प्राचीन भारत की 16 लेखन सामग्री

By | October 5, 2020

प्राचीन भारत की 16 लेखन सामग्री

प्राचीन भारत में लिखने के लिए अनेक प्रकार की सामग्री का उपयोग किया गया। इस सामग्री-चुनाव के मूलतः दो आधार थे – पहला तो सामग्री की सुलभता और दूसरा लेखन विषय। ग्रन्थ और पत्राचार के लिये मुलायम और शीघ्र नष्ट होने वाली सामग्री का प्रयोग होता था जबकि धार्मिक प्रज्ञापनों, राजाओं की प्रशस्तियों और कानूनी दस्तावेजों के लिये प्रस्तर, तांबा, लोहा और चांदी आदि जैसी चिरस्थायी रहनेवाली सामग्री का। इस सामग्री का विवरण निम्नलिखित है –

( ०१ ) भूर्जपत्र (भोजपत्र)

प्राचीन भारत में ग्रन्थों और लम्बे दस्तावेजों के लेखन के लिए सामान्यतः भोजपत्र का उपयोग व्यापकरूप से किया जाता था। भूर्जपत्र भुर्ज नामक वृक्ष की भीतरी छाल है जो हिमालय में बहुत मिलती है। कर्टियस लिखता है कि भारतीय लिखने के लिये भोजपत्र का प्रयोग करते हैं। इसके विपरीत निआर्कस सूती कपड़ों पर पत्र लिखने का उल्लेख करता है। अमरकोष में वन्य उत्पादनों के अन्तर्गत भुर्ज का उल्लेख किया गया है। कालिदास के कुमारसंभव में बताया गया है कि विद्याधर युवतियां भोजपत्र पर प्रेमपत्र लिखा करती थीं। परवर्ती उत्तरी बौद्ध तथा व्राह्मण ग्रन्थों के लेखन में भोजपत्र प्रयुक्त होने का वर्णन मिलता है।

भोजपत्र

अलबेस्नी लिखता है कि “मध्य और उत्तर भारत के लोग “तूज” (भूर्ज) वृक्ष की छाल पर लिखते हैं। उसको “भूर्ज” कहते हैं। वे उसके प्रायः एक गज लम्बे और एक बालिश्त चौड़े पत्ते बना लेते हैं और उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकार से तैयार करते हैं। उनको मजबूत और चिकना बनाने के लिये वे उन पर तेल लगाते हैं और उसे घोटते हैं, फिर उन पर लिखते हैं।” मुगलकाल में कागज के रूप में जब लिखने के लिये एक अच्छी सामग्री हाथ आ गयी तो काश्मीर में भूर्जपत्र तैयार करने की कला लुप्त हो गयी। काश्मीरी पंडितों के पुस्तकालयों में और उड़ीसा में भोजपत्रों पर लिखी पुस्तकें मिलती है। प्रतीत होता है कि भोजपत्र का प्रयोग सबसे पहले उत्तर-पश्चिम भारत में प्रारम्भ हुआ किन्तु शीघ्र उत्तर, मध्य पूर्व और पश्चिमी भारत में भी इसका उपयोग होने लगा।

( ०२ ) ताड़पत्र

ताड़ या ताल और ताड़ी या ताली वृक्ष दक्षिण में समुद्रतटीय प्रदेशों में बहुतायात से और राजस्थान तथा पंजाब में विरल रूप से पाये जाते हैं। ये टिकाऊ, सर्वसुलभ और सस्ते होने के कारण प्राचीनकाल से ही लिखने में प्रयुक्त होते रहे हैं। कश्मीर और पंजाब के कुछ भाग को छोड़कर सारे देश में इसका बहुत प्रचार था। पश्चिमी तथा उत्तरी भारत में स्याही से लिखा जाता था।
किन्तु दक्षिणवाले तीक्ष्ण गोलमुख वाली शलाका से उन पर अक्षर उत्कीर्ण करते थे। पुनः उन पर काजल का लेप कर देने से अक्षर उभर आते थे। बौद्ध जातकों में लेखन सामग्री के रूप में पण्ण ( पर्ण या पत्ती) का उल्लेख मिलता है। स्पष्टतः यहां ताडपत्र की ओर संकेत किया है। हुई ली लिखित वेनसांग की जीवनी से पता चलता है कि बुद्ध निर्वाण के शीघ्र बाद सम्पन्न हुई प्रथम बौद्ध संगीति में त्रिपिटक का लेखन ताड़पत्रों पर हुआ था। किन्तु वेनसांग के भारत आने से पूर्व भी इस देश में ताड़पत्र पर लिखने के कई प्रमाण उपलब्ध हैं। तक्षशिला ताम्रपत्र निश्चय ही पहली शती ई. के बाद का नहीं है। इसके उत्कीर्णक ने ताड़पत्र को अपना आदर्श चुना।

