भारत की प्राचीन लिपिया

By | October 4, 2020

भारतीय और चीनी परम्परायें इस बात पर एकमत हैं कि भारतीयों ने दो प्रमुख लिपियों ब्राह्मी और खरोष्ठी आविष्कार किया। सिन्धुघाटी लिपि की खोज के पूर्व ई.पू. पांचवीं शदी से पहले लेखन का कोई उदाहरण प्राप्त न होने के कारण यह माना जाता था कि भारतीय लिपियों का मूल पश्चिमी एशियाई या यूनानी लिपि थी। अब बहुसंख्यक विद्वान् ब्राह्मी की उत्पत्ति भारत में मानते हैं, किन्तु खरोष्ठी लिपि को पूर्णरूपेण विदेशी कहते हैं, जिसकी उत्पत्ति पश्चिमी एशिया में हुई।

* सिन्धुघाटी लिपि

उत्पत्ति

भारत की प्राचीनतम लिपि सैन्धव सभ्यता वाली है, जो हड़प्पा, मोहनजोदड़ों, लोथल आदि अनेक स्थानों से ज्ञात हुई है। इस सभ्यता के मुख्य केन्द्र हड़प्पा के आधार पर अब इस सभ्यता का नाम हडप्पा सभ्यता प्रचलित हो गया है। सैंधव सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता की लिपि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्नांकित मत प्रचलित हैं :

(1) द्रविड़ उत्पत्ति का सिद्धांत

कुछ विद्वान् सिन्धु घाटी सभ्यता को अनार्य सभ्यता मानते हैं और उस क्षेत्र के निवासियों तथा उनकी भाषा एवं लिपि को द्राविड़ कहते हैं। हेरास इस सिद्धांत के प्रबल प्रतिपादक हैं। मार्शल ने भी इसका समर्थन किया है। हेरास मोहनजोदड़ो की लिपि को बायें से दायें पढ़ते हैं और उसकी एकरूपता तमिल भाषा से स्थापित करते हैं। पर ई. पू. चतुर्थ सहस्त्राब्दी में तमिल भाषा का प्रयोग होता था, ऐसा किसी अन्य स्त्रोत से ज्ञात नहीं है। अतः उक्त मत मान्य नहीं हो सकता। अब यह भी ज्ञात हो गया है कि सिन्धुघाटी लिपि बाएं से दाएं तथा दाएं से बाएं दोनों प्रकार लिखी जाती थी।

(2) सुमेरी या मिस्री उत्पत्ति का सिद्धान्त


वेडेल’ का मत है कि ई.पू. चतुर्थ सहस्त्राब्दी में सिन्धुघाटी में सुमेरी उपनिवेश थे। उन्होंने ही यहां अपनी भाषा और लिपि प्रचलित की। डा. प्राणनाथ उपर्युक्त मत का समर्थन करते हुएकहते हैं कि सिन्धु घाटी की लिपि की उत्पति सुमेरी लिपि से हुई। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि सैंधव लिपि चित्रलिपि होने के कारण पश्चिमी एशिया, मिस्त्र, क्रीट आदि देशों की प्राचीन लिपियों से कुछ साम्य रखती है। लेकिन आज यह बता सकना असंभव है कि लिपि का आविष्कारक कौन था और किसने उसे पहले अपनाया ? ऐतिहासिक मान्यता है कि सुमेरी सभ्यता के जन्मदाता मेसोपोटामिया में बाहर से गये और वे अपने साथ कृषि तथा लेखन-कला लें गये। उनके देवी – देवता सेमेटिक के स्थान पर भारतीय प्रतीत होते हैं। अतः वेडेल का मत असंगत प्रतीत होता है।

(3) देशी उत्पत्ति का सिद्धान्त

कुछ विद्वानों का मत है कि सैन्धव सभ्यता के लोगअनार्य अथवा असुर थे। कालान्तर में वे मेसोपोटामिया और पश्चिमी एशिया की ओर स्थानान्तरित हो गय। इस मत के मानने वाले कहते हैं कि सैन्धव लिपि की उत्पत्ति इसी देश की भूमि पर हुई। आद्य एल्माइट, सुमेरी और मिस्री लिपियों से उसके साम्य के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि सिन्धु लिपि की उत्पत्ति भारत में नहीं हुई।

