दुनिया का एक मात्र इंसान जो कान से रंगों को देखता हैं !

दुनिया का एक मात्र इंसान जो कान से रंगों को देखता हैं !

दुनिया का एक मात्र इंसान जो कान से रंगों को देखता हैं !

नवजात शिशु शरुआत के दिनों में आंशिक रूप से वर्णान्ध /colour blind रहता लेकिन फिर अलग-अलग रंगों को पहचानें की क्षमता का संवर्धन हांसिल कर लेताक़ हैं । उत्तर आयरलैंड के बेलफास्ट शहर।में जूलाई 27, 1982 के दिन जन्मे नील हर्बिसन के मामले में ऐसा नहीं हुआ। इसलड़के की आंखों में रंग दृष्टि खिली ही नहीं । काला और सफेद रंग तक सीमित ही रह गई । जिन्हें सही मायनों में रंग कहा ही नही जा सकता । चीज काली तब दिखाई देती है उसकी सतह प्रकाश के सातों रंगों को शोषित कर ले और एक भी रंग को प्रतिबिंबित न करें। दूसरी ओर सात रंग
मिलावट और उन्हें सफेद करना उसे बेरंग बनाता है। मेडिकल भाषा मे Achromatopsia नामक खामी नील हर्बिसन की नजर के लिए के रंगों को समाप्त कर दिया । वह भी इस हद तक कि इंद्रधनुष को देखने का आंनद भी उसने गवा दिया। सामान्य आंखों वाले सभी की आंखों को इंद्रधनुष दिखाई देता है, लेकिन हर्बिसन के लिये उसका अस्तित्व ही नहीं था ।

मानव आँख में रंग दृष्टि उत्क्रांति के दौरान धीरे-धीरे विकसित हुई । प्राचीन काल में यह कोई जीव रंग की परख नही कर सकता था । दुनिया के रंगों से सजीव कोई फर्क नही पड़ता था । आज से 6.5 करोड़ साल पहले पृथ्वी ओर फूलों की वनस्पति प्रकट होने पर माहौल रंगीन हो गया। विकासवाद का सिद्धांत को प्राकृतिक चयन कहा जाता है । शारीरिक ख़ासियत के अनुसार
एक जीव को बनाए रखने के लिए जो जरूरी नहीं है वह कभी नहीं रहता और दूसरी ओर इसकी ख़ासियत जो अस्तित्व के लिए अपरिहार्य है वह म्यूटेशन द्वारा जल्दी-जल्दी खिलता है । इसी के तहत मनुष्यों में दूर के पूर्वजों की तरह निशाचर बंदरों को रंग दृष्टि की आवश्यकत नहीं थी क्योंकि रात में घास-पात, छिपकली, छिपकली आदि भोजन को रंग कर पहचान करने का कोई सवाल ही नहीं था। दक्षिण अमेरिका के घने अमेज़न जंगल में कई असली बंदर निशाचर ही बने रहे ।

लेकिन अफ्रीका के बंदरों के लिए माहौल अलग था। अंधेरे जंगल इसके बजाय वहाँ एक खुला खेल का मैदान था । रात के बदल दिन के दौरान जीवन के निर्वाह करने के लिए अधिक सुविधाजनक था। नतीजतन अफ्रीकी बंदरों में प्राथमिक किस्म का कलर का विजन विकसित हुआ। । अधिक समय जाते ये बंदर अलग अलग किस्म के रंग के बीच के अंतर को समझने लगे । आखिरकार, उनके वंशज लगभग मानव तो 10,00,000 तरह के के रंगों के शेड्स को समझने के लिए सक्षम हो गया। मनुष्यों में वे नील हार्बिसन जैसे कुछ अपवाद भी है । जिनमे आंशिक रूप से नहीं पूरी तरह से वर्णान्ध रह गए ।

