अभिलेखों में राजनीतिक इतिहास

By | October 12, 2020

भारतीय इतिहास लेखन में अभिलेखों का महत्व सर्वोपरि है। उनके उत्कीर्ण कराने के उद्देश्य विविध थे। कुछ अभिलेख ऐसे हैं जिनमें वंशावली, ऐतिहासिक घटनाओं तथा महान् शासकों की उपलब्धियों के मनोरंजक वर्णन प्राप्त होते हैं। खारवेल का हाथीगुम्फा-अभिलेख और समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति ऐसे प्रलेख हैं जिनमें उक्त शासकों का प्रायः सम्पूर्ण जीवनचरित वर्णित है। भारतीय इतिहास के विविध पक्षों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अभिलेख प्रामाणिक सामग्री प्रस्तुत करते हैं। इनसे निम्नांकित रूपों में जानकारी प्राप्त होती है।

अभिलेखों में राजनीतिक इतिहास

वंशवृक्ष

अभिलेखों के परिशीलन से प्राचीन राजवंशों की परम्परा का ज्ञान होता है। अभिलेख उत्कीर्ण कराते समय प्रायः शासक के पूरे वंशवृक्ष का उल्लेख कर दिया जाता था। ई. पूर्व के किसी भारतीय अभिलेख में स्पष्ट रूप से वंशवृक्ष नहीं मिला। रुद्रदामा का जूनागढ़ अभिलेख इस श्रेणी का प्राचीनतम आलेख है। उसमें रुद्रदामा की तीन पीढ़ियों का कथन है – “स्वामिचष्टनस्य पौत्रस्य राज्ञः क्षत्रपस्य सुगृहीतनाम्नः स्वाजिवदाम्नः पुत्रस्य राज्ञो महाक्षत्रपस्य रुद्रदाम्नः ।” पश्चिम भारतीय अनेक मुद्रा-लेखों में पिता-पुत्र दोनों के नाम मिले हैं, यथा — “राज्ञो महाक्षत्रपस्य दामजदश्रीपुत्रस्य राज्ञो क्षत्रपस्य सत्यदाम्नः ।” इन मुद्रा-लेखों से क्षत्रपों की वंशावली तैयार की गयी है।

गुप्तवंश के अभिलेखों में वंशावली उल्लेख करने की परम्परा पूर्णता की ओर पहुंच गयी। समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति और स्कन्दगुप्त भीतरी स्तम्भलेख में गुप्त वंशावली का वर्णन इस प्रकार किया गया है “महाराज श्रीगुप्तप्रपौत्रस्य, महाराज श्रीघटोत्कचपौत्रस्य, महाराजाधिराज श्रीचन्द्रगुप्तपुत्रस्य, कुमारदेव्यामुत्पन्नस्य, महाराजाधिराज श्री समुद्रगुप्तपुत्र । तत्परिगृहीतो महादेव्यां ध्रुवदेव्यामुत्पन्नस्य परमभागवतो महाराजाधिराज श्रीकुमारगुप्तस्य….. प्रथितविपुलधामा नामतः स्कन्दगुप्तः ।”

वंशावली के सन्दर्भ में प्रभावती गुप्ता का पूना ताम्रपत्र अत्यन्त रोचक है। उसमें वाकाटक-वंशावली के स्थान पर गुप्त-वंशवृक्ष का वर्णन किया गया है। उपर्युक्त तथ्य से वाकाटक साम्राज्य पर गुप्तों का प्रभाव प्रदर्शित होता है। हर्षवर्द्धन के बांसखेड़ा ताम्रपत्र में नरवर्द्धन से लेकर हर्षवर्द्धन तक शासकों और उनकी रानियों के नाम मिलते हैं। इसी प्रकार चालुक्य-नरेश पुलकेशी द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में और पालवंशी धर्मपाल के खालिमपुर ताम्रपत्र आदि में वंशावलियों का वर्णन है।

युद्ध गाथा

अधिकांश अभिलेखों में विजययात्राओं, युद्धगाथाओं तथा संधियों का वर्णन मिलता है। अशोक के तेरहवें शिलाप्रज्ञापन से ज्ञात होता है कि वह कलिंग-युद्ध मे विजयी होकर अहिंसा का पुजारी बन गया। उसने “भेरी घोष” को “धम्म घोष” में परिवर्तित कर दिया और देश-देशान्तरों में अपने धर्मप्रचारक भेजे। धनदेव के अयोध्या अभिलेख में पुष्यमित्र शुंग को दो अश्वमेध यज्ञों का कर्ता बताया गया है (“दिरश्वमेधयाजिनः”)।

खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख में सम्राट् के प्रतिवर्ष की मुख्य घटनाओं का वर्णन है। इसी प्रकार सातवाहन नरेश गौतमीपुत्र सातकर्णि तथा क्षत्रप नहपान के मध्य हुए भीषण संघर्ष की जानकारी नासिक-प्रशस्ति से हुई है। रुद्रदामा के जूनागढ़-अभिलेख, समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति, स्कन्दगुप्त भीतरी-स्तम्भलेख, यशोधर्मा के मन्दसौर अभिलेख तथा हूण नरेशों के अभिलेखों से उन शासकों की महत्वपूर्ण विजयों पर पर्याप्त प्रकाश पड़ा है।

पूर्व मध्यकालीन अभिलेखों में मौखरि, पल्लव, चालुक्य, पाल, गुर्जर, प्रतीहार, चन्देल, परमार, चोल, आदि वंशों के शासकों की विजयों की विस्तृत जानकारी मिलती है। राज्य-सीमाएं किसी भी शासक या राजवंश के प्रभाव-क्षेत्र का ज्ञान प्राप्त करने में अभिलेख अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रमाणित हुए हैं। मौर्य-शासक अशोक की राजाज्ञाओं से विदित होता है कि भारत का अधिकांश क्षेत्र उसके साम्राज्य के अन्तर्गत था। उसके दूसरे तथा तेरहवे शिलाप्रज्ञापनों में सीमावर्ती शासकों के उल्लेख है। इससे भी उसके साम्राज्य विस्तार का अनुमान होता है। मौर्ययुग के बाद सातवाहन-वंश ने देश के बड़े भाग पर शासन किया। इस वंश के अभिलेखों और मुद्राओं से सातवाहन साम्राज्य की सीमाएं निर्धारित की जा सकती हैं। कुषाण वंश का शासन पेशावर से मथुरा तक फैला हुआ था। इसकी पुष्टि कुर्रम से लेकर मथुरा तक बहुसंख्यक अभिलेखों से होती है। गुप्तवंश के अभिलेख राजाओं की दिग्विजय तथा राज्यविस्तार पर प्रकाश डालते हैं।

समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति में आर्यावर्त और दक्षिणापथ का वर्णन क्रमशः उत्तर तथा दक्षिण भारत के लिए हुआ है। इस प्रशस्ति के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि समुद्रगुप्त का साम्राज्य उत्तर में पंचाल से दक्षिण में कांची तक विस्तृत था। कुमारगुप्त प्रथम के मन्दसौर-अभिलेख में सीमाओं का वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण होते हुए भी अत्यन्त रोचक है – “चतुरसमुद्रान्तविलोलमेखला, सुमेरु – कैलास – बृहत्पयोधराम् । बनान्तवान्तस्फुट – पुष्पहासिनी, कुमारगुप्ते पृथिवीं प्रशासति।।”

पूर्व-मध्ययुगीन अभिलेखों में चन्देलवंशी यशोवर्मा और धंग के खजुराहो-अभिलेख में धंग के साम्राज्य का वर्णन इस प्रकार किया गया है-

“आकालंजरमा च मालवनदीतीरस्थिते स्वतः,
कालिन्दीसरितस्तटादित इतोऽप्या चेदिदेशावधेः ।
अ तस्मादपि विस्मयैकनिलयाद्गोपाभिधानादगिरे-
र्यः शास्ति क्षितिमायतोऽर्जितभुजव्यापारलीलार्जिताम् ।।

इस प्रकार अनेक अभिलेख शासकों की राज्यसीमाओं का निर्धारण करते हैं। जब अभिलेखों में स्पष्ट विवरण नहीं मिलते तब उनके प्राप्तिस्थानों से प्रमाणित करते की चेष्टा की जाती है कि वे स्थान किस राजवंश की सीमा के अन्तर्गत हो सकते हैं। राजाओं की समकालीनता अभिलेखों में राजाओं की विजयों और उनके द्वारा निष्पन्न लोक-कल्याणकारी कार्यों के वर्णन मिलते हैं। साथ ही कुछ लेखों में अनेक समकालिक राजाओं के उल्लेख भी प्राप्त होते हैं। इससे शासकों के काल-निर्धारण में सहायता मिलती है। अशोक के दूसरे और तेरहवे शिलाप्रज्ञापनों में एण्टिओकस द्वितीय और
ऐतिहासिक भारतीय अभिलेख अलेक्जेण्डर नामक समसामयिक यूनानी शासकों के नाम दिये गये है। उनके आधार पर अशोक के शासनकाल पर प्रकाश पड़ा है।


खारवेल के हाथीगुम्फा-अभिलेख और रुद्रदामा प्रथम के समकालीन सातवाहन राजा के पराजित होने की जानकारी मिलती है। समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति में उसके समकालिक शासकों एवं गणराज्यों आदि की एक लम्बी सूची मिलती है।

चालुक्यों का ऐहोल अभिलेख पुलकेशी द्वितीय और हर्षवर्द्धन की समकालीनता पर प्रकाश डालता है। अतः अभिलेखों के आधार पर समकालिक राजाओं का अभिज्ञान तथा उनकी शासनावधि या राज्यारोहण-तिथि सरलता से ज्ञात की जा सकती है।