ताड़पत्र

ताड़पत्र पर लिखित प्राचीनतम पाण्डुलिपि एक नाटक के कुछ अपूर्ण अंशों के रूप में प्राप्त हुई है जिसका समय दूसरी शती ई. निर्धारित किया गया है। काशगर में ढूंदी गयी मकार्टनै के ताड़पत्रों के टुकड़े चौथी शती ई. के और जापान के होरियूजि के मठ में सुरक्षित “प्रज्ञापारमिता हृदयसूत्र” तथा “उष्णीषविजयधारिणी” नामक बौद्ध ग्रन्थ की पाण्डुलिपियां जो मूल रूप से मध्य भारत में लिखी गयी थीं और बाद में जापान ले जायी गयीं, छठी शती ई. की हैं। इस प्रकार होरियूजि की हस्तलिखित प्रति, गाडफ्रे संग्रह के पन्ने, नेपाल, बंगाल, राजस्थान और उत्तरी दकन से प्राप्त नवीं और परवर्ती शतियों के हजारों हस्तलिखित ग्रन्थों से प्रमाणित होता है कि ताड़पत्रों पर अत्यन्त प्राचीनकाल से रोशनाई से लिखा जाता था।

( ०३ ) कागज

सामान्य धारणा है कि कागज का आविष्कार सबसे पहले 105 ई. में14 चीन देश में हुआ और भारत में इसका चलन.मुसलमान शासकों द्वारा किया गया। तो भी, इस मत के विपरीत यूनानी लेखक निआर्कस जो सिकन्दर के भारत आक्रमण में उसके साथ था, लिखता है कि “भारत के लोग रुई को कूटकर लिखने के लिए कागज बनाते है।” इस कथन से विदित होता है कि ई.पू. चौथी शती में यहां के निवासी चिथड़ों से कागज बनाते थे। किन्तु यह सस्ता और सुलभ नहीं था, अतः भूर्जपत्र या ताड़पत्र का व्यापक प्रयोग होता था। डा. राजेन्द्रलाल मित्र का कथन है कि परमार शासक के एक उल्लेख से प्रमाणित होता है कि मालवा में ग्यारहवीं शती ई. में लिखने के लिये कागज का उपयोग होता था। गुजरात से भी कागज पर लिखी एक पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है जिसका समय 1223-24 ई. है। भारत में मिली कागज पर लिखी यह पाण्डुलिपि प्राचीनतम है।

इससे अधिक प्राचीन कोई हस्तलिखित पुस्तक नहीं मिल सकी। इसका मुख्य कारण भारत की जलवायु है जिसमें कागज बहुत.अधिक समय तक नहीं रह पाता।

( ०४ ) कास पद

रुईया कपास का कपडा जिसको पट कहते हैं प्राचीनकाल से लिखने के काम आता रहा है। आज भी इसका उपयोग होता है। कागज के समान ही इसको भी लेखन के.उपयुक्त बनाया जाता था। पहले इस पर आटा की पतली लेई.लगाकर सुखाया जाता और फिर शंख आदि से घोटकर चिकना.किया जाता था। तब पट तैयार हो जाता था। कुंदी किये कपड़े का उल्लेख निआर्कस के अतिरिक्त नासिक अभिलेखों में मिलता है। इनमें कहा गया है कि शासकीय और अर्द्धशासकीय सभी प्रकार के अभिलेख पट, पट्टिका या कार्यासिक पट पर अंकित किये जाते थे। कर्नाटक के व्यापारी आज भी अपनी बहियों के लिये एक विशेष प्रकार के कपड़े का उपयोग करते हैं जिसे कडतम् कहते हैं। इन्हें इमली के बीज की लेई लगाकर सुखाते हैं।

