अभिलेखों में प्राचीन भारत की आर्थिक दशा

By | October 10, 2020

अभिलेखों में प्राचीन भारत की आर्थिक दशा

प्राचीनभारत में आर्थिक स्थिति का पता विभिन्न युगों के अभिलेखों से चला है। व्यवसायों एवं व्यापार की वृद्धि में प्राचीन श्रेणियों या आर्थिक निगमों ने विशेष योगदान दिया। कुषाणों तथा गुप्तों के समय में स्वर्ण सिक्के बड़ी संख्या में जारी किये गये। उस समय विदेशी व्यापार भी बहुत उन्नत हुआ। इसकी पुष्टि अभिलेखीय प्रमाणों से भी हुई है। स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख में कहा गया है कि उसके समय साम्राज्य में कोई आर्त, दरिद्र और दुःखी न था।

सिंचाई- भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। यहां कृषि का समुचित प्रबन्ध आवश्यक था। भूमि की सिंचाई पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता था। सिंचाई के लिए झीलों, नहरों, तालाबों तथा बांधों का निर्माण किया जाता था। रुद्रदामा के जूनागढ़ अभिलेख7 से विदित होता है कि सुदर्शन नामक झील (तड़ाक) का निर्माण चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में हुआ। रुद्रदामा के शासनकाल में
उसका बांध टूट गया तब उस क्षत्रप – नरेश ने उसकी मरम्मत करायी। गुप्त-युग में स्कन्दगुप्त द्वारा पुनः इसका संस्कार कराया गया। खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख से ज्ञात होता है कि राज्याभिषेक के पांचवें वर्ष राजधानी तक नहर लायी गयी थी। दक्षिण के सातवाहन-नरेश पुलुमावि के राज्यकाल में सिंचाई हेतु तालाबों का निर्माण कराया गया था। पूर्व मध्ययुग में तालाबों का निर्माण अधिक लोकप्रिय हुआ। इनके अतिरिक्त कुओं से रहट ( अरघट्ट ) द्वारा भी सिंचाई की जाती थी।

क्षेत्र का माप

भूमि का एक बड़ा क्षेत्र होता था। चालुक्य-अभिलेखों में भूमिमाप के लिए “पाथ” शब्द मिलता है। इसका क्षेत्रफल 240 वर्ग हाथ ऐतिहासिक भारतीय अभिलेख अभिलेखों में भूमि-गाप से सम्बन्धित विवरण विशेषतः गुप्त-युग से मिलने लगते हैं। भूदानकर्ता दान के समय भूमि की सीमाओं का स्पष्ट उल्लेख करता था, ताकि बाद में किसी प्रकार का विवाद न हो। प्रलेखों में भूमि-माप के लिए हल, पादावर्त, हस्त, नालक, नल, विंशोपक, निवर्तन, कुल्वाय द्रोणवाप, आध्वाप आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है। इन शब्दों की व्याख्या निम्नांकित है:


हल एक हल से जितनी भूमि जोती जा सकती थी उस माप का नाम हल था। कतिपय अभिलेखों में उल्लेख है कि पांच हल से जोतने योग्य भूमि को छोड़कर खेत का शेष भाग दान में दिया जाये। प्रमाणित होता है कि एक हल तथा बैलों की एक जोडी द्वारा जोतवाली भूमि की उपर्युक्त संज्ञा थी।

पादावर्त

पश्चिमी भारत के कुछ अभिलेखों52 में “पादावर्त” और उड़ीसा के अभिलेखों53 में “टिम्पीर”, “तिम्घीर” या “तिम्पिर” का उल्लेख मिलता है। मोनियर विलियम्स ने “पादावर्त” को एक वर्गफुट की इकाई माना है। किन्तु अभिलेखों से “पादावर्त का क्षेत्र अधिक बड़ा प्रतीत होता है। फ्लीट का अभिमत है कि 100 पादावर्त से तात्पर्य प्रत्येक ओर से 100 फुट की नापवाला भूक्षेत्र
चन्देल और गाहड़वाल अभिलेखों में “हस्त” शब्द माप के लिए प्रयुक्त हुआ है। कोहनी से मध्य अंगुली के छोर तक की लम्बाई एक हस्त कहलाती थी। राजा गोविन्दचन्द्र के पाली. दानपत्र में चार सौ हस्त भूमि को एक नालुक (= नालुक या नल) कहा गया है। प्रतीत होता है कि नल लकड़ी का दंड था जिसकी सहायता से भूमि की नाप की जाती होगी।