शासन-व्यवस्था

अभिलेखों के अध्ययन से शासन-पद्धति पर रोचक प्रकाश पड़ता है। अभिलेख लिखवाते या राजाज्ञा प्रसारित करते समय कतिपय अधिकारियों का उल्लेख किया जाना अनिवार्य होता था। अशोक के तृतीय तथा पंचम शिला-प्रज्ञापनों में धर्ममहामात्र, राजुक, प्रादेशिक, युक्त, ब्रजभूमिक आदि अनेक पदाधिकारियों का प्रजा हित के लिए राज्य में भ्रमण करने के आदेश मिलते हैं। उसके प्रज्ञापनों से प्रकट होता है कि पाटलिपुत्र, कौशाम्बी, तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसली तथा सुवर्णगिरि मौर्य साम्राज्य की प्रान्तीय राजधानियां थीं। कुछ ही समय पूर्व मध्यप्रदेश के पानगुडारी नामक स्थान (जि. सीहोर) से प्राप्त एक नये शिलालेख से यह जानकारी मिली है कि उस स्थान पर अशोक ने अपने वंश के एक राजकुमार को विशेष आदेश प्रदान किये।

गुप्त अभिलेखों में तत्कालीन शासन व्यवस्था का सविस्तार वर्णन मिलता है। प्रयाग-प्रशस्ति कालेखकहरिषेण महादण्डनायक, सान्धिविग्रहिक तथा कुमारामात्य पदों पर प्रतिष्ठित था। चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय एक सनकानीक सामन्त महाराज सेनापति था । गुप्त साम्राज्य कई प्रान्तों में विभक्त था। शासन करने वाले अधिकारियों की संज्ञाएं अभिलेखों में राष्ट्रीक, भोगिक, भोगपति । तथा गोप्ता मिली हैं। प्रत्येक प्रान्त विषयों में बंटा हुआ था। – विभिन्न अभिलेखों में निम्नांकित अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के नाम मिलते हैं राजा, राजानक, अमात्य, राजामात्य, कुमारामात्य, सामन्त, सेनापति, विषयपति, भोगपति, दण्डपाशिक, चौराद्धरणिक, बलाधिकृत, दण्डनायक, धर्ममहामात्र, विषयव्यवहारिन्, सान्धिविग्रहिक, महादण्डनायक

शासन-प्रणाली

प्राचीन भारत में राजतन्त्र तथा प्रजातन्त्र–ये दो प्रकार की ज्येष्ठ-कायस्थ, आदि शासन प्रणालियां थीं।

(क) राजतन्त्र

प्राचीन भारत की प्रमुख शासन प्रणाली राजतन्त्रात्मक थी। भारत में यह सर्वाधिक लोकप्रिय थी। अभिलखा में इसकी विस्तारपूर्वक चर्चा मिलती है। इसके अन्तर्गत सम्राट और मन्त्रिमण्डल के अधिकार क्षेत्र एवं प्रशासनतन्त्र के वर्णन मिलते हैं। अशोक क शिलाप्रज्ञापनों में मन्त्रिमण्डल को परिषद कहा गया है। आदर्श शासक सदैव प्रजा हित का ध्यान रखते थे। अपने द्वितीय कलिंग लेख में अशोक कहता है: “सारे मनुष्य मेरी सन्तान हैं और जिस प्रकार मैं अपनी संतति को चाहता हूं कि वह सब प्रकार की समृद्धि और सुख इस लोक और परलोक में भोगे ठीक उसी प्रकार में अपनी प्रजा के सुख-समृद्धि की भी कामना करता हूं। रुद्रदामा के जूनागढ़ – अभिलेख तथा स्कन्दगुप्त के उसी स्थल में प्राप्त अभिलेख से शासकों की प्रजावत्सलता पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

पाल-शासक धर्मपाल के खालिमपुर ताम्रपत्र से विदित होता है कि इस वंश के राजा गोपाल ने बंगाल में “मात्स्य न्याय” को समाप्त कर शान्ति स्थापित की। इस घटना से प्रभावित होकर वहां की प्रजा ने गोपाल को अपना शासक निर्वाचित किया।

(ख) प्रजातन्त्र

दूसरे प्रकार की शासन-प्रणाली प्रजातन्त्र थी। इसके लिए अभिलेखों तथा साहित्य में “गण” या “संघ”
नाम मिलता है। मौर्य साम्राज्य की प्रचण्ड शक्ति के सामने अधिकांश प्राचीन गणराज्यों का पराभव हों गया, तथापि बिहार, प्रान्त में बज्जि संघ अस्तित्व में बना रहा। प्राचीन सिक्कों से भी मालव, आर्जुनायन, औदुम्बर, यौधेय, कुणिन्द, आभीर, मद्रक आदि उल्लेखनीय है। समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि गुप्त सम्राट् ने अनेक गणराज्यों को पराजित कर उनका अस्तित्व समाप्त कर दिया।

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