गुहा के 9 से
० वृत्त से या नानाघाट के दस चिन्ह से।

इस प्रकार 10वीं शती ई. तक समस्त अंकों का स्वरूप
नि्चि हो गया और उन्हें नागरी अंक कहा जाने लगा।
(ओ) भौगोलिक वर्णन प्राचीन भारत के क्रमबद्ध भूगोल को ज्ञात करने के लिये अभिलेखों से पर्याप्त सहायता मिलती है। विभिन्न राजवंशीय अभिलेखों में उल्लिखित नगरों, सीमाओं राजपथों या जनपथों तथा विजय-यात्राओं से तत्कालीन भूगोल का परिज्ञान होता है। अभिलेखों का प्राप्तिस्थान ही यह सूचित कर देता है कि उक्त स्थान पर किस राजवंश का शासन था। इसी प्रकार राजाओं के सैनिक अभियान स्वतः प्राचीन यात्रा और व्यापारिक मार्गों का परिचय दे देते हैं। किसी शासक द्वारा तीर्थयात्रा या दान के प्रसंग में भ्रमण किये गये स्थानों की चर्चा उसके अभिलेखों में मिलती है।

राजनीतिक तथा धार्मिक कार्यों से दूतों का उल्लेख करते समय प्रशस्तिकारों ने उनके देश आदि का वर्णन किया है। इस प्रकार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अभिलेख भौगोलिक ज्ञानवर्द्धन में सहायक हैं। इनसे निम्नांकित जानकारी मिलती है

पर्वतों तथा नदियों का उल्लेख

अभिलेखों में पर्वतों तथा नदियों का उल्लख शासकों की
प्रशस्तिगान करते समय किया गया है। कभी-कभी पर्वतों का उल्लेख वहां भिक्षु संघ के लिये निर्मित गुहाओं के कारण भी हुआ है। बिहार के गया जिले में स्थित बराबर पहाड़ियों पर अशोक ने आजीविक सम्प्रदाय के साधुओं के लिये गुहाओं का निर्माण कराया था। इस सन्दर्भ में उसके प्रज्ञापनों में खलतिक पर्वत का नाम आया है |कलिग चक्रवर्ती खारवेल ने राज्याभिषेक के आठवें वर्ष में गोरथगिरि होते हुए राजगृह पर घेरा डाला।

विजय-यात्राओं का वर्णन करने वाले अभिलेखों में वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी का नासिक गुहालेख उल्लेखनीय है । इसमें गौतमीपुत्र सातकर्णि की विजयों का वर्णन करते समय उसे विन्ध्य, ऋक्षवत् । परियात्र, सह्य, कृष्णगिरि, मलय, महेन्द्र आदि पर्वतों का स्वामी कहा गया है। इसी सन्दर्भ में समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति भी महत्वपूर्ण है। इसमें समुद्रगुप्त की विजययात्राओं का वर्णन करते
समय महेन्द्रगिरि का नाम आया है। पुलकेशी द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में विन्ध्य पर्वत का उल्लेख है। वि.स. 1011 के खजुराहो अभिलेख में चन्देल शासक धंग को कालंजर तथा गोपगिरि का स्वामी बताया गया है।

अभिलेखों में नदियों का उल्लेख बांधों, तीर्थस्थानों, राज्यों तथा भूमिदान तथा ग्रामदान की सीमा निर्धारित करते समय किया गया है। रुद्रदामा के जूनागढ़ प्रस्तर अभिलेख से ज्ञात होता है कि ऊर्जयत पर्वत से सुवर्णसिकता और पलाशिनी नामक दो नदियां निकली थीं जिनमें बाढ़ आ जाने से बांध टूट गया। इसी बांध का उल्लेख स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ प्रस्तर अभिलेख- में
भी मिलता है। क्षत्रप शासक नहपान का जामात उपवदात ब्राह्मण धर्म के प्रति कृपालु था। नहपानकालीन नासिक गुहालेख से ज्ञात होता है कि उसने वर्णासा नदी के किनारे एक लाख गायों का दान किया और इबा, पारा, दमण, तापी, करबेना और दाहनुका नदियों पर घाट-शुल्क माफ कर दिया। चौथी शती ई. में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पंजाब पर आक्रमण किया। उसके मेहरौली
स्तम्भलेख से ज्ञात होता है कि उसने सिन्धु के सात मुखों को पार कर वाहलीक देश को विजित किया था। यहां पर परोक्षरुप से सिन्धु की सहायक झेलम, चिनाब, रावी, सतलज, व्यास, काबुल और स्वात नदियों का वर्णन किया गया है।

