अभिलेखों में साहित्यिक विवरण

By | October 10, 2020

अभिलेखों में साहित्यिक विवरण

प्रशस्तियों का उद्गम प्राचीन भारत में अभिलेखों को उत्कीर्ण कराने का उद्देश्य साहित्यिक न था। तो भी, उनके अध्ययन से प्रकट होता है कि प्रशस्तिकार उच्चकोटि का विद्वान् होता था। वह साहित्यशास्त्र का पूर्ण ज्ञाता होता था। प्रशस्तिया प्रायः प्राकृत या संस्कृत में लिखी जाती थीं। इन प्रशस्तियों में खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख रुद्रदामा का जूनागढ़ प्रस्तर अभिलेख तथा समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति उल्लेखनीय है। इन प्रशस्तियों में जहां एक ओर काव्य के गुण विद्यमान है, वहीं दूसरी ओर इनमें ऐतिहासिक तथा अऐतिहासिक काव्यों के गुण भी वर्तमान हैं। काव्यों का रस, छन्द, अलंकार के अतिरिक्त अतिरंजित काल्पनिक वर्णन इन प्रशस्तियों की विशेषता है। चन्देल शासक धंग के खजुराहो अभिलेख में तो उसकी शूर-वीरता का वर्णन अतिशयोक्ति की चरमसीमा तक पहुंच गया है।

अभिलेखों के कवि प्रशस्तियों के रचयिता साहित्यशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् वे। प्रयाग प्रशस्ति के लेखक हरिषेण की कोई अन्य कृति उपलब्ध नहीं है। तो भी, उसकी प्रस्तुत कृति में शार्दूल-विक्रीडित, स्त्रगधरा तथा मन्दाक्रान्ता छन्दों के सुन्दर उदाहरण मिलते हैं। वे वैदर्भी रीति से लिखे गये हैं और कालिदास की शैली के अनुरूप है। प्रशस्ति का गद्यभाग बाण की गौडी शैली का स्मरण दिलाता है। चम्पू शैली का यह एक विशिष्ट उदाहरण है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के सान्धिविग्रहिक अमात्य शाब (वीरसेन) की भी उदयगिरि अभिलेख के अतिरिक्त अन्य रचना सुलभ नहीं है। लेख के अनुसार वह व्याकरण, न्याय एवं राजनीति का पंडित था।

कुमारगुप्त प्रथम के मन्दसौर अभिलेख का रचयिता वत्सभट्टि है। लेख में शार्दूलविक्रीडित, वसन्ततिलका, आर्या, उपेन्द्रवज्रा, उपजाति, द्रुतविलम्बित, हरिणी, इन्द्रवज्रा, मालिनी, वंशस्थ, मन्दाक्रान्ता तथा अनुष्टुभ आदि लिखे गये 44 श्लोक हैं। इसमें कालिदास की वैदर्भी शैली की छाप दृष्टिगोचर होती है। यशोधर्मा के मन्दसौर अभिलेख के रचयिता वासुल है। उसने 9 श्लोकों
की प्रशस्ति में प्रथम आठ स्त्रगधरा तथा नवां अनुष्टम वृत में लिखे है। उसकी शैली सरस, रोचक और मर्मस्पर्शी है। ईशानवर्मा के हड़हा प्रस्तर अभिलेख के लेखक रविशान्ति का नाम भी इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है। उसकी रचना संमासयुक्त तथा भावपूर्ण है। इसी प्रकार चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय का ऐहोले अभिलेख सुन्दर काव्य में लिखा गया है। उसका रचयिता रविकीर्ति है। प्रशस्ति के 37 वें श्लोक में उसकी तुलना कालिदास और भारवि से की गयी है। कविताओं के अतिरिक्त कुछ नाटक भी शिलाओं पर उत्कीर्ण किये गये। अजमेर के शिलाखण्ड पर सोमदेव रचित “ललित विग्रह नाटक” प्राप्त हुआ है जिसमें चाहमान शासक विग्रहराज का यशोगान है। धारा के समीप प्रस्तर पर उत्कीर्ण “हरकेलि नाटक” मिला है। उसका लेखक विग्रहराज है। धारा के ही एक अन्य शिलालेख में विष्णु के कूर्मावतार का वर्णन प्राकृत भाषा में किया गया है। अभिलेखों में साहित्य समीक्षा करते समय चन्देल शासक के खजुराहो अभिलेख को विस्मृत नहीं किया जा सकता जिसमें प्रशस्तिकार की काव्यमय शैली और साहित्यिक सूझ का ज्ञान होता है। इस प्रकार हम देखते है कि पूर्व मध्ययुग में संस्कृत चरम उन्नति पर थी। संस्कृत में विभिन्न विषयों के ग्रन्थों की रचना तीव्र गति से हो रही थी और उसी गति से अभिलेख भी उत्कीर्ण किये जा रहे थे।

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