विशोपक

पूर्व मध्यकालीन अभिलेखों58 में एक विंशोपक के 24, 16 या 10 द्रम्मों में लगान निर्धारित करने के सन्दर्भ मिलते हैं। डा. सरकार का मत है कि यहां “विंशोपक” का अभिप्राय निस्सन्देह एक तरह से भूमि-माप से है, जो भूमि के मानक भाप का 1/20 होता था। विभिन्न प्रकार की जमीनों के लिए निर्धारित लगान की राशियों से प्रतीत होता है कि “विंशोपक” स्पष्ट रूप से के बराबर था।

निवर्तन

सातवाहन-अभिलेखों में “निवर्तन”61 नामक भू-माप का उल्लेख हुआ है। दक्षिण भारत में कई क्षेत्रों से प्राप्त अन्य अभिलेखो2 में भी इसका वर्णन हुआ है। वृहस्पति के अनुसार एक “निवर्तन” में 300 वर्ग हाथ या लगभग 43/4 एकड़ होते हैं। कौटिल्य64 ने “निवर्तन” को 240 वर्ग हाथ या लगभग 3 एकड़ का क्षेत्र बताया है। “निवर्तन” के वास्तविक विस्तार के सम्बन्ध में मतभेद हैं। कतिपय अभिलेखों के आधार पर कुछ लोग निवर्तन को “गोचर्मन्” का 1/10 मानते हैं।65 प्रतीत होता है कि “गोचर्मन्” उस भूक्षेत्र का सूचक था जो यज्ञ में वध की गयी गायों के चमड़े से ढका जाता था। वह क्षेत्र ब्राह्मणों को दक्षिणा में दे दिया जाता था।

कुल्यवाप, द्रोणवाप, आध्वाप

गुप्तकालीन बंगाल में भूमिमाप की लोकप्रिय इकाइयों का नाम कुल्यवाप, द्रोणवाप या आध्वाप था।66 उपर्युक्त शब्दों द्वारा भूमि के उतने क्षेत्र सूचित किये गये हैं जिन पर क्रमशः “कुल्य”, “द्रोण”, और “आढ़क” की तौल का अनाज बोने के लिए आवश्यक होता था। पार्जिटर ने “कुल्यवाप” का रकबा फरीदपुर ताम्रपत्रों के आधार पर निश्चित करने का प्रयास किया है। उनका मत है कि “कुल्यवाप” उस भूक्षेत्र का सूचक था जो तोल में एक “कुल्य” धान के बीजों की पौध को आरोपित करने के लिए आवश्यक होता था। उनके अनुसार एक कुल्यवाप का क्षेत्रफल एक एकड़ (31140 बीघा) से कुछ अधिक होता था। पर यह सही नहीं प्रतीत होता। डा. सरकार का मत है कि मूल रूप से एक कुल्यवाप 128 या 160 बीघे का, एक द्रोणवाप 16 से 20 बीघे तक का तथा एक अध्वाप 4 से 5 बीघे तक का होगा। यदि वास्तविक गणना बीज बोने की पद्धति पर आधारित थी और पौध लगाने की पद्धति पर नहीं, तो स्थिति इस प्रकार होगी : कुल्यवाप = 38 से 48 बीघे, द्रोणवाप = 4 1/2 से 6 बीघे तथा आध्वाप = 11/8 से 11/2 बीघे का। पाटक वैन्यगुप्त के गुणधर ताम्रपत्र तथा सेनवंशी राजा वल्लालसेन के नईहाटी लेख में माप के लिए द्रोण के साथ “पाटक” शब्द का उल्लेख मिलता है। गुणधर ताम्रपत्र से प्रकट होता है कि एक पाटक 5 कुल्यवाप अथवा 40 द्रोणवाप के बराबर होता था।