तत्पश्चात् इसे कोयला से काला कर देते हैं तब फिर उस पर खड़िया से लिखते हैं। इस प्रकार के दो-तीन सौ वर्ष पुराने.शताधिक कडतम् श्रृंगेरी मठ से प्राप्त हुए हैं। जैसलमेर के.वृहद् ज्ञान-कोष में ब्यूलर को. रेशम की एक पट्टी पर लिखी जैन-सूत्रों की एक सूची मिली थी जिस पर स्याही से लिखा गया.था। पीटरसन को अनहिलवाड पाटण के जैस ग्रन्थ भंडार में 13 इंच लम्बे और 5 इंच चौड़े कपड़े के 93 पत्रों पर श्रीप्रभसूरी नामक ग्रन्थ मिला था। कपड़े पर पत्रा विरचित धर्मविधि बनाकर उस पर पुस्तक लिखे जाने का यही एकमात्र उदाहरण अभी तक मिला है। पटों पर रंगीन नक्शों का संग्रह प्रायः जैन मंदिरों में मिलता है। इसी प्रकार ब्राह्मणों के यहां सर्वतोभद्र लिंगतोभद्र आदि मंडलों के पट पर रंगीन तथा मातृकास्थापन , गृहस्थापन के सादे नक्शे मिलते हैं।

( ०५ ) काष्ठ फलक

भारत में काष्ठ की पटिटयों पर लिखने की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है और आज भी जब स्लेटों का व्यापक प्रचार हो गया है, तब भी ग्रामीण पाठशालाओं के विद्यार्थी काष्ठ की पट्टियों पर ही गिनती और पहाड़े सीखते हैं। विनयपिटक के पाराजिक खण्ड में बौद्ध भिक्षुओं को धार्मिक आत्महत्या के उपदेश “उत्कीर्ण” करने का निषेध किया गया है। इससे ज्ञात होता है।कि बुद्ध से पूर्व यती-मुनि अपने भक्तों को बांस या लकड़ी की।पट्टी पर किसी प्रकार के नियम खोदकर देते थे। इसी प्रकार,
जातक कथाओं और परवर्ती ग्रन्थों में लकड़ी के फलक का।उल्लेख मिलता है जिन पर विद्यार्थी पाठशालाओं में लिखते थे।

काष्ठ फलक

बांस की शलाकाएं बौद्ध भिक्षु पासपोर्ट (बीजा ) के रूप में प्रयोग।करते थे। फलक का उल्लेख ललितविस्तर26 में भी मिलता है। पश्चिम भारत के क्षत्रप नहपान के समय के एक नासिक अभिलेख में एक ऐसे फलक का उल्लेख मिलता है जोननिगम-सभा में टंगा रहता था। इस पर लेन-देन का ब्यौरा लिखा जाता था। इसी प्रकार कात्यायन और दण्डी फलकों के उपयोग की बात कहते हैं। भारत में काष्ठ फलक पर लिखी कोई पुस्तक अभी तक नहीं मिली। किन्तु ब्यूलर लिखते हैं कि बोडलीन पुस्तकालय में फलको पर लिखी एक पुस्तक है, जो असम से वहां पहुंची।

( ०६ ) चमड़ा

भारत में लेखन सामग्री के रुप में पत्ते, छाल और काष्ठ फलकों की सुलभता के कारण चमड़े पर लिखने की ओर ध्यान नहीं दिया गया। इसका मुख्य कारण यह प्रतीत होता है कि हिन्दू लोग मृगचर्म और व्यायचर्म के अतिरिक्त किसी भी प्रकार के।चमड़े के स्पर्श तक को अपवित्र मानते थे, अतः उन पर लिखने का प्रश्न ही नहीं उठता। भारत के विपरीत यूरोप मिस्त्र पश्चिमी एशिया में प्राचीकाल में लेखन सामग्री सुलभ न होने से वहां के निवासियों ने जानवरों के चमड़े को साफ कर उसे लेखनकार्य में।प्रयुक्त किया। तो भी, डी आलविस का कथन है कि बौद्ध ग्रन्थों में लेखन सामग्री के रूप में चमड़े का वर्णन है। पर वे उन स्थलों लेखन सामग्री का निर्देश नहीं करते जहां ऐसे उल्लेख है।

