नेनो पनडुब्बी कैसी होती हैं ?

नेनो पनडुब्बी कैसी होती हैं ?

नेनो पनडुब्बी कैसी होती हैं ?

भारतीय नौसेना की प्रस्तावित की गई नेनो पनडुब्बी

12 अगस्त, 2000 को दिन नॉर्वे के उत्तर में बार्ट्स सागर में ‘कुसर्क ’नाम की एक रशियन पनडुब्बी का एक्सीडेंट हो गया । सबमरीन 104 मीटर की गहराई में सागर के तल पर फंस गई । अब अपंग बनी पनडुब्बी को वापस सतह पर लाया नही जा सकता था। दूसरी ओर नाविकों को बचाने के लिए उस सबमरीन में बेक अप की व्यवस्था नहीं थी। परिणामस्वरूप, कुल 118 रूसी नौसेनाओं और अधिकारियों ने पनडुब्बियों में ऑक्सीजन की कमी के लिए मारे गए।

इस तरह की दुर्घटनाएं दुर्लभ हैं, लेकिन जब वे होती हैं, तब वह बहुत नुकसान करती हैं । भारत ने हाल ही में नौसेना में पनडुब्बियों के बेड़े को बढ़ाने के लिए दुर्घटनाग्रस्त पनडुब्बियों के नाविकों को बचाने के लिये नैनो की पनडुब्बियों की खरीद ने का निर्णय लिया। दुर्घटनाग्रस्त हुई पनडुब्बी के बचाव के लिए जाने वाली ‘नैनो’ पनडुब्बी केसी होती ही ये इस लेख में पढ़िए।

भारतीय नौसेना के लिए ‘अरिहंत’ नामक परमाणु पनडुब्बी बनने के वर्षों बाद परमाणु समस्या ने और गंभीर रूप ले लिया है: मान लीजिए कि अरिहंत की एक दुखद दुर्घटना हुई । यऔर वह समुद्र के तल पर बैठ जाती हैं, तो नाविकों को कैसे बचाये ? और केवल अरिहंत ’ही क्यों के लिये? किसी भी समय भारत की पनडुब्बियों में से कोई भी अकस्मात का भोग बन सकती है। सुरक्षित रूप से नाविकों कोसतह पर लाने के लिए भारतीय नौसेना के पास लगभग कोई व्यवस्था नहीं है।
जर्मनी की कुछ पनडुब्बी में 40 नाविक शामिल हो सके ऐसी एस्केप केप्स्यूल वाली होती है । समुद्र के तल पर आकस्मिक पनडुब्बी नाविक डूबने पर ‘इस्केप केप्स्यूल ‘ में बैठकर वोटर टाइट दरवाजो को सील कर देते है । जैसे ही इमर्जन्सी बटन दबाया जाता है एस्केप केप्स्यूल सतह पर चलने के लिए निकल पड़ती है। नौसैनिक जहाज आखिरकार उन सभी नाविकों को बचा लेता है ।

इस प्रकार की बचाव प्रणाली हालांकि भारतीय नौसेना सभी पनडुब्बियों में नहीं। नतीजतन, नौसेना ने निरीक्षकों नामक एक सर्वेक्षणकर्ता जहाज तैनात किया है। जहाज छोटे डिप ब्लॉक्स से लैस ही लेकिन दो-तीन से अधिक नाविक उसमे समा नही सकते। नाविकों के पास समदबाव पोशाक होते है । जिसे पनडुब्बी से बाहर निकलने के लिए पहना जा सकता है। हालांकि, केवल ये पोशाक तब काम आते है जब पनडुब्बी 50-100 मीटर की गहराई में हो । क्योंकि ज़्यादा गहराई में ये सूट नाविकों की रक्षा नहीं कर सकता।

नाविकों को बचाने वाली नेनो पनडुब्बी

भारतीय नौसेना ने नाविको को बचाने वाली व्यवस्था के बिना ही लगभग चालीस साल चला लिया। अब जब अकुला ’वर्ग रूसी पनडुब्बी खरीदने और अरिहंत ’वर्ग जैसी परमाणु पनडुब्बी बनाने का कार्यक्रम चल रहा है तो इस तरह के साधनों का अभाव बिल्कुल योग्य नही है।

वर्तमान की कामचलाऊ व्यवस्था ये है कि भारतीय नौसेना की कोई पनडुब्बी बीच समंदर में आफ़्तग्रस्त होती है तब अमेरिका उस पनडुब्बी की ओर उसकी DEEP SUBMERGENCE RESCUE VEHICLE / तथाकथित मिनी पनडुब्बी को वायु सेना के परिवहन विमान द्वारा भेजा जाता है । जिसके लिए भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका को लगभग 100,000 $ का भुगतान किया है ।


वैसे भारत की योजना 250 करोड़ रुपये की डीएसआरवी खरीदने की है। दो डीएसपीवी मिनी पनडुब्बियां पश्चिम और पूर्वी तटों के लिए बसाना चाहता है । हर अमेरिकी ने डीएसवी से बैटरी पावर्ड है जो कुल 6 नाविकों को समा सकती हैं।

समंदर में जाने के बाद निचले हिस्से में गोल दरवाजे की फ्रेम को आफ़त में फंसी पनडुब्बी के किसी दरवाजे के साथ फिट कर दिया जाता हैं। फिर आमने सामने के दरवाजो को खोल दिया जाता हैं। फ़िर नाविक उसमे से सुरक्षित वापिस आ जाते है । इस तरह से तीन से चार फेरे कर ने बाद दुब रही पनडुब्बि के नाविकों को बचाया जाता है। अमेरिका ने भारत के साथ डीएसआरवी का व्यवहार मान्य किया था लेकिन उसकी डिलीवरी इस साल 2020 में मिलने वाली है । शायद आप ये पढ़ रहे ही तब मिल भी गई हो ।

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