घ्यापार

अभिलेखों में व्यापार और व्यापारिक संस्थानों की चर्चा मिली है। जिन वस्तुओं का व्यापार होता था उनमें निम्नांकित उल्लेखनीय है : गेहूं, जौ, दाल, शक्कर, देशी खांड, घी, तेल, राल, जायफल, कालीमिर्च, नारियल, खजूर, कस्तूरी, चन्दन, कपूर, अगर, हिंगुल, त्रिफला, महुआ, मजीठ, कपास, तन्तुनिर्मित वस्त्र, सोना, चांदी, हाथीदांत की वस्तुएं, घोड़े आदि। व्यापारिक सन्दर्भ में बनियों, महाजनों, श्रेष्ठियों और उनकी दूकानों के रोचक वर्णन मिलते हैं। महाजन नगर के प्रमुख बाजारों का नियंत्रक था। ग्रामों में हाटे लगती थीं, जिसमें बनिये अपनी दूकानें लगाते थे। इन्हें “वणिकहट्ट” कहते थे।5 अनेक अभिलेखों में पत्तनों की चर्चा मिलती है। ये प्रायः नदियों के किनारे स्थित थे और इनमें बड़े व्यापारिक लेनदेन होते थे। अमरकोष (2. 2. 1) के अनुसार “पंतन” वह है जहां माल की पेटियां क्रय-विक्रय के लिये खोली जायें (“पत्तनं पुटभेदनम्”।

व्यापार स्थल और जलमार्गों से होता था। नगर और गांव अनेक मार्गों से सम्बद्ध थे। उन पर छायादार वृक्ष लगे थे और यात्रियों के ठहरने के लिए यथास्थान विश्रामभवन बने हुए मार्गों में जल की व्यवस्था के लिए कुएं और बावड़ियां थीं। व्यापारी सुरक्षा के लिए समूह बनाकर एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते थे। ऐसे समूह को “सार्थवाह” कहते थे। विदेशी व्यापार बन्दरगाहों से होता था। शासकों के विजय-अभियानों के सन्दर्भ में विजित प्रदेशों के व्यापारिक केन्द्रों पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। कनिष्क के सारनाथ प्रतिमालेख7 में वाराणसी का नाम आया । यह प्राचीन भारत का एक प्रमुख व्यापारिक तथा .त्कृतिक केन्द्र था। द्वितीय शती के नासिक गुहालेखों में अत्रप-नरेश नहपान के जामाता उषवदात के नाम के साथ भरुकच्छ, दशपुर, गोवर्धन, शोरग (शूर्पारक) आदि के उल्लेख हैं। ये सभी व्यापारिक केन्द्र थे। भरुकच्छ (भड़ौच) तथा शूर्पारक (सोपारा ) भारत के बड़े बन्दरगाह थे। वे आयात-निर्यात के बड़े केन्द्रों के रूप में शताब्दियों तक प्रसिद्ध थे। रुद्रदामा के जूनागढ़ अभिलेख में उसके द्वारा अनेक विजित क्षेत्रों के विवरण हैं। उनमें पूर्व तथा पश्चिम आकर, अवन्ति, आनर्त (उत्तरी काठियावाड़), सुराष्ट्र (दक्षिणी काठियावाड़), अपरान्त (उत्तरी कोकण), न, शूर्पारक (सोपारा) आदि भूभाग व्यवसाय तथा व्यापार के प्रसिद्ध क्षेत्र थे। राजराज, राजेन्द्र आदि चोल शासकों के लेखों में भारत तथा दक्षिण-पूर्वी द्वीपों के अनेक नाम मिले हैं। अभिलेखों से ज्ञात होता है कि विशिष्ट व्यापारी राजकीय प्रशासन में आर्थिक सहायता प्रदान करते थे। कुमारगुप्त प्रथम के दामोदरपुर ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि विषयपति अपने क्षेत्र का शासन एक परिषद के सहयोग से करता था, जिसमें नगरप्रेष्ठि, सार्थवाह, प्रथम-कुलिक और प्रथम-कायस्थ होते थे।