सुबन्धु कृत वासवदत्ता के एक उल्लेख में अनुमान किया गया है कि सुबन्धु के समय चमड़े पर लिखा जाता था। किन्तु ब्यूलर का मत है कि चमड़ा धार्मिक दृष्टि से अपवित्र माना जाता था, इसलिये यह।अनुमान खतरनाक होगा। अभी तक चमड़े पर लिखी कोई पुस्तक।भारत में नहीं मिली। जैसलमेर के “वृहत् ज्ञानकोष” नामक जैन।पुस्तक भण्डार में हस्तलिखित ग्रन्थों के साथ एक अभिलिखित चर्मपत्र प्राप्त हुआ है।34 पर इससे कोई निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।

( ०७ ) प्रस्तर

प्रस्तर पर लेखन स्थायित्व का दूसरा नाम है। भूर्जपत्र, ताड़पत्र या कागज पर लिखा हुआ चिरस्थायी न होता था। इसीलिये मानव ने प्रस्तर के रूप में एक ऐसा साधन ढूंढ लिया जो।चिरजीवी था। अशोक अपने दूसरे स्तम्भलेख में कहता है कि।”मेरे द्वारा इस प्रयोजन के लिये यह धर्मलिपि लिखायी गयी कि लोग अनुसरण करें ( और ) यह चिरस्थायी हो।” अन्य लेखन सामग्री की सुलभता के बावजूद भी स्थायित्व होने के कारण लेखन में प्रस्तर का उपयोग आज भी लोकप्रिय है। डा. राजबली पाण्डेय ने लेखन सामग्री के रूप में प्रस्तर के प्रयोग के निम्न प्रकार बताये है –

(1) खुरदरे या चिकने शिलाखण्ड
(2) स्तम्भ
(3) शिलाफलक
(4) सिंहासन या मूर्तियों के पृष्ठभाग
(5) प्रस्तरपात्र और उनके ढक्कन
(6) मंदिरों की दीवार, बरामदा और स्तम्भ
(7) गुहाए
वर्ण्य विषय के आधार पर इनके निम्न प्रकार हैं-
(1) राजकीय प्रज्ञापन
(2) राजकीय प्रशस्ति
(3) संधिलेख
(4) समझौता लेख
(5) समर्पण लेख
(6) स्मृति लेख
(7) दान लेख
(8) अनुदान लेख
(9) काव्य लेख
(10) साहित्यिक कृतियां
(11) धर्मग्रन्थ

जिस आधार पर लेख लिखवाना होता था पहले उसे टांकियों।से छीलकर एकरुप और चिकना किया जाता था। तत्पश्चात् कोई कवि, विद्वान या राजकीय अधिकारी लेख का प्रारूप तैयार।करता। पुनः सुन्दर अक्षर लिखनेवाला लिपिकार एक-एक या।दो-दो पंक्तियां शिला पर लिखता जाता और सूत्रधार उनको प्रस्तर पर खोदता जाता। इस प्रकार पूरा लेख शिलाफलक पर उत्कीर्ण कर दिया जाता।

( ०८ ) ईंट

मेसोपोटामिया और अन्य पश्चिमी एशियाई जातियों में लेखन।के लिये ईंटों का प्रयोग बहुत लोकप्रिय था। भारत में ईंटों पर लिखने का व्यापक प्रचार न था। तो भी, इस प्रकार के कुछ।उदाहरण प्राप्त होते हैं। बौद्ध लोग पत्थर की तरह ईंटों पर भी अपने धार्मिक सूत्र उत्कीर्ण कराते थे। गीली कच्ची ईंटों पर अक्षर खोद दिये जाते थे और बाद में उन्हें आंच में पका लेते थे। कनिंघम और फुहर को अनेक उत्कीर्ण ईंटें मिली थीं जिन पर एक या एकाधिक अक्षर लिखे थे।

( १० ) धातु

प्रस्तरों के समान ही लेखन के लिये धातुओं का प्रयोग किया।गया। इनमें स्वर्ण, रजत, ताम, पीतल, कांसा, लोहा और टिन का।उपयोग उल्लेखनीय है। इनका वर्णन निम्नलिखित है- स्वर्ण (सोना) मूल्यवान धातु होने के कारण इसका प्रयोग बहुत कम हुआ।है। तो भी, जातक कथाओं में धनियों के पारिवारिक विवरण, शासकीय आदेश तथा धार्मिक नियमों के स्वर्णपत्रों पर उत्कीर्ण
किये जाने का उल्लेख मिलता है। बर्नेल का मत है कि राजकीय पत्रों और भूदान लेखों के लिये स्वर्णपत्रों का प्रयोग होता था। तक्षशिला के गंगू स्तूप से एक स्वर्णपत्र मिला था जिस पर खरोष्ठी लिपि में एक लेख उत्कीर्ण है।