जी.आर. हण्टर का कथन है कि प्राचीन मिस की चित्रलिपि सिन्धु लिपि से बहुत मिलती-जुलती है। यह एक रोचक तथ्य है कि समूचे मानवतारोपी चिन्ह सुमेरी और आद्य एल्माइट लिपियों में मिलते हैं। दूसरी ओर हमारे बहुत से चिन्ह ऐसे हैं जो आद्य-एल्माइट और जेम्देत-नस की पट्टिकाओं में मिलते हैं। अतः यह सोचना स्वाभाविक है कि हमारी लिपि में अंशतः मिस और मेसोपोटामिया की लिपियों का अनुकरण किया गया है। तीनों लिपियों में वृक्ष, मछली, पक्षी आदि अनेक प्रतीक एक-जैसे मिलते हैं। संभव है कि उपर्युक्त तीनों लिपियों में किसी अन्य मूल लिपि का अनुकरण किया गया हो। डेविड डिरिंजर का कथन है कि सिन्धु घाटी की लिपि अद्यावधि अज्ञात किसी आद्यलिपि से निःसृत हुई। यह आद्य लिपि कीलाक्षरी और एल्माइट लिपियों की भी पूर्वज रही होगी। यह भी संभव है कि तीनों लिपियों का विकास स्थानीय था।

नवीन मत

हाल में देशी-विदेशी अनेक अन्य विद्वानों ने सिन्धु लिपि के बारे में अपने विचार व्यक्त किये हैं तथा उसके उद्वाचन की चेप्टा की है। इन विद्वानों में डा. एस. आर. राव का मत सर्वाधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। उनके मतानुसार सिन्धुघाटी लिपि का उद्गम भारत देश ही है। यह सिन्धु लिपि लगभग 2500 मुहरों. पर अंकित है। इसमें 250 चिन्ह हैं। इस लिपि के अधिकांश उद्वाचकों का मत है कि प्रत्येक चिन्ह किसी विचार का संवाहक’ है, यथा दण्डधारी मानव यम का। यह लिपि ध्वन्यात्मक है और उसके 75 प्रतिशत से अधिक चिन्ह पश्चिमी सेमेटिक लिपि के चिन्हों से मिलते हैं जो दायें से बायें लिखे जाते थे। इस प्रकार. सिन्धुघाटी लिपि और सेमेटिक लिपि में साम्य है।

जहां तक भाषा का सम्बन्ध है डा. राव ने यह प्रमाणित करने की चेष्टा की है कि यह भाषा ऋग्वेद की भाषा से साम्य रखती है। उन्होंने यह संभावना भी व्यक्त की है कि ऋग्वेद की भाषा का आदिम रूप हड़प्पा से प्राप्त मुहरों में मिला है।

ब्राह्मी लिपि

पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर सिन्धु सभ्यता का पतन लगभग 1700 ई.पू. में हो गया। उसके बाद आर्य सभ्यता का विकास सिन्धु घाटी क्षेत्र में तथा क्रमशः उसके आगे हुआ। वैदिक ऋषियों की सबसे अधिक प्राचीन कृति ऋग्वेद को कब लिपिबद्र किया गया, यह निश्चितरुप से ज्ञात नहीं। वेदों को गुरु-शिष्य परम्परा के रूप में कण्ठस्थ रखने की परम्परा रही है। हड़प्पा लिपि तथा मौर्यकालीन विकसित ब्राह्मी लिपि के बीच लम्बे अन्तराल में किसी लिपि की अप्राप्ति आश्चर्यजनक है। ई.पू. चौथी सदी से लेकर दूसरी शती ई. तक के बहुसंख्यक अभिलेखों और मुद्राओं की प्राप्ति भारत के विभिन्न भागों में हुई है। उनसे ज्ञात हुआ है कि उक्त लगभग छह शताब्दियों में भारत में दो लिपियाँ ब्राह्मी और खरोष्ठी प्रचलित थीं। पहली लिपि प्रायः बाई से दाई ओर और दूसरी दाई ओर से बाई ओर लिखी जाती थी। जैनग्रन्थों पन्नवणासूत्र और समवायांगसूत्र में 18 लिपियों के नाम मिलते हैं। उनमें पहला नाम बंभी (ब्राह्मी ) है। भगवतीसूत्र में बंभी लिपि को नमस्कार करके सूत्र प्रारम्भ किया गया है। बौद्धग्रन्थ ललितविस्तर में 64 लिपियों के नाम मिलते है, जिनमें पहला नाम ब्राह्मी और दूसरा खरोष्ठी है। अशोक ने अपने प्रज्ञापनों की लिपि को ‘धमलिपि’ कहा है

