ईस्टर द्वीप का रहस्य किस तरह खुला ?

ईस्टर द्वीप का रहस्य किस तरह खुला ?

ईस्टर द्वीप का रहस्य किस तरह खुला ?

अगर आपने सिर्फ़ ईस्टर द्वीप का नाम सुना है और इसके बारे में कुछ और जानना चाहते हैं, तो पहले थोड़ा जान लेते हैं । दुनिया में सबसे अकेला बस्ती वाला द्वीप ईस्टर, 12,650,000 वर्ग किलोमीटर का एक जमीन का टुकड़ा है । प्रशांत महासागर का नक्शे में एक छोटा सा डॉट के रूप में भी बड़ी मुश्किल से दिखा सकते हैं । अधिकतम चौड़ाई 24 किलोमीटर है। क्षेत्रफल 163 वर्ग किलोमीटर से अधिक नहीं है। ईस्टर के पश्चिम में निकटतम मानव वसाहत वाला द्वीप पितकार्न नाम का द्वीप है जो उससे 1,600 किमी की दूरी पर है, जबकि पूर्व में तो 3520 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण अमेरिकी देश चिली है तटीय क्षेत्र को छोड़कर पूरा द्वीप पहाड़ी इलाका है। सबसे ऊंचा पर्वत 1969 फीट या 900 मीटर ऊंचा है।

प्रशांत महासागर में अकेला द्वीप ” ईस्टर ”

अब भूगोल जानने के बाद थोड़ा इतिहास जान लेते है :

ईस्टर पर जाने वाला पहला यूरोपीय नाविक नीदरलैंड के एडमिरल जैकब रोजविन था। ईस्टर के ईसाई त्योहार के दिन वह बस दो दिन के लिए द्वीप पर रहा था और इसे ईस्टर नाम दिया । द्वीपसमूह पर बसने वाले आदिवासी पॉलिनेशियन थे । यह प्रशांत महासागर की एक जनजाति थी। सन 400 के आसपास, उनके पूर्वज लंबी यात्रा के बाद ईस्टर पर पहुंचे थे और हरे-भरे उपजाऊ भूमि को देखकर यही बस गए थे । एडमिरल रोजविन का इस द्वीप पर आगमन से पहले उनका दुनिया के साथ कोई संपर्क ही नहीं था । किसी को पता ही नही था कि यहां पर भी इंसान बस्ते हैं ! रॉगेविन की यात्रा के कई साल बाद, 1770 में, पेरू के स्पेनिश वायसराय ने ईस्टर द्वीप पर एक जहाजी टुकड़ी को भेजा । उन्होंने द्वीप पर चार दिन बिताए। फिर 1774 में ब्रिटिश जहाज के कप्तान जेम्स कुक ने द्वीप के तट पर लंगर डाला। चूंकि ईस्टर एक निर्जन द्वीप था, इसलिए ब्रिटेन और नीदरलैंड जैसे यूरोपीय राष्ट्र इस पर कब्जे के लिए अनिच्छुक थे, लेकिन 19 वीं शताब्दी में चिली ने इसे अपना प्रदेश घोषित कर दिया। हरे द्वीप तब तक रहस्यमय तरीके से वीरान बन चुका था ।