बुध गुप्तकालीन एरण प्रस्तर स्तम्भलेख में कालिन्दी और नर्मदा नदियों का वर्णन है। इन दोनों नदियों के मध्यवर्ती भाग पर सुरश्मिचन्द्र शासन करता था। संजन ताम्रपत्र से विदित होता है कि राष्ट्रकूट शासक ने गौड़ नरेश को गंगा-यमुना नदियों के मध्यभाग में पराजित किया था ।

कभी-कभी अभिलेखों में नदियों का, उनके स्त्रोतों, घाटों और प्रवाह का रोचक वर्णन मिलता है। प्रयाग-प्रशस्ति में गंगा नदी – को शिव की जटाजूट से निसृत बताया गया है। शीलादित्य सप्तम के अलीन ताम्रपत्रलेख262 में गंगाजल से सभी प्रकार की मुक्ति संभव बतायी है। महाराज प्रवरसेन द्वितीय के चम्मक तामपत्रलेख से ज्ञात होता है कि भारशिवों ने भागीरथी नदी के पवित्र जल से अपना ललाट अभिपिक्त किया था।

पुलकेशी द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में कावेरी नदी को तेजी से इधर-उधर चलने वाली मछलियों से युक्त कहा गया है। आदित्यसेन के अफसद प्रस्तरलेख से प्रकट होता है कि लौहित्यनदी के दोनों तटों पर उगे हुए नाग-द्रुम की शीतल छाया में सोने के उपरान्त जागने पर सिद्ध-मिथुनों द्वारा महासनेगुप्त का यशोगान बारम्बार किया जाता था। मालव संवत् के मन्दसौर स्तम्भलेख से ज्ञात होता है कि विन्ध्यपर्वत के शिखर तट से रेवानदी का पाण्डुवर्ण जल समूह प्रवाहित होता है। अभिलेखों में नदियों के किनारे या समीप अवस्थित अनेक नगरों तथा ग्रामों का वर्णन किया गया है। इससे हमें उन स्थानों के
अभिज्ञान में सहायता मिलती है। उदाहरणार्थ वि.सं. 1011 के खजुराहो अभिलेख से विदित होता है कि भास्वत ( विदिशा) मालवनदी ( आधुनिक बेतवा ) के तीर पर स्थित था।

नगर आभिलेखिक स्रोतों से नगरो और ग्रामों से सम्बन्धित बहुत कम जानकारी मिलती है। प्रायः उनके नामों का उल्लेख किया गया है, तो भी, ताम्रपत्रों में सामान्यतः उनकी अवस्थिति, प्रशासनिक इकाई का नाम और समीपवर्ती ग्रामों के नाम मिल जाते हैं। इतनी कम जानकारी के बावजूद अभिलेखों में उल्लिखित स्थान-नाम कई ऐतिहासिक समस्याएं सुलझाने में सहायक हुए हैं। शाक्य वंश की राजधानी होने के कारण कपिलवस्तु का ही बुद्ध का जन्मस्थान माना जाता था, किन्तु रुम्मिनदेई स्तम्भलेख से इस भ्रम का निवारण हो गया और लुम्बिनी ग्राम को बुद्ध का जन्म स्थल स्वीकार किया गया। अभिलेखों में प्रायः शासकों द्वारा शासित भूभाग के नाम भी मिलते हैं। धनदेव के अयोध्या प्रस्तर अभिलेख में पुष्यमित्र शुंग को कोसलाधिप कहा गया है। वाशिष्ठीपुत्र पुलुमावी के नासिक गुहालेख में असिक, असक, मुलक, सुरट, कुकुर, अपरान्त, अनूप, विदर्भ, आकर और अवन्ति आदि प्रदेशों के नाम मिलते हैं। इसके विपरीत समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति।

राजाओं के नाम के साथ उनके द्वारा शासित दशा या प्रदेशों का वर्णन हुआ है। अशोक के प्रज्ञापनों में “चाडा पाड़ा सतियपुत केरलपुत, तंबपंणी आदि प्रत्यन्त राज्यों का नाम मिलता है। सामान्य प्रशासनिक इकाईयों के अतिरिक्त कभी-कभी प्रधान व्यापारिक नगरों का उल्लेख भी अभिलेखों में हुआ है। कुमारगुप्त प्रथम कालीन मन्दसौर अभिलेख से ज्ञात होता है कि पट्टवाय
श्रेणी ने लाट ( दक्षिण काठियावाड़) से स्थानान्तरण कर दशपुर (मालवा प्रदेश) को अपना केन्द्र बनाया।