अशोक की धर्म लिपि और प्राचीन साहित्य की बंभी या ब्राह्मि लिपि वस्तुतः एक है। ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण अशोक के प्रज्ञापन उत्तर में कालसी ( देहरादून), पूर्व में धौली (उड़ीसा), दक्षिण में कर्नाटक और पश्चिम में गिरनार (गुजरात) तक मिले हैं। सभी प्रज्ञापनों की ब्राह्मी लिपि एक-सी है। इससे ज्ञात होता है कि ई.पू. तीसरी शती के मध्य तक इस लिपि का प्रचार प्रायः सम्पूर्ण भारत में हो गया था। खरोष्ठी लिपि वर्तमान अफगानिस्तान, उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रदेश तथा पश्चिमी पंजाब में प्रचलित थी।

बाहमी

ब्राह्मी लिपि के नाम के सम्बन्ध में यह मान्यता रही है कि लिपि का आविष्कार ब्रह्म अथवा वेदों की सुरक्षा के लिए हुआ। ब्राह्मण लोग मुख्यतः इसका प्रयोग करते थे। वेदों के लेखन, स्मरण, पठन-पाठन द्वारा वैदिक साहित्य का संरक्षण और आगामी पीढ़ियों के लिए उसका हस्तान्तरण ब्राह्मण वर्ग का कर्तव्य था।

प्राचीन जैन तथा बौद्ध लेखक भी उपर्युक्त तथ्य को स्वीकार करते हैं। ये लेखक वैदिक साहित्य और ब्राह्मणों के वर्चस्व के विरोधी थे, अतः उन पर ब्राहमी लिपि के नाम एवं उत्पत्ति के सम्बन्ध में पक्षपात का दोप नहीं लगाया जा सकता। सभी स्त्रोतों से ब्राहमो की उत्पत्ति वाले आधुनिक विद्रान् इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि प्राचीन भारत के ब्राह्मणों ने इस लिपि को व्यापारियों के माध्यम द्वारा पश्चिमी एशिया से ग्रहण किया। फिर उसमें उन्होंने इतनी पूर्णता ला दी कि उसने एक सर्वथा नवीन लिपि का रूप ले लिया। इस सन्दर्भ में यह कहना पर्याप्त होगा कि 7 भारत में लेखन के आविष्कार की मौलिक प्रेरणा सुमेर और वे बाबुल की भांति व्यापारिक नहीं, अपितु धार्मिक है। इस समस्या के समाधान में हमारी सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि ई.पू. चौथी वी शती से पहले का कोई ब्राह्मी लेख नहीं प्राप्त हुआ। विद्वानों ने से लिपि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक मतों का प्रतिपादन किया दो है। इन मतों को दो भागों में बांटा जा सकता है-

(1) देशी उत्पत्ति के पोषक मत, (2) विदेशी उत्पत्ति वाले मत ।

(1) देशी उत्पत्ति

टामस” तथा उसके अनुवर्ती विद्वानों का मत है कि ब्राह्मी लिपि का आविष्कार द्राविड़ों ने किया और कालान्तर में आर्यों ने या उसे ग्रहण कर लिया। इस मत के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है । उनका मत है कि भारत में आर्यों के आगमन के पूर्व द्राविड़ों का आधिपत्य था और सांस्कृतिक दृष्टि से उन्नत होने के कारण उन्होंने लेखन है। कला का आविष्कार कर लिया। किन्तु यह मत सही नहीं प्रतीत भी होता। वस्तुतः लेखन के प्राचीनतम उदाहरण आर्यों के क्षेत्र उत्तर भारत में पाये गये हैं जहां द्राविडजनों का निवास नहीं था। द्राविड़ क्षेत्र में प्राप्त प्रारंभिक वाहमी लेख उत्तर भारतीय लेखों से प्रायः बाद के माने जाते हैं। द्राविड भाषाओं की प्रतिनिधि तमिल में वर्ग के प्रथम और पंचम वर्ण हैं जबकि ब्राह्मी लिपि में वर्ग के पांचों वर्ण हैं। ध्वनि की दृष्टि से तमिल वर्ण ब्राह्मी वर्गों से निः सृत माने गये हैं।