नगरप्रेष्ठि निस्सन्देह व्यापारियों का प्रमुख और नगर-सभा का अध्यक्ष होता था। सार्थवाह व्यापारिक श्रेणियों का प्रतिनिधित्व करता था। मथुरा, भीटा, गढ़वा, नालंदा आदि स्थानों से अनेक महत्वपूर्ण मृण्मुद्राएं मिली है जिन पर उक्त नाम प्राप्त हुए हैं और जिनसे व्यापार पर प्रकाश पडा है।

व्यापारिक श्रेणियां

भारत में व्यावसायिक संघ अत्यन्त प्राचीन हैं। बुद्ध के समय तक वे अत्यन्त विकसित हो चुके थे। प्राचीन साहित्य में व्यावसायिक संघी को “श्रेणी” “निगम” “पूग” या “निकाय” कहा गया है। एक श्रेणी के अन्तर्गत एक ही व्यवसाय करने वाले सदस्य संघटित होते थे। श्रेणी प्रत्येक शिल्पी का कार्यक्षेत्र, वेतन आदि निश्चित करती थी। वस्तुएं कितने समय में तैयार हों, किस स्तर की हों, उनका मूल्य क्या हो, उनके विक्रय की व्यवस्था कैसी हो, इन सबके नियम श्रेणियां बनाती थीं। उनके द्वारा निर्धारित नियम राज्य को भी स्वीकार होते थे। सातवाहन तथा क्षहरात-क्षत्रप वंश के अभिलेखों में श्रेणि-संगठनों के प्रचुर उल्लेख है। उनसे प्रकट होता है कि शिल्पियों तथा वणिको की संस्थाएं पर्याप्त समृद्ध तथा शक्ति सम्पन्न थीं । गुप्तकाल और पूर्व-मध्यकाल में ये निकाय सुव्यवस्थित स्प से व्यापार का संचालन करते थे। व्यवस्थित व्यापार से राज्य की आय में वृद्धि होती थी जिससे समाज सम्पन्न बनता था। कुमारगुप्त प्रथम तथा बन्धुवर्माकालीन प्रसिद्ध मन्दसौर अभिलेख में पट्टवाय श्रेणी का उल्लेख है, जिसके द्वारा एक सूर्य मंदिर का निर्माण कराया गया। कालान्तर में उसके जीर्ण-शीर्ण होने पर उसकी मरम्मत करायी गयी। इस लेख से यह भी ज्ञात होता है कि श्रेणियां अपने व्यवसाय की वृद्धि के लिए एक स्थान से दूसरे में अपने को प्रतिष्ठापित कर लेती थीं स्कन्दगुप्त के इन्दौर ताम्रपत्र में तैलिक श्रेणी का वर्णन है, जिसने सूर्य मंदिर में दीप जलाने के निमित्त तेल का दान दिया था।

श्रेणियों का मुख्य कार्य अपने व्यवसाय – व्यापार की उन्नति करना होता था। इसके लिए वे देश-विदेश में आवश्यक व्यापारिक संबंध स्थापित करती थीं। अनेक श्रेणियां अपने अन्तर्गत बैंकों की भी व्यवस्था करती थीं। तक्षशिला, कौशाम्बी तथा विदिशा से कुछ ऐसे सिक्के मिले हैं जिन पर व्यापारिक निगमों के नाम अंकित हैं। ये सिक्के राज्य की स्वीकृति से निगमों द्वारा जारी किये गये।