पूर्व मध्ययुग में सामान्य जनों के अतिरिक्त राजाओं का भी ध्यान तीर्थस्थानों की ओर आकृष्ट हुआ। आदित्यसेन के अफसद प्रस्तरलेख में कहा गया है कि कुमारगुप्त तृतीय ने प्रयाग में अग्नि में जलकर आत्म बलिदान किया था। कलचुरि शासक गांगेयदेव ने अपनी डेढ सौ रानियों सहित प्रयाग में गंगा नदी में डूबकर स्वर्ग प्राप्त किया था।275 इसी प्रकार चन्देल शासक धंग ने 100 वर्ष से अधिक की आयु में गंगा-यमुना के संगम ( प्रयाग)
के पवित्र जल में निमीलित नेत्रों से भगवान शिव का हृदय मे जप और ध्यान करते हुए अपना शरीर त्यागा। उपर्युक्त तीनों उदाहरणों से प्रकट होता है कि संगम पर शरीर त्याग से मानक को स्वर्ग प्राप्त होने की धारणा का इस युग में व्यापक प्रचार हो गया था। काशी में गंगा स्नान कर दान देने के भी अनेक उल्लेख गाहड़वाल अभिलेखों में प्राप्त होते हैं। इस प्रकार अभिलेखों में नगरों की चर्चा अनेक रूप में मिलती है।

राज्य सीमाएं

अभिलेखों से शासको की साम्राज्य सीमाओं पर पर्याप्त
प्रकाश पड़ता है। अशोक के दूसरे तथा तेरहवें शिलाप्रज्ञापना से मौर्य साम्राज्य की सीमाओं पर स्थित चोल, पाण्डय, सतियपुत्र, केरलपुत्र, ताम्रपर्णी आदि देश, यवन, कम्बोज नाभक, नाभपंक्ति, भोज, पितनिक, आन्ध, पुलिन्द आदि जातियाँ तथा अन्तियोक, तुरमय, अन्तेकिन, भक, अलिकसुंदर नामक यवन शासकों के
राज्यों का वर्णन मिलता है। इन नामों से परोक्ष रूप से अशोक के साम्राज्य की सीमाएं निर्धारित की जा सकती है। किन्तु कुमारगुप्त प्रथम तथा बन्धुवर्मा के मन्दसौर प्रस्तर अभिलेख में कुमारगुप्त प्रथम की सामाज्य सीमाओं का वर्णन इस प्रकार किया गया है :

“उस समय चार समुद्रों की चंचल मेखलावाली, सुमेरु एवं कैलास पर्वतों के बृहत् पयोधरवाली, वनान्त से मंडित, प्रफुल्ल पुष्यों से हासवाली पृथ्वी पर कुमारगुप्त शासन कर रहे थे। इसी प्रकार वि. स. 1011 के खजुराहो अभिलेख में चन्देल राजा धग के साम्राज्य की सीमाओं का उल्लेख इस प्रकार किया गया है :

“कालजर तक, मालब नदी के किनारे भारवत् तकः वहां से कालिन्दी ( यमुना ) नदी के किनारे तक, वहा से चंदिदेश की सीमाओं तक तथा वहां से गोप पहाड़ तक फैला हुआ था।”

यात्रा मार्ग

मानव के आविर्भाव के साथ ही यात्रामार्गों का विकास हुआ। मानव ने एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के लये जल्दी ही मार्गों को ढूंढ लिया। उनके स्थानान्तरणों ने इस कार्य में सहायता दी। प्राचीन भारतीय साहित्य में मार्गों संबंधी विवरणों की कमी नहीं है किन्तु अभिलेखों में प्रायः उनका अभाव है। विभिन्न प्रलेखों में उत्तर भारत के लिये उत्तरापथ या आर्यावर्त नाम मिलता है। इसी प्रकार दक्षिण भारत के लिये दक्षिणापथ शब्द है। ये दोनों ही
शब्द समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में मिलते हैं। इसी प्रकार नागनिका के नानाघाट गुहालेख281 और रुद्रदामा के जूनागढ़ प्रस्तर अभिलेख में दक्षिणापथ का नाम आया है। दक्षिणापथ का शाब्दिक अर्थ है, “दक्षिण का मार्ग।” यह दक्षिण भारत के लिये व्यवहृत पारिभाषिक शब्द था। इसी प्रकार उत्तर भारत के लिये उतरापथ “उत्तरी भारत का मार्ग या उत्तरी मार्ग” था।