हार्बिसन स्कूल में पढ़ते समय रंगीन मुद्रित पाठ्यपुस्तकों ने उसे भ्रमित कर दिया था। एक लाल पृष्ठभूमि पर काला लाल रंग के साथ मिल जाते थे। पेंटिंग्स के पिरियड में सहपाठी एक ग्रीन रंग माँगता था तो वह है तो भूरे रंग को पास-ऑन करता था। (शिक्षक ने सिर्फ काले और सफेद में पेंटिंग्स करने की अनुमति दी थी ), उनके विचार में सभी रंग उसके लिए समान ही थे तो वज हमेंशा काली पैंट और सफेद शर्ट पहनता था । खाने के दौरान उसे चखने के बाद ही वह उन्हें पहचान सकता था । ट्रैफिक सिग्नल के रंग पहचानने में कठिनाई हो रही थी तो इसलिए उसे मोटर दें ड्राइविंग लाइसेंस नहीं मिला। उषा के साथ-साथ संध्या का केसरिया और सिंदूर जैसे रंग नील हर्बिसन को धूल जैसे लगते थे। केवल रात के समय ऐसा होता था जब आसपास के परिवेश को जैसे के तैसे रूप में देखता था । फिर भी शहर के चमकदार को बना देते नियॉन संकेत के रंग उसके समझ से बाहर थे। रोजमराह के जीवन में ऐसी दुविधा नील हर्बिसन परेशान करती थी ।

नेत्र विज्ञान के शब्दकोश के अनुसार उसे अक्रोमैटोप्सिया कहा जाता है । दृश्य हानि का कारण समझ ने जैसी है। रंग के तीन मूल रंग लाल, पीले हैं और नीला है। किसी भी द्रश्य के किरणों को पकड़ ने का काम पैटर्न द्वारा रेटिना के पीछे आंतरिक सतह पर सूक्ष्म कोशिकाएं करती हैं।

कोशिकाओं के प्रकार है । जिनका नाम उनका आकार के आधार पर रखे गए हैं। एक तरह की कोशिका दंडी के आकार की होती है, उनके लिए उनको rod कहा जाता है तो दूसरी तरह की कोशिकाएं शंकु होने के कारण शंकु जाना जाता है। रेटिना में लगभग 12 करोड़ rod रंग को आंकते हैं । लेकिन रंगों को वह परख नही सकते । लेकिन प्रकाश के प्रति संवेदनशील है । इसलिए रात के समय नजर करके दृश्य को पहचान लेते है । चाँद-तारे की मंद रोशनी भी उसके लिए पर्याप्त होती है। निशाचर जानवरों के अपेक्षाकृत बड़ीआँखें ऐसी प्रकाश-संवेदनशील कोशिकाएँ के साथ भरचक होने से , उल्लू , बंदर, टार्सीयर जानवर और उल्लू और चिबरी इसके उदाहरण हैं ।

ये कोशिकाएं रंजित नहीं हैं, मनुष्य की रंग दृष्टि शंकु /नामक कोशिकाओं के कोशिकाओं के कारण ये मुमकिन है । जिनकी संख्या 65 लाख जितनी है । ये कोशिकाये रोडज की तरह नेत्रपटल के पीछे भीतर की सतह पर होते है । कोन्स तीन प्रकार के होते हैं और हर प्रकार एक निश्चित तरंग लंबाई के प्रकाश किरणों के प्रति संवेदनशील होते है । एक तरह के कोन्स 459 नैनोमीटर की तरंग दैर्ध्य (भूरा) किरणें, अन्य प्रकार के कोन्स 525 नैनोमीटर वेवलेंथ (हरा) किरणों और तीसरे प्रकार के कोन्स 555 नैनोमीटर (लाल) की तरंग दैर्ध्य किरणों को अधिक स्पष्ट रूप से पहचानते है।

प्रकाश के तीन मूल रंग हैं । जिसकी मिलावट विभिन्न अनुपातों में होने से टेलीविजन स्क्रीन की तरह दूसरे अनेक रंग को बना देती है।