  • रजत (चांदी)

स्वर्ण की तरह चांदी के पत्रों पर लेख खुदवाये जाते थे। इस। प्रकार का एक पत्रा भट्टिप्रोलु के स्तूप से और दूसरा तक्षशिला से मिला था। इसी प्रकार छोटी पुस्तकें और सरकारी आदेश भी चांदी पर उत्कीर्ण किये। जाते थे।45 ब्रिटिश संग्रहालय में गिलट और चांदी की कलई किये ताडपत्रों पर लिखी हस्तलिखित पुस्तकें सुरक्षित हैं।

  • ताम्र (तांबा)

लेखन में प्रयुक्त धातुओं में सबसे अधिक प्रयोग तांबा का हुआ है। इससे यही प्रमाणित होता है कि जब भूदान या ग्रामदान आदि दिया जाता था तब वह ताम्रपत्र पर ही लिखा जाता था।।ऐसे दानपत्रों को ताम्रपट्ट, ताम्रपत्र, ताम्रशासन या शासनपत्र कहते थे। लेखन के लिये ताम्र के प्रयोग का प्राचीनतम उल्लेख फाहियान (चौथी शती ई.) ने किया है। वह लिखता है कि बौद्ध विहारों में उत्कीर्ण ताम्रपत्र थे। इन ताम्रपत्रों में से कुछ बुद्ध के समय के थे। यद्यपि इस कथन की पुष्टि नहीं हुई, तो भी, सोहगौरा पट्ट से पता चलता है कि मौर्यकाल में राजकीय आदेश तांबे के पत्तर पर खोदे जाते थे। एक दूसरा चीनी यात्री ह्वेनसांग कहता है कि कनिष्क के बुद्भवचनों को ताम्रपत्रों पर लिखवाया था। सायण के वेद-भाष्यों के सम्बन्ध में भी ऐसी ही एक कहानी प्रचलित है, किन्तु बर्नेल उसे विश्वसनीय नहीं मानते। ब्यूलर का कथन है कि कुछ भी हो इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि साहित्यिक कृतियों को सुरक्षित रखने के लिये तांबे का प्रयोग किया जाता था। ऐसे अनेक पट्ट प्राप्त हुए है।

ताम्रपत्रों का निर्माण विभिन्न प्रकार से होता था। सोहगौरा ताम्रपत्र के निर्माण का एकमात्र उदाहरण हमारे समक्ष है। यह।ताम्रपत्र रेत के एक सांचे में ढाला गया था। इस सांचे में ही पहले से अक्षर और प्रतीक चिन्ह स्टाइलस या नुकीली लकड़ी से खरोंच दिये जाते थे। इसीलिये अक्षर और प्रतीक उभरे हुए हैं। अन्य सभी ताम्रपत्र पीटकर बनाये गये हैं जिससे उनकी मोटाई और।चौड़ाई में भी काफी अन्तर है। कुछ तो इतने पतले हैं कि उन्हें दुहरा-तिहरा किया जा सकता है। इसी प्रकार उनके वजन में भी एकस्पता नहीं है।

ताम्रपत्रों का आकार वर्ण्य विषय पर आधारित होता था। कारीगर हमेशा प्रदत्त नमूने के आधार पर पट्ट बनाते थे। यदि नमूना ताड़पत्र का होता तो पट्ट लम्बा और पतला होता था। भोजपत्र का नमूना होने पर पट्टे बड़े तथा वर्गाकार होते थे। विजयनगर के यादव शासकों के ताम्रपत्र शिलाफलक आकार के मिलते हैं। इसके विपरीत उत्तर भारत में तक्षशिला से प्राप्त ताम्रपत्र ताड़पत्र के आकार के हैं। वलभी के ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि राजाओं की प्रशस्ति के बढ़ते आकार के साथ ताम्रपत्रों का भी आकार बढ़ जाता है।

ताम्रपत्रों में एक से अधिक पदों का मुख्य कारण वर्ण्य विषय का आकार है। ऐसे पटों को तांबे के तार या छल्लों से जोड़ देते थे। इस प्रकार अनेक ताम्रपत्र एक साथ बंधे रहते थे। इन्हें सरलतापूर्वक खोलकर ताम्रशासनों को पढ़ा जा सकता था। अक्षर प्रायः लोहार, सुनार आदि द्वारा टांकी से खोदे जाते थे।