आक्रमण मार्ग

अभिलेखों में प्रायः राजाओं के सैनिक अभियानों का वर्णन किया गया है। यदि इन सैनिक अभियानों का अध्ययन किया जाय तो मार्गों पर महत्वपूर्ण प्रकाश पड़ सकता है। अशोक के तेरहवें शिलाप्रज्ञापन में उसके कलिंग अभियान का वर्णन है। वहां पर हुए भीषण रक्तपात से ज्ञात होता है कि अशोक के कई लाख सैनिक
वहां गये थे। अतः इतनी बड़ी सेना का प्रयाण-मार्ग अवश्य ही प्रशस्त रहा होगा। हाथीगुम्फा अभिलेख284 से प्रकट होता है कि खारवेल ने एक विशाल सेना के साथ मगध पर आक्रमण किया था और पश्चिम दिशा में सातवाहन नरेश सातकर्णि को पराजित किया था। संभव है कि खारवेल ने अशोक के ही मार्ग से अनुगमन
किया होगा। समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति विजय योजनाओं का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इससे ज्ञात होता है
कि समुद्रगुप्त ने अपने दक्षिण अभियान में एक सर्वथा नये मार्ग का अवलम्बन किया। यह मार्ग कौशाम्बी से महाकोसल होते हुए महाकान्तार और फिर सुदूर दक्षिण
की ओर बढ़ जाता था।

समुद्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिम भारत को जीता।
उसके मेहरौली स्तम्भलेख से विदित होता है कि उसने सिन्धु की सात धाराओं को पारकर वाहलीक देश को विजित किया। सम्राट् हर्ष ने भी दक्षिण भारत का एक अभियान किया था जिसका अप्रत्यक्ष प्रमाण पुलकेशी द्वितीय के ऐहोल शिलालेख में प्राप्त होता है। पूर्व मध्यकालीन राजवंशों के शासको के सैनिक गुप्त सम्राट के अभियानों का उल्लेख उनके अभिलेखों में प्राप्त होता है जिससे इस युग के अभियान मार्गों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

पोताश्रय

अभिलेखों में पोताश्रयों ( बन्दरगाहों) के प्रत्यक्ष उदाहरण नहीं मिलते। तो भी उनमें उल्लिखित स्थान-नामों से अनुमान होता है कि समुद्रतट पर स्थित होने से उनका विशेष महत्व था। इसीलिये शासक उन स्थानों को अपने स्वत्व में रखने को उत्सुक रहते थे। अशोक प्रज्ञापन सोपारा से प्राप्त हुए हैं। नहपानकालीन नासिक गुहालेख से ज्ञात होता है कि भरुकच्छ और सोपारा पर नहपान का अधिकार था। रुद्रदामा के जूनागढ़ प्रस्तर अभिलेख में क्षत्रप नरेश को आनन्त, सुराष्ट्र, कच्छ, अपरान्त आदि देशों का शासक बताया गया है। उपर्युक्त सभी स्थान समुद्रतटों पर स्थित थे। अतः विदेशी व्यापार के काम में आते रहे होंगे। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि उसने समतट पर विजय प्राप्त की थी। इसी समतट में ताम्रलिप्ति का महत्वपूर्ण बन्दरगाह स्थित था, जिससे दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापारिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध स्थापित किये गये थे।

सार्थवाह

बाहरी मण्डियों के साथ व्यापार करने के लिये एक साथ टांड लादकर चलने वाले व्यापारी सार्थ कहलाते थे और उनका वरिष्ठ नेता (ज्येष्ठ व्यापारी) सार्थवाह कहलाता । कुमारगुप्त प्रथम के दामोदरपुर ताम्रपत्रो और बुधगुप्तकालीन दामोदरपुर ताम्रपत्र में क्रमशः सार्थवाह बन्धुमित्र तथा सार्थवाह वसुमित्र का उल्लेख मिलता है। चाहमान अभिलेखो में इन्हें वाणजारक (बनजारा) कहा गया । प्राचीनकाल में अकेले चलना निरापद न था, अतः कोई एक व्यापारी सार्थ बनाकर व्यापार के लिये निकलता था और उसके साथ अन्य व्यापारी भी सम्मिलित हो जाते थे। सार्थ में सम्मिलित व्यापारियों के बीच लाभ-हानि के सम्बन्ध में एक अनुबन्ध रहता

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