समृद्ध श्रेणियों द्वारा अनेक प्रकार के धार्मिक एवं जनहितकारी लौकिक कार्य सम्पन्न किये जाते थे। ब्राह्मणों, भिक्षुओं आदि के लिए श्रेणियां दान देती थीं। उनके निवास, भोजन आदि की व्यवस्था करती थीं। सांची के अभिलेखों से ज्ञात हुआ है कि वणिकों और श्रेष्ठियों ने विविध धार्मिक कार्यों के लिए दान दिये।

भरहुत, कार्ला, भाजा, जुन्नार, नासिक आदि के लेखों से भी श्रेणियों द्वारा किये गये दानों पर उल्लेखनीय प्रकाश पड़ा है। अनेक अभिलेखों में श्रेणियों द्वारा धार्मिक संस्थाओं को नकद धन दान के उल्लेख है। अन्य लेखों में वस्तुओं के दान की चर्चा है। 877 ई. के ग्वालियर अभिलेख84 से विदित होता है कि तैलिक श्रेणी कोल्हू का तेल तथा मालाकार श्रेणी द्वारा पुष्पमालाएं देते रहने का निश्चय किया गया था। दक्षिण भारतीय श्रेणियों के कार्य इस दृष्टि से विशेष महत्व के हैं।

श्रेणियों द्वारा जनकल्याण के कार्यों में सभागृह, यात्रियों के लिए विश्रामगृह आदि के निर्माण उल्लेखनीय हैं। उनके द्वारा सरोवर, पुष्करिणी, कूप आदि खुदवाने तथा उद्यान लगवाने के रोचक विवरण प्राचीन लेखों में मिलते हैं। श्रेणियों की अपनी मुद्राएं ( मुहरें) होती थीं। उनका प्रयोग व्यापारिक लेन-देन में आवश्यक होता था। इलाहाबाद के समीप भीटा से शुंगकालीन मिट्टी की मुहर85 प्राप्त हुई है, जिस पर “सहजतिये निगमस” लेख उत्कीर्ण है। इससे प्रमाणित होता है कि श्रेष्ठियों ने वाणिज्य मण्डल जैसा अपना संगठन स्थापित कर लिया था। तक्षशिला से प्राप्त “पंचनेकमें” प्रकार वाले सिक्कों से ज्ञात हुआ है कि पांच निगमों के बड़े संगठन द्वारा वे सिक्के जारी किये गये।

श्रेणियां बैंकों का भी कार्य करती थीं। वे धन उधार देती थीं और अपने पास जमा किये गये धन पर ब्याज देती थीं। नहपानकालीन नासिक गुहालेख (वर्ष 42 ) से ज्ञात होता है कि नहपान के जामाता उषवदात ने गोवर्धन में निवास करने वाली जुलाहों की श्रेणियों में से एक में 2000 कार्षापण और दूसरी में 1000 कार्षापण जमा कराये। इन पर एक प्रतिशत मासिक की दर से ब्याज मिलता था। मथुरा, जुन्नर आदि के लेखों में इस प्रकार के उल्लेख मिलते हैं।

नागरिकों के हित के लिए बाजारों पर नियन्त्रण रखने में श्रेणियां बहुत सहायक थीं। वस्तुओं के क्रय-विक्रय और धन के लेन-देन के नियम निश्चित थे। बहुधा अनेक व्यापारी साझे में व्यापार करते थे। उससे प्राप्त लाभ को वे अपनी लागत के अनुपात में बांट लेते थे। एक बौद्ध जातक में 500 व्यापारियों के साझे का उल्लेख है।

वैधानिक और न्यायिक कार्य

व्यवस्थित शासन में श्रेणियों की प्रतिष्ठा और प्रभाव उन्नत थे। अतः समाज में उन्हें सम्मान्य स्थान प्राप्त था। उन्होंने अपने स्वतन्त्र नियम बनाये, जो राज्य द्वारा अनुमोदित थे। गौतम का मत है कि श्रेणियों के नियम यदि धर्म विरोधी न हों, तो मान्य होने चाहिए। मनु का कथन है कि राजा को श्रेणियों के कानूनों का आदर करना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार लेखाध्यक्ष को नियमित रूप से निर्धारित रजिस्टरों में निगमों की प्रथाओं को लिपिबद्ध करना होता था।