रह्स्य का पहला अनुभव खुद एडमिरल रोजविन को 4 अप्रैल 1772 के दिन हुआ । ईस्टर के किनारों पर जैसे ही वह पहुंचा तब कुछ आदिवासी उससे मिलने सूखी रेशेदार घास से बनी डोंगियों पर बैठकर आये । जो टहनियों से ज्यादा अच्छी नही थी। रोजविन को आश्चर्य हुआ कि विशाल प्रशांत महासागर में बसने के लिए वे पहली बार इतने दूर के द्वीप पर कैसे पहुँच थे ? वह भी ऐसी नावों में बैठकर ! जो दो लोगों का मुश्किल से वजन उठा सके ? जो तटीय समुद्र में मछली पकड़ने के लिए भी बेकार थी और उनकी संख्या तीन या चार से अधिक नहीं थी। जब रोजविन नाविकों के साथ तट पर पहुंचा। नावों की कमी का कारण उनके ध्यान में आया। ऊंचाई पर 10 फीट से बड़े पेड़ या पौधे कहीं भी द्वीप पर थे ही नहीं । वास्तव में होने चाहिए, क्योंकि तटीय द्वीप पर जहां बारह महीनों में कम से कम 10 ” बारिश होती है वहां जंगल का न होना आस्चर्य जनक था । पेड़ों की कमी ने द्वीप पॉलिनेशियन के लिए लकड़ी के जहाज या छोटी मछली का निर्माण करना भी असंभव बना दिया। हैरानी की बात है कि पॉलिनेशियन दुभाषिया के साथ कप्तान जेम्स कुक ने पाया कि आइलैंडर्स के पूर्वजों ने 400 किमी दूर सलाई गोमेज़ द्वीप पर गए थे। एक मजबूत लकड़ी की नाव के बिना यह यात्रा कैसे संभव हो पाई?

एडमिरल रोजविन के अनुभव की बात आगे करे तो जहाजों की कमी के बाद उसने द्वीप एक और ऐसा दृश्य देखा जो उसके पहेली बन गया। पूरे तट के साथ लगभग समान चेहरों के कई मुर्तियो को समुद्र के किनारे पर खड़ा किया गया था , संख्या लगभग 2OO थी। बेसाल्ट पत्थर की हर औसत पत्थर की मूर्ति 12 फीट ऊंची थी और वजन 10 टन था, लेकिन कुछ तो उससे भी भारी थे। उत्तरी तट पर सबसे ऊंची प्रतिमा 13 फीट (10 मीटर) ऊंची और 10 टन वजन की थी । कुछ तो उससे भी बड़ी मुर्तिया थी । उत्तर किनारे पर पारो नाम के बूत की ऊंचाई 32 फिट और वजन 75 टन था । दक्षिण तट पर आहु तंगारिकी नाम की मूर्ति, पारो से थोड़ी कम थी, लेकिन इसका वजन 87 टन था। नाविकों के साथ द्वीप को देखने निकलने वाले रोगविन जिस कच्चे रास्ते ओर चला उसके दोनों ओर कुल मिलाकर 97 बूत लेटे हुए हालात में थे । यह रास्ता भी बेसाल्ट पथ्थर का बना हुआ था जो क्वोरी कि ओर जाता था । विशाल डिश के आकार की रानो राराकू नाम की उस क्वोरी मे अधूरे बूत तराशी हुई हालात में पड़े थे जिनकी संख्या 600-700 जितनी थी । कुछ की तो मुखाकृति भी अभी तक चट्टान का हिस्सा थी । रोगविन ने वहां शिल्प काम के पथ्थर के औजार देखें । उनको देखकर लगता था कि कारीगरों ने अचानक वहां से हड़ताल करके गए थे या फिर कोई कुदरी हादसा हुआ था । जिसके कारण सब भाग खड़े हुए थे

क्वेरी से द्वीप के तट पर परिवहन के दौरान जिनकी यात्रा अटक गई थी , वे बिखरे हुए थे
यह देखकर, रोजविन को लगा कि कुछ अप्रत्याशित हुआ था, जिसने मूर्तिकला को तुरंत रोक दिया। इस डच एडमिरल के लिए सवाल यह था कि अतीत में द्वीपवासी 200 मूर्तियों को किनारे पर लाने में कैसे कामयाब रहे ?