आयरलैंड में जन्मे और स्पेन में बसे नील हर्बिसन की आँखों के कोन्स रंग किरणों के प्रति संवेदनाएं नहीं हैं। कुछ मामलों में मस्तिष्क का सेरेब्रम / सेरिबैलम के लिए दुर्घटना जबसे जब नुकसान होता है तब संवेदना चली जाती है और Achromatopsia रोग होता है, लेकिन हैरिसन की बीमारी जन्म से है । जेनेटिक गुणसूत्र 10 के PDEGC के रूप में ज्ञात जीन में हुए उत्परिवर्तन का कारण है। अब कोई भी इलाज उसे रंग दृष्टि नहीं दे सकता।

नहीं हो सकता इसका कोई अफसोस आज हर्बिसन को नहीं । बिलकुल नहीं क्योंकि उनके जीवन में आधुनिम टेक्नोलॉजी ने रंगों का खालीपन अच्छी खासी हद तक भर दिया है । आज भले वह अपनी आंखों से भी रंग देखा नहीं कर सकता, लेकिन कान से ध्वनि के संदर्भ में सुन सकते हैं ! रंगों को पहचानता है !

बात यू बनी की अक्टूबर 2003 में, उन्होंने साइबोर्ग क्षेत्र के एडम मोंटेंडन नाम के विशेषज्ञ को मिला । और बातचीत के दौरान मिले और उन्हें अपनी समस्या के बारे में बताया। (साइबोर्ग अर्थात साइबरनेटिक जीव, जिसमें प्रोस्थेसिस के साथ प्राकृतिक त्रुटि कृत्रिम अंग से पूरी की जाती है। दोनों का समन्वय वाली व्यक्ति साइबरबोर्ग / साइबोर्ग कहा जाता है। एडम मोंटेंडन की दिलचस्पी जगी और कोई तकनीक खोजने के लिए नील हर्बिसन पर साइबरनेटिक्स स3 संबंधित प्रयोग शुरू किये ।

प्रयोगों का अपेक्षित परिणाम आया। हार्बिसन एक साइबरबॉगर बन गया – ऐसा कहो की eyebrog बन गया । उसका आज सिर पर लगा एक छोटा कैमरा है । कैमरा मिनी एक आकार माइक्रोप्रोसेसर के साथ है । हर्बिसन की आँखों के सामने ऑब्जेक्ट का दृश्य कैमरे में कैद होता है । उन मूल रंगों को माइक्रोप्रोसेसर ध्वनि की एक विशिष्ट आवृत्ति के साथ लहरों में बदल देता है उस आवृत्ति की (ध्वनि कंपन) है, जिसके आधार पर वस्तु का रंग ज्ञात होता है। पेशे से हैरिसन एक चित्रकार है । इसलिए रंगीन चीज का चित्र उसी रंग के बना सकता है।

विधि समझ लेते है। विविध रंगों का वुविड कंप संख्या में ‘ भाषांतर ‘ कर देती चिप हैरिसन के सिर पीछे की ओर खोपड़ी में चिपका रहा इस तरह से बनाई गई है। कंपन संख्या को यानी कि आवृत्ति को हर्ट्ज में नापा जाता है । जजसे जीके दिए गए कोष्टक के अनुसार प्रकाश के सात अलग-अलग हर्ट्ज पर रंग दिए गए है। (क्रमशः सभी रंगों के प्रारंभ जानीवालिपिनारा है। संक्षिप्त अंग्रेजी शब्द के अनुसार VIBGYOR है)। एक दिलचस्प बिंदु यह कि तालिका में दिखाए गए केवल 7 रंग हमारे लिए द्रश्य हैं । बैंगनी से अधिक तरंग दैर्ध्य के पराबैंगनी किरणों से अधिक तरंग दैर्ध्य की इन्फ्रारेड किरणें को हम देख नहीं सकते। हर्बिसन को यहां तक ​​कि वे ध्वनि के माध्यम से भी वह किरणे भी ‘दिखाई देते हैं।