श्रेणियों को अपने सदस्यों पर न्यायिक अधिकार प्राप्त थे। उनके न्यायालयों को सामान्य न्यायालयों से अधिक शक्ति प्राप्त थी। श्रेणियों द्वारा न्यायिक कार्य करने का प्रमाण कुमारगुप्त प्रथम के दामोदरपुर ताम्रलेख० में मिलता है, जिसमें कहा गया है कि कोटिवर्ष पर शासन करने वाले वेत्रवर्मा की कार्यकारिणी में नगरप्रेष्ठि का स्थान सर्वोपरि था। डा. रमेशचन्द्र मजूमदार का कथन है कि यहां सामान्य प्रशासन का तात्पर्य न्यायिक प्रशासन से सैनिक अधिकार अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि श्रेणियों के पास सैनिक शक्ति भी होती थी। उसके अनुसार सेना के विभिन्न अंगों में श्रेणिबल भी था। इसका प्रयोग सुरक्षात्मक और आक्रात्मक दोनों के लिए होता था। श्रेणी प्रधानों को हस्ति, अश्व, और रथसेना के प्रधानों के बराबर वेतन मिलता था। श्रेणियों द्वारा सैनिक कार्य किये जाने का उल्लेख कुमारगुप्त प्रथम के मन्दसौर अभिलेख में भी हुआ है। इससे ज्ञात होता है कि पट्टवाय
श्रेणि के शस्त्रों को अपना लिया था। कुछ सदस्यों ने मनु ने प्रजा से कर वसूलने में जोक, बछड़े और भौरे के दृष्टांत प्रस्तुत किये हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार भौरा सब फूलों से थोड़ा-थोड़ा रस ग्रहण करता है, वैसे ही राजा को प्रजाजनों से कर अल्प मात्रा में लेना चाहिए। भृत्यों सहित जिस राजा के राज्य में दुष्ट लोग रोती, विलाप करती प्रजा के जान-माल का अपहरण करते हैं, वह राजा जीवित नहीं, अपितु मरा हुआ है। अशोक के रुम्मिनदेई स्तम्भलेख में “उबलिके” शब्द आया हैं । ब्यूलर के मतानुसार इसका अर्थ बलिरहित अथवा अल्पबलि सहित है। इस उदाहरण से प्रकट होता है कि मौर्य साम्राज्य में धार्मिक कर लगता था । अशोक ने रुम्मिनदेई ( लुम्बिनी वन) की अपनी यात्रा के समय गौतम बुद्ध के सम्मानार्थ यह कर उठा दिया था। इसी स्तम्भलेख में “अष्टभागी” शब्द भी है जिसका शाब्दिक अर्थ है “आठवां भाग कर देने वाला”।

प्राचीनकाल में मुख्य राजकर भूमिकर उपज का छठवां भाग होता था। कौटिल्य के अनुसार भूमिकर चौथा या पांचवां भाग होना चाहिए। मेगस्थनीज के विवरण से ज्ञात है कि मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के शासनकाल में भूमिकर उपज का चौथा भाग था। अशोक ने इसे घटाकर आठवां भाग कर दिया। कुछ अभिलेखों से आभास मिलता है कि गुप्त-युग तक करों की परम्परागत संख्या 18 हो गयी। निस्सन्देह इन करों में भूमिकर ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। कुछ प्रान्तों में इसे “भागकर” तथा अन्यत्र “उद्रंग” कहा जाता था। भूमि की किस्मों के अनुसार इसकी मात्रा 16 से 25 प्रतिशत तक होती थी।