उन्हें बिना यांत्रिक उपकरण किनारे पर कैसे खड़ा किया ? आपने इरेक्शन कैसे किया? क्वेरी में सबसे बड़ी मूर्ति की ऊंचाई 65 फीट (12.5 मीटर) यानी सात मंजिला घर के बराबर थी । इसका वजन लगभग 270 टन था। यह स्पष्ट था कि यहां तक ​​कि इस दुर्जेय मूर्तिकला को अंततः किनारे पर स्थापित करने के लिए ही बनाया गया था । स्थान्तर करने के लिए मान लीजिए की क्रेन न हो तो कम से कम कुछ लकड़ी की आवश्यकता होती ही है, जिसका उपयोग रोलर की तरह इस्तेमाल करके उस पर मूर्ति को लेटाकर मूर्ति को किनारे तक ले जाया सके । इसके अलावा मजबूत रस्सियों की भी जरूरत होती है । अब ईस्टर द्वीप पर तो कोई पेड़ तक का नामोनिशान नहीं था जो रोलर के लिए लकड़ी और रस्सियों के लिए बैले दे सके । दूसरी ओर, कुछ खदानों और किनारे के बीच न्यूनतम दूरी 9.5 किमी थी कुछ प्रतिमाएँ तो 15-20 किमी दूर खड़ी की गई हैं ।

एडमिरल रोज्विन के सामने दूसरा सवाल यह जगा की कई मूर्तियों को उनके सिर पर एक मोटी घंटी जैसा ताज पहनाया गया था, जिनमें से कुछ का वजन तो 12 टन था। इसके लिए इस्तेमाल किया जाने वाला रतुमादो पत्थर रानो रराकू क्वोरी का नहीं, बल्कि पश्चिम में पुणे पऊ नामक दूसरी क्वेरी का। यह समझना मुश्किल था कि कैसे पॉलिनेशियन ने सालो पहले उसे 10 से 32 फुट ऊंचे बुतो पर बिठाया। रोजविन ने अपने यात्रा वृतांत में लिखा है, “ईस्टर पर कोई पेड़ नहीं थे जो यांत्रिक उपकरण बनाने के काम मे आते । साथ ही साथ रस्सियों को बुनने के लिए बेले भी नही थी । फिर भी इन लोगो ने विशाल बुतो को किनारे पर खड़ा कर पाए थे ये बड़ी आस्चर्य जनक बात है ।

द्वीप पर खड़े बड़े बड़े ” पघदी वाली मुर्तिया

रोजविन की यात्रा के कई वर्षों बाद इस तरह के एक और रहस्य को जोड़ा गया, जिससे ईस्टर द्वीप खोजकर्ताओं के लिए एक पहेली बन गया। तट पर स्थित मूर्तियाँ 1770 के दशक तक अपने स्थान पर सुरक्षित थीं, लेकिन 1864 के बाद उनकी गर्दन तोड़ने के स्पष्ट इरादे से सभी उखाड़ फेंके गए थे । चिली सरकार ने अंततः कुछ प्रतिमाओं को फिर से खड़ा करवाई ।

ईस्टर द्वीप के रहस्यों को दुनिया भर में प्रसिध्दि मिलने के बाद उनके खुलासे भी फूटने लगे । प्रसिद्ध नॉर्वेजियन नाविक थोर हेयरडेल ने 1940 में सिद्ध किया कि ईस्टर द्वीप के मूल निवासी एक पिछड़ी संस्कृति के पॉलिनेशियन नहीं थे, बल्कि विकसित अमरीकन इंडियन थे और वे ठोस लकड़ी के जहाजों के बजाय नावों द्वारा ईस्टर पहुंचे थे । यह साबित करने के लिए कि इस तरह की यात्रा संभव है, थोर हेयरडल ने रीड बूर नामक एक डोंगी में खुद प्रवास किया। उसमे उसे सफलता मिली लेकिन उससे यह साबित नहीं हुआ कि दक्षिण अमेरिकी भारतीय वास्तव में ईस्टर पर गए थे। और अपने कथित इंजीनियरिंग कौशल के साथ वहां मूर्तियां स्थापित की थी। वास्तव में पॉलिनेशियन दुभाषिया के साथ 1774 में यात्रा के दौरान जेम्स कुक को जानने को मिला कि ईस्टर के लोग मूल पॉलिनेशियन भी थे । थोर हेयरडेल के बाद, 1960 में, प्रसिद्ध और विवादास्पद स्विस लेखक एरिक वैन डेनिक ने मूर्तियों की एक अलग व्याख्या प्रस्तुत की । जिसमें उसने कल्पना का मसाला जरा और ऊंचे दर्जे का था । डैनी केन के अनुसार, अंतरिक्ष में बुद्धिमान जीवों ने अतीत में ईस्टर का दौरा किया और अपने चेहरे के भावों के अनुसार मूर्तियों का निर्माण किया और उनकी नक्काशी की थी। इन विशाल मूर्तियों को स्थापित करने का कार्य उनके लिए बाएं हाथ का खेल था।