लेख की सुरक्षा के लिये फलकों के किनारे प्रायः मोटे और उठे हुए नियम बनाये जाते थे। पटों के साथ लगी तांबे की मुद्रा न प्रायः ढली हुई होती थी। इनके ऊपर लेख के अक्षर और – राजचिन्ह उभरे होते थे। बाण ने हर्ष की सोने की मुहर का – उल्लेख किया है जिस पर राजचिन्ह अंकित था।

  • पीतल

लेखन के लिये पीतल का उपयोग बहुत कम हुआ है। केवल पीतल की मूर्तियों के आसनों या छोटी मूर्तियों के पृष्ठ भागों पर लिखे लघु लेख प्राप्त होते हैं। प्राचीनतम मूर्ति सातवीं शती ई. की है। इस प्रकार की प्रायः सभी प्रतिमाएं जैनधर्म की हैं। जैन।मंदिरों में पीतल के छोटे पट्ट भी मिले हैं, जिन पर णमोकार मंत्र उत्कीर्ण रहता है। ऐसी मूर्तियां आबू के अचलगढ़ के जैन।मंदिरों में प्रतिष्ठित हैं।

  • कांसा

इस धातु से बने घण्टों पर ही भेंट करने वालों के नाम और संवत् उत्कीर्ण मिलते है।

  • लोहा

जहां तक अस्त्र-शस्त्रों का प्रश्न है लोहे का प्रयोग बहुतायत।से हुआ है। किन्तु लेखन हेतु इसके प्रयोग के उदाहरण अत्यन्त विरल हैं। दिल्ली में कुतुबमीनार के समीप स्थित मेहरौली स्तम्भ ही एकमात्र ऐसा उदाहरण है जिस पर चंद्र नामक एक शासक की पूरी प्रशस्ति उत्कीर्ण है। इसके अतिरिक्त कुछ स्फुट नमूने भी हैं जिन पर लघु लेख उत्कीर्ण मिलते हैं।

  • टिन

भारत में यह धातु दुर्लभ होने के कारण प्रयोग बहुत कम हुआ। टिन पर लिखी केवल एक बौद्ध पुस्तक मिली है जो ब्रिटिश संग्रहालय में प्रदर्शित है।

  • स्याही

शिलाफलको, ईटों, धातुओं आदि पर लिखने के लिये टांकी और हथौड़ा पर्याप्त था। किन्तु भोजपत्र और ताड़पत्र जैसी नरम सामग्री पर लिखने के लिये स्याही का प्रयोग किया जाता था। स्याही के लिये भारतीय साहित्य में मषि या मषी शब्द मिलता है जिसे मसि या मसी भी लिखते है। मषि शब्द मष ( हिंसायाम् ) धातु से निष्पन्न है जिसका अर्थ है चूर्ण। 2 ब्यूलर का कथन है कि बर्नेल का यह मत भ्रमपूर्ण है कि संस्कृत साहित्य में मसि का प्रयोग उत्तरकालीन ग्रन्थों में नहीं मिलता। भारत के भागों में स्याही के लिये ‘मेला’ शब्द का प्रयोग हुआ है। बेनफे, हिंक्स और वेबर ने मेला शब्द की व्युत्पत्ति यूनानी Melas से की है।।ब्यूलर का सुझाव है कि यह प्राकृत विशेषण शब्द गंदा या काला का स्त्रीलिंग रूप है। इसकी विदेशी उत्पति ढूंढना भ्रामक है। सुबन्धु ने “मेलानंदायते” नामधातु का प्रयोग किया है, जिसका अर्थ दावात होता है। दावात के लिये कोषों में मेलामंदा, मेलांधु मेलाधुंका और मासिमणि का और पुराणों में मसिपात्र, मसिभाण्ड और मूसिकूपिका शब्दों का प्रयोग किया गया है।

निआर्कस और कर्टियस भूर्जपत्र पर लिखने का उल्लेख करते हैं। अशोक के प्रज्ञापनों में कभी-कभी कुछ अक्षरों में फंदों के स्थान पर विंदिया मिलती है।

