अम्बरग्रीस

अम्बरग्रीस

एम्बरग्रीस

ठीक 108 साल पहले 8 दिसंबर 1912 के दिन नार्वेजियन व्हेलर जहाज ने ऑस्ट्रेलिया के पास समुद्र में स्पर्म व्हेल का शिकार किया। उसे यांत्रिक क्रेन की मदद से जब डेक पर लाकर उसे चीरा गया तब उसकी आंत में से 455 किलो की एक गठ्ठा निकला । जो बहुत बदबूदार थी , जो मल जैसी थी । लेकिन समय केसाथ यह खुब्बो में बदल जाती हैं तो जहाज के नाविक जानते थे। कुछ दिन बाद लंदन के बाजार में उस गठ्ठे के 23,000 पाउंड मील गए । क्योंकि वह गठ्ठा स्पर्म व्हेल के पाचन तंत्र में उत्पन्न हुआ अंबरग्रिस था ।

स्पर्म व्हेल

सौ साल पहले उस अरसे में तेईस हजार पाउंड छोटी मोटी रकम नहीं थी । फिर भी परफ्यूम बनाने में , व्यंजन में खुशबू लाने में और चिकित्सा में उपयोग करने लायक था । वैसे भी एम्बरग्रीस उस मूल्य के लायक था। सबसे ज्यादा मांग पफर्गम की होती है । जितना उसका उत्पाद होता है उससे ज़्यादा उसकी मांग रहती है।

४५५ किलोग्राम का अब तक का सबसे बड़ा अम्बर ग्रीस का गठ्ठा

आज बाज़ार में और तेजी है। आधुनिक जीवन शैली ने पर्फ्यूम को एक लक्जरी आइटम बना दी है । जिसके कारण अब ये रोजमर्रा की एक अनिवार्य चीज बन गई है। दूसरी ओर स्पर्म व्हेल के असीमित शिकार के कारण उसकी संख्या लगभग 10,00,000 से घटकर केवल 3,50,000 रह गई है । उस आबादी में भी एम्बरग्रीस उत्पाद कर सके वैसी व्हेल का औसत अनुपात 1% से अधिक नही है । परिणामस्वरूप एम्बरग्रीस प्रति किग्रा अंतर्राष्ट्रीय मूल्य 20,000 $ तक पहुंच गया है। उच्च गुणवत्ता के गठ्ठे की क़ीमत तो ईससे भी ज्यादा होती है। उदाहरण के लिए न्यूजीलैंड के तट पर एक 7-वर्षीय लड़के को 0.59 किलोग्राम का एक गतग्घ मिला जिसका मूल्य अच्छी गुणवत्ता के कारण 65,000 $ तय किया गया। इस कीमत के हिसा से एक किलोग्राम का भाव 100,000 $ से भी ज़्यादा होता है। एम्बरग्रीस की कीमत इतनी अधिक होने का मुख्य कारण है यह है कि
इसके बिना एक अच्छा परफ्यूम बनाना संभव नहीं है।


इत्र की खुशबू लंबे समय तक रहती है इसलिए यह कस्तूरी की तरह है । इसमें एम्बरग्रीस का उपयोग ‘आधार’ के रूप में किया जाना है। स्पर्म व्हेल के आंतों में पैदा होने वाला यब पदार्थ सुगंध का fixation कर देता है। इस लिए उसका प्रभाव लंबे समय तक रहता है । एक उदाहरण देखे तो सन 2005 में पूर्व फ्रांसीसी क्वीन मैरी एंतोइनेत की 200 साल पुरानी परफ्यूम की बोतल के लिए खरीदार ने 11,000 $ का भुगतान किया और देखा कि परफ्यूम में इस्तेमाल किये गए एम्बरग्रीस के कारण उसकी सुगंध जैसी की तैसी है ।

स्पर्म व्हेल राजसी जानवर हैं। लंबाई में लगभग 30 मीटर और वजन लगभग 50 मीट्रिक टन होता है। शिकार करने के लिए निचले जबड़े में 20 सेंटीमीटर लंबे शंकु के आकार के दांत होते है । इसका मुख्य शिकार विद्रूप है। रंगरा नाम के इस जीव को वह खा जाती है । ओक्टोपस के जैसे यह जीव समंदर में 500 मीटर (1,200 फीट) से ज़्यादा गहरे पानी में होते है । तो उन्हें पकड़ने के लिए समय-समय पर स्पर्म व्हेल डाइव लगाती है । जिसके लिए कभी कभी वह 90 मिनट तके श्वास रोककर 2,000 मीटर की गहराई तक पहुंच जाती है। शरीर के आकार के मुताबिम उसे दैनिक औसतन 1 मेट्रिक टन भोजन चाहिए – और उसमे भी में मुख्य रूप से रंजक हैं।