ईस्टर के बारे में हेयरडेल और डेनिम के सिद्धांत विज्ञान पर नहीं, बल्कि अटकलों पर आधारित थे। वैज्ञानिक इस द्वीप के रहस्यों को जानने का काम कर रह रहकर बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में शरू किया। उनके दिमाग में पहला सवाल यह आया कि यदि पर्याप्त उपकरण उपलब्ध हों, तो रानो राराकू क्वोरी से उन्हें सागर किनारे तक पहुंचाया जा सकता हैं ? पुरातत्वविदों का अनुमान है कि स्विस शिलालेख या एक उग्र पत्थर की छेनी और एक पत्थर का हथौड़ा का उपयोग करके एक वर्ष में औसतन 20 शिल्पकार एक बड़ी प्रतिमा का निर्माण कर सकते है । अमेरिका के टिलबर्ग नाम की महिला वैज्ञानिक के साबित किया कि हर कुछ दूरी पर एक रोलर के रूप में लकड़िया रख दी जाए तो 12 टन के बूत को सरकना मुश्किल काम नही । पचास से सत्तर लोग प्रतिमा को रस्सी से बांधकर हर दिन पांच घंटे के लिए ‘ ए हैसो …. करके 15 फीट तक सरकाते रहे तो एक सप्ताह के बाद 9.5 किलोमीटर दूर तक किनारे तक पहुंच जाएगा उसमे कोई शंका नहीं। इस कार्य को पूरा करने के लिए बस प्रचुर मात्रा में पेड़ों और बेलों, गोल बीम और रेशेदार रस्सियों की आवश्यकता है जो सुलभ होने चाहिए। महिला वैज्ञानिक जो दिलबर्ग के प्रयोग से नया सवाल जागृत हुआ : ईस्टर द्वीप समग्र रूप से निर्जन दिखने के बावजूद वर्षों पहले यहां पेड़ों का एक सदाबहार जंगल था।

यदि इस प्रश्न का उत्तर मिल जाये तो ईस्टर द्वीप का इधर उधर 275 सालो से भटकने वाला रहस्य खुलने में देर न हो जाये। इसलिये दो प्राचीन वनस्पतिविद जॉन फ्लानले और सारा किंग द्वीप की मुलाकात पर गए । जॉन फ़लानले न्यूजीलैंड के थे और सारा किंग ब्रिटन के थे। प्राचीन पौधो पता लगाना, उसके प्रकार को जानना और उसकी तैनाती का अनुमान लगाने का एक तरीका यह है कि इसे गाद की विभिन्न परतों में पड़ी हुई परागरज को जांचना था । उसकी घास की जाँच होनी थी। पहले तो रेडियोकार्बन डेटिंग की मदद से हर परत की उम्र तय करने के बाद बची हुई परागरज को माइक्रोस्कोप के नीचे देखकर उनके अर्वाचीन पेड़ और पौधे बमव बेलो के साथ तुलना करके प्राचीन वनस्पतियों का पता लगाया । स्वाभाविक रूप से काम बेहद कठिन था, क्योंकि प्राचीन वन की प्रजातियों-वार संरचना के बारे में एक-एक की गिनती के बिना विभिन्न प्रजातियों के कई पौधों के पराग का पता नहीं लगाया जा सकता था।