उपर्युक्त उदाहरणों से प्रमाणित होता है कि ई.पू. चौथी और तीसरी शती में भारतीय स्याही का प्रयोग करते थे। स्याही से लिखने का सबसे प्राचीन उदाहरण अंधेर के धातु-कलश पर मिला है जो ई.पू. दूसरी शती का है।खोतान के धम्मपद और अफगानिस्तान के स्तूपों से प्राप्त भूर्ज की रस्सी तथा पत्थरों के बर्तनों पर अंकित खरोष्ठी अक्षर पहली शती ई. या उसके परवर्ती हैं। अजंता की गुफाओं के चित्रित अभिलेख अद्यावधि वर्तमान हैं।


कागज पर लिखने की स्याही दो प्रकार की होती थी (1) पक्की और (2) कच्ची। पक्की स्याही से पुस्तकें और कच्ची स्याही से व्यापारियों की बहियां लिखी जाती थीं। ओझा० ने स्याही बनाने की पद्धति का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। वे लिखते हैं कि पक्की स्याही बनाने के लिये पीतल की लाख, सुहागा और लोध पीसकर जल के साथ उसे मृत्पात्र में रखकर आग पर पकाते हैं। उबलते-उबलते जब लाख का पानी इस स्तर तक पहुंच जाता है कि कागज पर लिखने पर गहरी लाल लकीरे
बनने लगती है तब उसे आग से उतारकर छान लिया जाता है। इसको अलता (अलत्तक) कहते हैं। पुनः तिल के तेल से बने काजल को महीन कपड़े की पोटली में रखकर उसे अलते में उस समय तक घुमाते हैं जब तक कि अलते का रंग काला न हो जाय। राजस्थान में अद्यावधि इसी प्रकार पक्की स्याही बनाते है। कच्ची स्याही काजल, कत्था, वीजाबोर और गोद को मिलाकर बनाते हैं। इस प्रकार की स्याही कागज पर गिरने से फैल जाती है तथा वर्षा ऋतु में कागज एक-दूसरे से चिपक जाते है। इसीलिये इसका उपयोग ग्रन्थ लिखने में नहीं किया गया।

उपरिलिखित स्याही के अतिरिक्त सोने तथा चांदी के बरकों को घोंटकर सुनहरी तथा रूपहली स्याही तैयार की जाती थी। इसका प्रयोग चित्रकार करते थे। श्रीमंत लोग भी अपने पढ़ने की पुस्तकें इसी स्याही से लिखवाते थे। इसके अतिरिक्त अन्य रंगों की स्याहियों का भी प्रयोग होता था।

( ११ ) लेखनी

लेखन में प्रयुक्त होने वाले उपकरण का नाम लेखनी है। रामायण-महाभारत में इसका उल्लेख मिलता है। लेखनी के अन्तर्गत स्टाइलस, पेंसिल, कूची, नरकट और लकड़ी की कलम सभी कुछ सम्मिलित है। लेखन में प्रयुक्त अन्य उपकरण निम्न प्रकार के हैं –

( १२) वर्णक


इसका शाब्दिक अर्थ है “अक्षर या वर्ण,बनाने वाला”। ललितविस्तर में उल्लिखित वर्णक छोटी सी लकड़ी थी जिसके मुंह पर किसी प्रकार की तिरछी कटाई नहीं होती थी।

( १३ ) वर्णिका

वर्णक का एक अन्य प्रकार वर्णिका थी।

( १४ ) वर्णवत्तिका

दशकुमारचरित मे यह शब्द आया है। ब्यूलर का कथन है कि यह निश्चय ही कूची या पेंसिल है।क्योंकि वतिका से रेखांकन का चित्रकर्म करते थे।

( १५ ) तूली या तूलिका

सामान्यरुप से इसका अर्थ कूची से लेते है जो रंग भरने के काम आती है।

( १६ )शलाका

दक्षिण भारत में प्रयुक्त स्टाइलस का संस्कृत नाम शलाका है। मराठी में इसे सलई कहते हैं। यह लोहे की होती है और पत्थरों पर अक्षर उत्कीर्ण करने के काम आती है।

उपर्युक्त सामग्री के अतिरिक्त ज्योतिषी लोग जन्मपत्र और वर्षफल में भिन्न-भिन्न प्रकार की कुंडलियां बनाने में लोहे के परकारी का प्रयोग करते थे। इसी प्रकार कागज पर सीधी पंक्तियां खींचने के लिये स्लर का प्रयोग होता था जिसे ‘रेखावटी’नया ‘समासपाटी’ कहते थे ।

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