शासकीय आय का अन्य स्त्रोत चुंगी था, जो कि गाँव तथा नगरों के अधिकारियों को उनके वेतन के एक भाग के रुप में दिया जाता था। गुप्त एवं वाकाटक अभिलेखों में इसका निर्देश भोगकरों के रुप में मिलता है। वाकाटक और पल्लव अभिलेखों में पुष्यों, दूध, दही और बैलों पर कर वसुलने के निर्देश हैं। इससे प्रतीत होता हैं कि नगरों तथा ग्रामों में लाये जाने वाले इन पदार्थों तथा अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओं पर चुंगी देनी पड़ती थी। डा. अल्तेकर का मत है कि राज्य में तैयार किये जाने वाले माल पर उत्पादन कर लगाये जाते थे, जैसा कि कुछ मैत्रक और त्रैकूटक अभिलेखों में उल्लिखित “भूत-प्रत्यय” कर से ज्ञात होता है। चन्देल,कलचुरि और सेन अभिलेखों में “संनिर्गम – प्रवेश” शब्द मिलता है। इसका प्रयोग संभवतः चुंगी और उत्पादन शुल्क के लिए हुआ है। यह तथ्य ध्यानीय है कि आजकल के समान प्राचीनकाल में राज्य अपनी आय का एक बड़ा भाग मार्गों की व्यवस्था और सुरक्षा पर व्यय करता था। अतः यह स्वाभाविक था कि इस आय की पूर्ति के लिए “मार्ग कर” लिया जाये। गाहड़वाल अभिलेखो में “प्रवणिकर” और कलचुरि अभिलेखों में “प्रवणिवाड” नामक करों के उल्लेख मिलते हैं।

प्रवणि का सामान्य अर्थ चतुष्पथ ( चौराहा ) है। अतः प्रतीत होता है कि महत्वपूर्ण चतुप्पथों पर व्यापारियों से “मार्गकर” लिया जाता था। कुछ वर्ष पूर्व विदिशा से एक महत्वपूर्ण मिट्टी की मुद्रा (3.6×3.4 से. मी. ) मिली है, जिससे उस नगर के समीप एक शुल्कशाला के होने का पता चला है। मुद्रा पर गुप्तकालीन ब्राह्मी लिपि में लेख लिखा है – “श्री विशालकूप-शौल्किकानां” (बड़े कुए के पास के चुंगीघर के अधिकारियों ) की मुहर । इससे ज्ञात होता है कि नगर के मुख्य चौराहों आदि पर चुंगीघर होते थे। कौटिल्य ने ऐसे चुंगीघरों का वर्णन विस्तार से अर्थशास्त्र (2.21. 1. 2) में दिया है। याज्ञवल्क्यस्मृति आदि ग्रंथों में भी उनके उल्लेख मिलते हैं। स्कन्दगुप्त के बिहार अभिलेख में शौल्किक अधिकारियों का उल्लेख है। चुंगी और उत्पादन कर नकद सिक्कों या पदार्थ दोनों प्रकार में वसूल किया जाता था। एक गुर्जर-प्रतीहार अभिलेख से प्रकट होता है कि प्रत्येक चोल्लिका पर 50 पत्तियां ली जाती थीं। परमार शासन में नारियल या फलों के प्रत्येक भारक पर एक माणक के बराबर कर लिया जाता था। चाहमान अभिलेखों से ज्ञात होता है कि कपास या सूत के प्रत्येक भारक पर एक रुपया कर लिया जाता था।

व्यावसायिक कर

उद्योग-धन्धों से अर्जित सम्पत्ति पर कर वसूल किया जाता था। यह धन या वस्तु रूप में चुकाया जा सकता था। एक अभिलेख में तैलिक श्रेणी से देव मन्दिर में प्रकाश हेतु तेल के रूप में कर लिये जाने का उल्लेख हुआ है। इसी प्रकार एक अन्य अभिलेख में प्रतिदिन एक पल तेल अर्पित किये जाने का उल्लेख मिलता है। सामान्य विक्रेता से प्रति तेल कूप पर दो विंशोपक और घी के प्रति मृतिकापात्र पर एक पल कर लिया जाता था। शराब बनाने वालों से भी कर लिया जाता था।