दोनों विद्वानों आखिर छह महीने के संघर्ष के अंत मे इस निष्कर्ष पर आये की ईस्टर द्वीप पर सन 400 के दशक में पॉलिनेशियन के आगमन से 30,000 साल पहले हराभरक जंगल था। इस द्वीप में नारियल के पेड़ आंवले के पौधों से लेकर ताड़ के वृक्षों से ढका हुआ था। प्रत्येक ऊपरी परत में पराग की संख्या 200 साल पुरानी गाद परत के बाद धीरे-धीरे कम हो गई, जिसका मतलब था कि जंगल धीरे-धीरे कम घना होता गया । शीर्ष परत में सिर्फ घास भी नाम का रह गया था। यहां तक ​​कि यह शीर्ष परत समग्र रूप से सत्वहीन था।

लेकिन जंगल की कटाई के कारण क्या रहे होंगे इसका तो दोनों विद्वानों को केवल अटकलें लगानी थी । उसके बाद ईस्टर के रहस्य की जांच के लिए डेविड स्टीडमैन का नाम के अमेरिकी पुरातत्वविद् ने द्वीप की मुलाकात ली। तब संदिग्ध तस्वीर नाटकीय रूप से स्पष्ट हो गई। 2.5% द्वीप की आबादी के गायब होने के बारे में जानने के लिए स्टीडमैन की दिलचस्पी अधिक थी । न कि वनों की। एक समय में आबादी लगभग 30,0OOO थी, लेकिन समय के साथ यह घटकर मात्र 110 रह गई। इस भारी कमी का कारण क्या है?

चलिए मानते है कि भुखमरी शायद इसके लिए ज़िम्मेदार थी यह मानकर स्टिडमैन ने पूरे द्वीप पर खोजबीन की और द्वीप की पूर्व बस्ती के पास एक जगह पाई, जहाँ सालों पहले द्वीपवासी खाद्य जीवों की हड्डियों को खोदते थे। धीरे-धीरे चट्टान पर गाद की परतें बनती गई । उसकी खुदाई करके, स्टीडमैन ने न केवल प्रत्येक परत को खोदा और रेडियोकार्बन डेटिंग की, बल्कि हड्डियों पर आधारित खाद्य जीवों की भी पहचान की।

…. और इसके साथ ही ईस्टर आइलैंड का 1,500 साल पुराना रहस्यमय अतीत का दरवाजा खुल गया। जीवाश्मों में कुल 6433 जीवाश्म पाए गए, और प्रमुख लिंक जॉन लेनले और सारा किंग के शोध के साथ लिंक करके पहचाना गया । जीवित प्राणियों की हड्डियां ही अहम साबित हुईं। ईसके आधार पर डेविड स्टिडमें ने जंगल लुप्त क्यो हुए , क्वोरी में 600-700 बूत अधूरे क्यो रहे , और मानव बस्ती कम हो गई इसका भेद वैज्ञानिक तर्को से भाप लिया । यह घ्यस्फोट में सजीवों की हड्डियां अहम साबित हुई ।

ये सब किस तरह हुआ ये भी जान लेते है !

सन 900 से 1200 तक जे दशक में मिट्टी की जो परत बनी उसमे डॉल्फिन कंकालों मछलियों से ज्यादा थे । यह डिटेक्टिव ब्रैड डेविड स्टैडमैन के लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि प्रशांत महासागर में अन्य पॉलीनेशियन द्वीपों के लोग मछली पर बहुत अधिक निर्भर थे, जिनमें से बहुत से उन्हें प्रवाल भित्तियों में पाया गया था। ईस्टर का मौसम अपेक्षाकृत ठंडा था, इसलिए इसके किनारों पर कोई कोरल नहीं थे। मछली भी नहीं। द्वीपवासियों ने खुले समुद्र में डॉल्फ़िन का शिकार करते थे । डॉल्फिन स्तनधारियों है जिसे जाल में नहीं पकड़ा जा सकता है क्योंकि इसका वजन लगभग 75 किलोग्राम होता है। उसे हर्पून कहा जाने वाले भाले से ही मारना पड़ता हैं । है, और भाले को रस्सी से बांधना जरूरी है । मछली पकड़ने वाली नावों को भी बड़ा और मजबूत होना जरूरी था इस आधार पर डेविड स्टीडमैन ने निष्कर्ष निकाला कक वर्षों पहले ईस्टर द्वीप पर जंगल था जो नौकाओं के लकड़ी रस्सियों लिए बैले प्रदान करता था।