अब ऐसे शिकार के शरीर मे हड्डियां नहीं होती हैं । इसीलिए व्हेल का पाचन तंत्र इतनी आसानी से काम करता । एकमात्र समस्या यह है कि रंगारे को तोता के जैसी बड़े आकार की नुकीली चोंच होती हैं । जिस से वह खुद मछली जैसे शिकार को काटें और खाता है । स्पर्म व्हेल चोंच को पचा नहीं पाती है। रंगारा के जबड़े के कुछ हिस्से भी भी उसके सुपाच्य नहीं हैं। बाकी भोजन को पचाने के लिए व्हेल गाय की तरह चबाती है । दूसरे चबाने वाले जानवरों की तरह उसके भी चार पेट होते हैं और प्रत्येक पेट का एक क्रम होता है । आंतों को भोजन पचता है। शेष रहते भोजन को आगे बढ़ाया जाता है। न पचने वाली चोंच के नुकीले हिससे जब पाचन तंत्र की आंतरिक त्वचा में लगते है तो पाचन तंत्र चिकना स्त्राव उस चोंच के इर्द गिर्द रक्षात्मक परत बना देता है । जिसकी परत पर परत बनते चोंच एक ढेर के आकार में बदल जाती है । यदि आकार बहुत बड़ा है तो शरीर के पिछले हिस्से से निकाला नही जा सकता है। तब स्पर्म व्हेल उसकी उल्टी कर देती है। आकार, अगर जरूरत से ज्यादा नहीं होता तब उसे पिछले हिस्से से ही बाहर निकाल दिया जाता है । जो हल्का होने के कारण यह समुद्र तल पर तैरता रहता है । कभी-कभी समुद्र के प्रवाह के साथ सालो तक यात्रा करता रहता है ।

स्पर्म व्हेल का ताजा गगठ्ठा हमेशा बदबूदार होता है । लेकिन धूप और ऑक्सीजन से उसकी रासायनिक संरचना बदलते ही वह बदबू खत्म हो जाती हैं। देखने में यह एक अजीब Collia पत्थर जैसा लगता है और थोड़ा सुगंधित लगता है। समय की बीतते वह परिपक्व बनता जाता हैं। जैसे-जैसे गुणवत्ता में सुधार होता वैसे वैसे उसकी कीमत भी बढ़ जाती है। तब सही मायने में वह गांठ एम्बरग्रीस बन जाती है । कभी न कभी वह बहुत तट तक पहुँचता है और कौन उसे एम्बरग्रीस के रूप में पहचान कर जैकपॉट ले ले कोई कह नही सकती । वैसे आम लोग इसे पहचान में अक्सर गलती करते हैं, क्योंकि एम्बरग्रीस कैसे और किस तरह से पहचाना जाता है इस बारे में उनको कोई पता ही नही होता था । इसलियर कई बार व्हेलर जहाज द्वारा समुद्र में गिराई जाने वाली व्हेल की चर्बी की ऑक्सीडाइज्ड की हुई गांठो को, समुद्री शैवाल के पिंडो को या समुद्र तट पर टहलने के लिए लिए कुत्ते की सुखी पोटी को एम्बरग्रीस माना जाता है। हजारों की संख्या में से बहुत कम अपवाद को छोड़कर बाकी सब माममें इसी तरह गलत अफवाह ही साबित होते है।

अम्बर ग्रीस का गठ्ठा

वैसे समुद्र तट पर तो ठीक बाजार में असली एम्बरग्रीस भी देखने का मौका मिलना बहुत मुश्किल है। इस पदार्थ में व्यापार नारकोटिक्स पदार्थों की तरह भूमिगत चलते हैं क्योंकि बहुत से देशों में यह प्रतिबंधित है । स्पर्म व्हेल की रक्षा के लिए बनाये गए कानून के तहत एम्बरग्रीस को ऐसे देशों में बेचा या खरीदा नही जा सकता है । निर्यात और आयात भी अवैध हैं। इस कारण से सभी सौदे गुप्त तरीके से किए जाते हैं और गोपनीयता बनाए रखी जाती है । अच्छी गुणवत्ता वाला इत्र बनाना निर्माताओं के मुंह में एम्बरग्रीस का उल्लेख यदि कोई करता है तो वे तुरंत बातचीत को अलग मोड़ पर मोड़ देते हैं। परफ्यूम में एम्बरग्रीस का उपयोग किया गया है ऐसा दावा भी नहीं किया जा सकता। जैसे कि चैनल नं 5 ब्रांड के प्रसिद्ध इत्र की खुश्बू के लिये एम्बरग्रीस है ये सालो से सब जानते है । लेकिन कंपनी कभी इसका उपयोग किया गया है ऐसा नही कहा तो साथ ही यह भी नही कहती है कि ऐसा नहीं किया गया है । चैनल नंबर 5 की ब्रांड इमेज उसमे (लोकगीत) 2 के अनुसार) एम्बरग्रीस का इस्तेमाल करने के कारण हुई हैं । बिना एम्बरग्रीस के इस्तेमाल के ऐसे इत्र का बनना मुमकिन नहीं । जैसा ये कम्पनी बनाती हैं ।