राजस्थान से प्राप्त एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि प्रति सुराभाण्ड पर आधा ट्रम्म कर वसूल किया जाता था। अस्थायी कर पूर्व मध्ययुग में धार्मिक कृत्यों या महोत्सवों के अवसर पर विशेष कर लगाये जाते थे। चाहमान-अभिलेखों में शिवरात्रि के उत्सव पर प्रति व्यक्ति आठ मुद्रा तथा देवयात्रा के समय प्रति व्यक्ति से चार ट्रम्म वसूलने के उल्लेख मिलते हैं। परमार शासक चैत्रमास में सम्पन्न होने वाले वसन्तोत्सव पर प्रत्येक व्यापारी से एक ट्रम्म तथा जनसाधारण में प्रत्येक घर से एक दम्म की दर से कर लेते थे। विशिष्ट भोज दन वाले का भी प्रति आयोजन पर एक रुपये की दर से कर चुकाना पड़ता था। इसी प्रकार जुआघरों से भी प्रत्येक जुआरी से एक दाव के बराबर धन कर स्प में लिया जाता था।

सिक्कों के नाम

लगभग एक सहस्त्र ई.पू. से मौर्य साम्राज्य की स्थापना के पूर्व तक के युग को भारतीय इतिहास में जनपद या महाजनपदयुग स्थान है। इन प्रज्ञापनों में प्रायः सदाचार और धार्मिक बातों से कहा जा सकता है। उस समय सम्पूर्ण देश में छोटे-बड़े धार्मिक इतिहास की दृष्टि से अशोक के प्रज्ञापनों का विशेष जनपदों का तांता फैला था। जिन प्रदेशों में जनपदीय जीवन संगठित हो गया और शान्ति तथा व्यवस्था स्थापित हो गयी, वहां राज्य और नागरिक जीवन की सुविधा के लिए मुद्राओं का प्रचलन किया गया। प्राचीन भारत में सर्वाधिक प्रचलित मुद्रा तांबे का कहापण (कार्षापण ) था। चांदी का सिक्का पण या रजत कार्षापण कहलाता था। कार्षापण के अतिरिक्त अर्द्ध कार्षापण पाद कापिण, माषक, अर्द्धमाषक, काकणिक आदि मुद्राएं भी प्रचलित थीं। अट्ठसालिनी से ज्ञात होता है कि माषक
तांबे, लकड़ी और लाख के भी बनाये जाते थे।

हिंद-यूनानी रजत

मुद्राएं “ट्रम” नाम से अभिहित थीं। कालान्तर में यह नाम बहुत लोकप्रिय हुआ। बहुसंख्यक पूर्वमध्ययुगीन शासकों के अभिलेखों में “द्रम” या “द्रम्म” का उल्लेख मिलता है।
मथुरा, नानाघाट तथा नासिक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि कार्पापण या पंण प्रमुख मुद्रा थी। कुपाणों ने सोने के सिक्के बड़ी संख्या में चलाये। उनके अनुकरण पर गुप्त राजाओं ने अपनी स्वर्णमुद्राएं प्रचलित की। सांची तथा दामोदरपुर के गुप्तलेखों में स्वर्णमुद्रा के लिए “दीनार” शब्द प्रयुक्त हुआ है। दूसरा, बड़ी तौल वाला सोने का सिक्का “सुवर्ण” कहलाता था। स्कन्दगुप्त ने कुछ सिक्के सुवर्ण प्रकार के चलाये। गुर्जर-प्रतीहार शासक मिहिरभोज ने “आदिवराह द्रम्म” नामक मुद्रा चलायी। विग्रहपाल के नाम पर “विग्रहपाल द्रम्म” प्रचलित हुआ। राजस्थान के कुछ अभिलेखों में चांदी के सिक्के का नाम “स्पक” मिलता है। कालान्तर में वह रुपया कहलाया।

Leave a Reply