एक बात अभी भी कहानी बाकी है कि इस दुनिया मे केवल सात रंग नही बल्कि उनकी कई संख्या में शेड्स हैं। जैसे थोड़ा लाल रंग गुलाबी दिखाई देता है और बहुत हल्का हरा तोता जैसा दिखता है। नील हर्बिसन को मालूम कैसे होता है की यह 20.15 हर्ट्ज की ध्वनि नारंगी नहीं है बल्कि उसकी फिक्का रंग ब्राउन हैं? ध्वनि की मात्रा उसे रंग परिचय करवा देती है । ऊँची आवाज नारंगी संकेत और मंद ध्वनि भूरे रंग का एक संकेतक माना जाता है। बिल्कुल इसी तरह रंग को पहचानना आसान काम नहीं है। यदि मात्रा बहुत अधिक है, बहुत मध्यम है, बहुत ज्यादा अधिक या कम हो और उन उतार-चढ़ाव में भी अलग हो तो ध्वनि में सूक्ष्म अंतर को सटीक रूप से समझे ने क्षमता होनी चाहिए – और वह क्षमता हार्बिसन में है।

2007 में एक कंप्यूटर प्रोग्रामर ने विशेष उन्नत सॉफ्टवेयर तैयार किया । उसके बाद, हार्बिसन 360 तरह के अलग अलग रंगों के शेड्स को पहचान सकता हैं। किसी भी तरह की तस्वीर उसके मूल रंग के अनुसार बनाने के लिए इतने सारे रंग इतना काफी है। इन रंगों का उपयोग करके आदमी की आँखें, होंठ,आइब्रो, बाल, शर्ट, कोट आदि पर एक साथ कैमरा फोकस करके जैसे के तैसे चित्र बना देता हैं। चित्रों में पात्रों से बना गणमान्य व्यक्तियों में ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स, अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर, फिल्म ‘टाइटैनिक’ के हीरो लियोनार्डी डिकैप्रियो और हॉलीवुड जिसमें कॉमेडियन वुडी एलेन भी शामिल है। किसी व्यक्ति की रंगीन तस्वीर को आधार बनाकर पोट्रेट नही बनाता क्योंकि फोटो के रंग असल जैसे नही होते। जैसे कि गोरी त्वचा वाले व्यक्ति का चेहरा उसमे लाल रंग का लगता है।

नील हर्बिसन एक आईब्रो बना तब उसे एक नई ‘दृष्टि’ मिली और उसने काम कई मायनों में आसान हो गया है। एक बार काम थोड़ा मुश्किल हुआ जब पासपोर्ट रिन्यू कराते समय पासपोर्ट कार्यालय उनका कैमरा वाला फोटो स्वीकार नहीं किया गया था। कैमरा एक आदमी के चेहरे के हिस्से के रूप में नहीं गिना जाता है । जो उसे कहा गया । हर्बिसन ने दलील की की कैमरा उनके मस्तिष्क का ही हिस्सा है । जिसके माध्यम से मस्तिष्क अलग अलग रंगों को पहचानता है। इसलिए उसे शरीर एक अविभाज्य हिस्सा माना जाना चाहिए। विवाद लंबे समय तक चला, लेकिन कई विशेषज्ञों से सिफारिश के पत्र प्राप्त करने के बाद पासपोर्ट कार्यालय को आखिरकार उसे स्वीकार करना पड़ा । नील हर्बिसन का कैमरा आज उस्की पहचान बन गया ही और हर्बिसन ने उसी से दुनिया को जाना है। वैसे उसकी तरह दुनिया के दूसरे सैकड़ों लोग उसकी तरह अपनी दुनिया रंगीन बनाने के लिए राह देख रहे है।

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