परफ्यूम बनाना में सबसी बड़ी चुनौती उसे लंबे समय तक महकता रखने की है। हालांकि उत्पादन के समय मूल घटक के रूप में एम्बरग्रीस नहीं बल्कि फूलों, जड़ों या लकड़ी के सुगंधि तेल का उपयोग किया जाता है । तीनों श्रेणियों में कई अन्य चीजें शामिल होती हैं। परिभाषा के अनुसार पफ्यूम उसे कहा जाता है जिसके अल्कोहल में 10% से अधिक तैली द्रव्य हो । 3 से 5 % से ज्यादा द्रव्य वाला कोलन पानी परफ्यूम नही कहा जाता ।

उत्पादन प्रक्रिया में किस चरण में एम्बरगरिस प्रवेश करता है?बाबा ये जानते हैं । फूलों, जड़ों या लकड़ी के सुगंधित तेल को अलग करने के दो मुख्य तरीके हैं। जिससे इन पदार्थों को गर्म भाप देकर उनका तैलीय पदार्थ निकला जाता हैं । वाष्पित होकर ये सब गैस में बदल जाते है। एक धातु ट्यूब में हवा ठंडे होने पर, यह फिर से सुगंधित होता है (अर्क कहो)। रूप धारण करता है। वैकल्पिक रूप से विलायक तरल के साथ फूलों के तैलीय पदार्थ अलग से निकाले जाते हैं। आखिर महत्व तरीके का नही । उस अर्क के तत्व बहुत कम वक्त के लिए रहते है। वे सब हवा में मिल जाते है । जब तक वे हवा में मिलते रहते है सुगंध आती है लेकिन उस अर्क के सब रेणु उड़ने के बाद खुशबू खत्म हो जाती है । इसलिए परफ़्यूम का प्रभाव समाप्त हो जाता है।

इस समस्या के समाधान के रूप में उस में पहले एम्बरग्रीस का इस्तेमाल किया देखा – और अपेक्षित परिणाम मिला । इसका मुख्य योगदान पियर जोसेफ पेलेति और जोसेफ बीएनायम कावेंतु नाम के दो फ्रांसीसी केमिस्ट का था। फार्मेसी उनके मुख्य विषय होने के कारण औषधीय गुणों की जाँच करने में दोनों को दिलचस्पी थी । पहले उन्होंने पत्तो का क्लोरोफिल तत्वों को अलग-थलग करके दिखाया गया था । कातिल वनस्पति के जहर स्ट्रीकनाइन का पता लगाया था ।औषधीय क्विनाइन की खोज की। समय जाते उन्होंने एम्बरग्रीस के गुणों की जाँच में रुचि जागृत हुई। यह शब्द लोकप्रिय हो गया । इस पदार्थ की घनता नापी । फिर रासायनिक संरचना देखने के लिए उसे शराब में घोला । ज़्यादातर पदार्थ घुल जाने के बाद उस घोल की अशुद्धियों को छानने के बाद उसे एक उथले कंटेनर में रखा । कई दिन बीतने के बाद उसमें सफ़ेद नमक के जैसे सफ़ेद स्फटिक बने । उन्होंने उस पदार्थ को इब्रेन कहा।

विचित्रता यह है कि यह एंबाइन में नाममात्र भी स्मेल नही होती है । लेकिन ऑक्सीजन और धूप से उस्का ऑक्सीकरण होने के कारण वह सिगन्धित बनता है । रासायनिक संरचना में आमूल परिवर्तन हो जाता है और फिर एम्बरग्रीस की सुगंध निर्धारण का प्राकृतिक गुणधर्म प्राप्त करता है। एम्बरग्रीस के साथ जुड़े महक के रेणु बहुत धीमी गति से हवा में घुलते है और सुगंध का प्रभाव घंटों तक रहता है । सबसे अधिक प्रभाव खुशबू का प्रकार से व्यक्त होता है । सुगंध के भी तीन स्तर है । घ्राण इन्द्रिय नोट उस समय महसूस करती है जब प्रफ्यूम या तुरंत तैरने वाले अणुओं को कप एकसाथ छिड़कते है। उड़ने लगता है। जैसे कि संतरे को छीलना शुरू करते है जब आपका नाक उसे तीव्रता से महसूस करता है । मन को वह अच्छी नही लगती । तीव्रता कम होने के बाद वह थोड़ी पसन्द आती हैं। बाद में अंतिम महक तो आसपास के वातावरण को अधिक आह्लादक बना देती है । सबसे महत्वपूर्ण बात यही है । परफ्यूम की बेज नोट कि महक बहुत समय तक फैलता रहती रहती है। अगर वह दीर्घकालिक हैं तो उसका कारण स्पर्म व्हेल के एम्बरग्रीस से बने सुगंधि तैली द्रव्यों से हुए fixation के कारण है । इसके लिए एम्बरग्रीस के बदले कस्तूरी का भी उपयोग किया जा सकता है, लेकिन वह विकल्प दूसरे नंबर का है सुगंध-फिक्सिंग में एम्बरग्रीस का कोई विकल्प आज के समय मे तो नहीं है।

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