जंगल के अस्तित्व का एक और प्रमाण मिट्टी की निचली परतों में पाए जाने वाले समुद्री पक्षियों के कई कंकालों ने दिया । डेविड स्टिडमैन को पक्षी की छब्बीस प्रजातियाँ के जीवाश्म मीलके जिनमें वैगल, अल्बाट्रॉस, फ्रिगेट बर्ड आदि शामिल थे । उनकी पहचान की गई । वे अपने अंडे देने के लिए ईस्टर द्वीप पर घोंसले बांधते होंगे तभी तो द्वीपवासि उनका इतनी बड़ी संख्या में शिकार कर सके होंगे ।

समुद्री पंछियो के अलावा, लैंडफॉल, तोते, बाज जैसी आधा दर्जन प्रजातियां और भी मिली हैं। स्टीडमैन ने कहा कि ईस्टर इन सब का भी निवास था । यह सब यहां के जंगल की पहचान का सटीक प्रमाण था।

यदि डेविड स्टीडमैन एक के बाद एक मिट्टी की पपड़ी की परत को हटाकर जांच की तो अधिक आश्चर्य जनक बात यह सामने आई कि सन 1500 के बाद वाली परत में कोई जीवाश्म अवशेष नहीं थे। डॉल्फ़िन भी नहीं, लेकिन मानव जाति कंकाल अधिक बढ़ते गए । जिसका मतलब यह था कि द्वीपवासी डॉल्फिन और पक्षियों के भोजन अलभ्य बनने के कारण भोजन में स्वजाति भक्षण की ओर मुड़ गए थे।

ईस्टर द्वीप के अतीत का पता लगाने के लिए जॉन लेनली, सारा किंग और डेविड स्टीडमैन द्वारा की गई शोध पूरी होने के बाद अब ईस्टर के अतीत की श्रृंखला हम बना सकते है। सन 400 की आसपास यह द्वीप हरा और उपजाऊ था । जंगलों से सुशोभित था जब पोलारिसियन ईस्टर पर पहुंचे और यही पर में बस गए। अनुकूल वातावरण में पॉलिनेशियन समृद्ध बने और उनकी जनसंख्या में वृद्धि हुई। उन्होंने खेतों के लिए सैकड़ों पेड़ों को काट दिया । जब वन उत्पाद भोजन के लिए अपर्याप्त हो गया । वैसे यह विनाश सीमित था और नए अंकुरित पेड़ इसके इसकी कमी भर देते थे।

ईटर द्वीप के लिए पर्यावरणीय तबाही तब शुरू हुई जब लोगों ने मोई / मोआना के रूप में जाने जाने वाले पौराणिक देवता की पत्थर की मूर्तियों की खुदाई शुरू कर दी और मूर्तियों को बदलने के लिए बहुत सारे पेड़ों को प्राप्त करने के लिए पेड़ों को काटना शुरू कर दिया । समुद्र तट पर अधिक बड़ी मूर्तियों के निर्माण के लिए जनजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा भी जम गई। समय के साथ 887 मूर्तियों को बनाया गया है । अब प्रतियोगिता केवल आकार के बारे में नही थी, बल्कि द्वीप पर देखी जा सकने वाले बुतो की संख्या के बारे में भी थी। पेड़ों का इस्तेमाल खाना पकाने के लिए किया जाता था, सर्दियों में ठंडी समुद्री हवाओं से बचाव के लिए भी और दाह संस्कार के लिए भी । (ईस्टर के लोग दाह संस्कार में विश्वास करते थे, जबकि यह प्रशांत महासागर में अन्य पोलिनेशियन द्वीपों पर मृतकों को दफनाने की प्रथा थी था।)