(2) आर्य या वैदिक मूल

कनिंघम, डाउसन, लेसेन आदि विद्वानों का मत है कि आर्य पुरोहितों ने मूल भारतीय चित्रलिपि से ब्राह्मी अक्षरों का विकास किया। ब्यूलर15 का मत है कि कनिंघम की राय में दोप यह है कि वे एक ऐसे भारतीय बीजाक्षरी चित्रों के प्रयोग की पूर्वकल्पना कर लेते हैं जिनका अब तक कोई चिन्ह नहीं मिला है। किन्तु सैन्धव सभ्यता से ज्ञात चित्रलिपि तथा प्रागैतिहासिक अनेक शिलागृह चित्रों से ब्यूलर की यह आपति खण्डित हो जाती शामशास्त्री का मत है कि ब्राहमी वर्ण देवों को व्यक्त करने वाले चिन्हों या प्रतीकों से निः सृत हुए। लिपि का ‘ब्राहमी’ नाम भी इस मत की पुष्टि करता है।
डा. डेविड डिरिंजर ने देशी उत्पति मानने वालों के विचारार्थ निम्नांकित बातें प्रस्तुत की हैं:

(1) किसी देश में दो क्रमिक लिपियों का अस्तित्व यह नहीं सिद्ध करता कि दूसरी लिपि पहली लिपि पर आधारित है। उदाहरणार्थ, क्रीट में प्रयुक्त होने वाले. प्राचीन यूनानी वर्ण प्राचीन क्रीट या मिनाइ लिपि से नहीं निकले।
(2) यदि सिन्धु घाटी के चिन्हों तथा ब्राह्मी वर्गों में आकार-साम्य सिद्ध भी हो जाये तो भी सैन्धव लिपि
से ब्राहमी के निकलने का उस समय तक कोई प्रमाण नहीं है जब तक यह सिद्ध न हो जाये कि दोनों
लिपियों के समान चिन्हों द्वारा व्यक्त ध्वनि भी समान है
(3) सैन्धव लिपि संभवतः परिवर्तनशील पद्धति या मिश्रित स्वर-भावपरक लिपि थी जबकि ब्राहमी अर्धाक्षरी है।
(4) विस्तृत वैदिक साहित्य में लिपि के अस्तित्व का कोई निर्देश नहीं पाया जाता। प्राचीन भारतीय देवताओं में कोई लिपि का देवता न था. यद्यपि ज्ञान, विद्या या वाक् की देवी सरस्वती ज्ञात थी।
(5) केवल प्राचीन बौद्ध साहित्य लेखन का स्पष्ट निर्देश करता है ।
(6) अभिलेखों के आधार पर केवल इतना माना जा सकता है कि छठी शती ई.पू. में ब्राह्मी लिपि
विद्यमान थी।
(7) विवेच्य विषय के अनेक पंडितों के अनुसार 800 – 600 ई.पू. का काल भारत के औद्योगिक
जीवन में विलक्षण प्रगति प्रदर्शित करता है। इसी काल में भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट से बाबुल के साथ नौ- व्यापार का विकास हुआ। प्रायः यह तर्क दिया जाता है कि व्यापारिक विकास ने लिपि के ज्ञा के प्रसार में सहायता की।
(8) भारत में प्राचीन आर्यों के इतिहास के विषय में हमारा ज्ञान सीमित है। तिलक वैदक साहित्य की प्राचीनतम ऋचाओं का समय 7,000 ई.पू. और शंकर बालकृष्ण दीक्षित कुछ बाहमणों का काल 3800 ई.पू. निर्धारित करते हैं। इन निराधार काल्पनिक मतों को गम्भीरतापूर्वक स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारत में आर्यों की सभ्यता ई.पू. की दूसरी सहस्त्राब्दी में सुदृढ़ थी। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य की रचना इसी समय से लेकर ई.पू पहली सहस्त्राब्दी के मध्य तक होती रही।
(9) ई.पू. छठी शती में उतर भारत में एक विलक्षण धार्मिक क्रान्ति का जन्म हुआ जिसने भारतीय इतिहास के घटनाचक्र को पूरी तरह प्रभावित किया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि लेखन के ज्ञान ने जैन तथा बौद्ध धर्मों के प्रसार में सहायता की। इन दोनों धर्मों ने, विशेषकर बौद्ध धर्म ने, लिपि-ज्ञान के प्रसार में अत्यधिक योग दिया।
(10) सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर बहुत से ऐसे साक्ष्य उपलब्ध होते है जिनसे मालूम होता है कि भारत में ब्राह्मी लिपि ई.पू. 400 के लगभग विकसित रूप में आ गयी।