फिर भी, अधिकतम पेड़ो का नाश मूर्ति के कारण हुआ । सन 800 के आसपास शुरू हुआ यह संहार, पांच सौ साल तक नहीं रुका। प्रत्येक विशाल प्रतिमा को बदलने के लिए दर्जनों नए पेड़ों को काटना पड़ा, क्योंकि उनका पुन: उपयोग नहीं किया जा सकता था । क्योंकि वे दो से पांच टन भारी बुतो के नीचे लुढ़कने से उसका इस्तेमाल दूसरी बार नहीं किया जा सकता था । क्योंकि उनका आकार ही बदल जाता था । जो किसी काम का नही था। सालो तक द्वीप जनजातियो की लापरवाही ने पेड़ों और लताओं को साफ कर दिया । जिनके रेशों को रस्सियों को बुनने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। परिणामस्वरूप, जंगल में 21 स्पिसिस के पेड़ विलुप्त हो गए, और द्वीप बंजर होता चला गया ।

हालांकि, परिणाम अंतिम नहीं था। जिसे अंग्रेजी में एनिट्स-मानसिक आपदा कहा जाता है वह सिर्फ शुरुआत थी। सन 1500 तक, सभी बड़े काठी के पेड़ों का अस्तित्व समाप्त हो गया । इसके कारण द्वीप के पक्षियों की छह प्रजातियां, जैसे तोते और बगुले विलुप्त हो गए। समुद्री पक्षियों का समुदाय भी सालाना प्रजनन करने के लिए या आराम करने के लिए द्विप आते थे वह भी बंध हो गया ।पराग और बीज के साथ-साथ इन पंखुड़ियों को खिलाने से जंगल को समृद्ध करने का महत्वपूर्ण कार्य भी रुक गया । मिट्टी की उपजाऊ मिट्टी को पकड़े हुए पेड़ों की जड़ें चली गईं और बारिश ने मिट्टी के पोषक तत्वों की ऊपरी परत को मिटा दिया और फिर सूरज की गर्मी के तहत सूखी मिट्टी तेज हवा में उड़ने लगी। गैर-उपजाऊ मिट्टी में, फसल की पैदावार में गिरावट होती रही ।
पर्यावरण की प्राकृतिक व्यवस्था एक बिलियर्ड गेम की तरह है , एक बार हस्तक्षेप कर दे तो उसका प्रभाव हर हिस्से पर पड़ता है । ईस्टर द्वीप पर मूर्तियाँ ने पेड़ों के विनाश का एक दुष्चक्र ही चला दिया ।

पुरातत्वविद डेविड स्टीडमैन के अनुसार, डॉल्फिन जैसी जीवाश्म लगभग 1500 के बाद से कंकालों की भूमिगत चट्टानों से गायब हो गई हैं। यह अपरिहार्य था, क्योंकि द्वीप पर एक भी पेड़ डॉल्फिन के शिकार और ठोस लकड़ी के लिए एक मजबूत निर्मित मछली पकड़ने वाली नाव बनाने के लिए आवश्यक लकड़ी प्रदान नहीं कर सकता था। डेविड स्टीडमैन ने 1500 के बाद परत में बड़ी संख्या में समुद्री घोंघे के ढाल पाए। पुरातत्वविद ने अनुमान लगाया कि द्वीप वासी, भोजन के लिए हाथ-पांव मारने लगे थे , अब तो तटीय समुद्र में उथली बोतलों में डुबकी लगाते हैं और घोंघे के साथ काम चलाने लगे थे । लेकिन यह भी कब तक? कुछ ही समय बाद द्वीपवासियों को भूखे मरने का समय आ गया है – और इसका वास्तविक प्रमाण यह है कि 16 वी सदी के अंत और 17 सदी की शरुआत में जो बूत तैयार किये गए उन सब के मूर्तियाँ चोप्स बैठी हुई थीं और छाती की पसलिया दिखाई दे रही है । दो या तीन पीढ़ियों के बाद, द्वीप के निवासियों ने भुखमरी से बदले हुए उनके शरीर को सहज मान लिया ।

लेकिन तबाही यहीं खत्म नहीं हुई। ईस्टर के मूल निवासी द्वीप पर कैद थे। प्रतिकूल बना हुआ पर्यावरण को छोड़कर सागरपार दूसरे द्वीप जाना ही सही था लेकिन वह नावों की कमी के कारण संभव नहीं था । क्योंकि भोजन की कमी थी। इस स्थिति में जनजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा अधिक से अधिक बड़ी मूर्तियों के निर्माण तक सीमित होने के बजाय आदमखोरी तक पहुँच गई।

संभवत: 1680 के दशक में द्वीप के दो मुख्य कबीले नरभक्षी हो गए और उनके बीच का गृहयुद्ध लगभग 150 वर्षों तक चला और इस द्वीप की आबादी 1877 तक घटकर 110 के निम्न स्तर पर आ गई। प्रतिद्वंद्वी समुदायों ने इसे तोड़ने के इरादे से एकमाक की प्रतिमा को भी उखाड़ फेंकन शरू कर दिया । अंतिम प्रतिमा 1864 में जमीं दोस्त की गई। 600-700 अपूर्ण प्रतिमा रानो राराकू में क्वेरी में जैसी की तैसी पड़ी रही । जबकि अन्य 97 मूर्तियाँ किनारे के रास्ते पर ही अटक गई थीं । ईस्टर पर कब्जा करने के बाद चिली सरकार ने कुछ मूर्तियों को स्थायी मुद्रा में फिर से स्थापित किया।

ईस्टर की कहानी जानने के बाद, सवाल उठता है कि वहाँ के निवासियों ने कभी भी दुर्भाग्य का एहसास क्यों नहीं किया ? और पर्यावरण का विनाश करने वाली प्रवृति को समय रहते रोका क्यो नही ?

प्रश्न के तीन उत्तर हैं। पहला यह है कि अबुध द्वीप के लोगों को इस बात की समझ ही नहीं पाए कि पर्यावरण क्या है और इसके साथ छेड़छाड़ के परिणाम क्या आ सकता हैं ! दूसरा द्वीप के पर्यावरण रातो रात नही खतरे में आया , तबाही सैकड़ों वर्षों तक चली । ईसलिए पर्यावरणीय अवनति का परिणाम आत्म-खोज के रूप में कभी आया ही नही । तीसरे प्रश्न का उत्तर यह है कि यदि द्वीप वासियों को अपनी लापरवाही की गंभीरता का एहसास होता, तो भी वे मूर्तियों को खड़ा करने की आदत छोड़ देते ?

इस तीसरे प्रश्न का जवाब इक्कीसवीं सदी की वर्तमान दुनिया के संबंध में जरा सोचिये ! जैसा कि पृथ्वी को ग्रीनहाउस प्रभाव की ओर धकेला जाना जारी है । मानव जाति हर साल वायुमंडल में अरबों टन कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ती है । जिससे अकार्बनिक ईंधन जलता रहता है। यह प्रतिवर्ष हजारों वर्ग किलोमीटर जंगलों को साफ कर रहा है। वर्षों से कई जीव उसके हाथों विलुप्त हो गए हैं। यह ओजोन की सुरक्षात्मक परत में भी छेद होने लगा है। तेल टैंकरों ने मैक्सिको सिटी और लॉस एंजिल्स जैसे शहरी वायु प्रदूषण के कारण गैस के चैंबर बनकर समुद्री जीवन पर कहर ढा दिया है । फिर भी मानव जाति उस गतिविधि से जुड़ती है जो पर्यावरण को खत्म कर रही है। भविष्य में क्या होगा इसका अंदाजा लगाने के लिए बहुत दूर तक दृष्टि पहुंचाने की जरूरत नही है। ईस्टर का उदाहरण हमारे सामने है !

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