डा. राजबली पांडेय, श्री एस.आर. राव आदि कई विद्वानों ने उक्त बातों पर विचार व्यक्त किये हैं। डा. पांडेय लिखते हैं: ‘किसी देश में दो क्रमिक लिपियों की विद्यमानता तब तक परवर्ती लिपि के पूर्ववर्ती लिपि से निकलने का पोषण करेगी जब तक इसके विरुद्ध अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत न किये जायें। जहां तक उक्त तीसरी आपत्ति का संबंध है, अभी यह सिद्ध करना शेष है कि सैन्धव लिपि में ध्वनि का अभाव है। चतुर्थ धारणा निर्मूल है औरभारतीय लिपियों का विकास वैदिक साहित्य के अपूर्ण ज्ञान पर आधारित है। यह कथन कि बै वैदिक देवमण्डल में लिपि का देवता नहीं है किन्तु ज्ञान, विद्या तथा वाक् की देवी सरस्वती हैं, उपयुक्त नहीं है। हिन्दू देवमण्डल में स्वयं सरस्वती और ब्रह्मा दोनों ही अपने एक हाथ में पुस्तक का लिये हुए प्रदर्शित हैं।

पांचवीं आपत्ति की निरर्थकता-सिद्धि के लिये बौद्ध साहित्य की पृष्ठभूमि, वेदांगों तथा वैदिक साहित्य का अध्ययन आवश्यक है। छठी आपत्ति केवल स्मारकों का निर्देश करती है, जिससे नाशवान उपकरणों का विरोध नहीं होता। भारत तथा पश्चिम के बीच व्यापारिक सम्बन्ध विषयक सातवीं युक्ति से भारत का ऋणी होना नहीं सिद्ध होताः वस्तुस्थिति इसके विपरीत भी हो सकती है। आठवें मत से यह प्रदर्शित होता है कि पश्चिमी एशिया की सभ्यता की अपेक्षा भारत की सभ्यता कम पुरानी है।

तिलक तथा शंकर के वैदिक वांग्मय के काल-विषयक सिद्धान्त पाश्चात्य विद्वानों की कोरी कल्पना प्रतीत हो सकते हैं। किन्तु ब्यूलर और विण्टरनित्स – जैसे प्रकाण्ड पंडितों ने मत व्यक्त किया है कि भारत में आर्य सभ्यता का प्रारम्भ ई.पू. चतुर्थ सहस्त्राब्दी में रखा जा सकता है। जहां तक नवी आपत्ति का सम्बन्ध है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि जैन तथा बौद्ध धर्मों ने प्राकृत को तथा उनके साथ में लेखन को लोकप्रिय बनाया, किन्तु दोनों ही धर्म वैदिक या संस्कृत भाषा के लिए लिपि की पूर्व कल्पना करते है। तथ्य तो यह है कि बुद्ध ने अपने शिष्यों को छन्दों (वैदिक या लौकिक संस्कृत भाषा ) में कथानक लिखने का विरोध किया था। दसवीं आपत्ति भी युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होती, क्योंकि वह इस कल्पना पर आधारित है कि लेखन का मूल आर्येतर है तथा भारत में आर्य बाहर से आये। अभी तक कोई ऐसी तथ्यात्मक बात नहीं कही गयी जो पूर्व में विद्यमान किसी लेख पद्धति से भारतीय लिपि के निकलने की संभावना का निषेध कर सके। श्री एस. आर. राव ने भी उक्त आपत्तियों का निराकरण कर देशी उत्पत्ति वाले सिद्धान्त का समर्थन किया है।

विदेशी उत्पत्ति

ब्राह्मी लिपि के विदेशी-उत्पत्ति विषयक मतों में दो प्रमुख है (1) यूनानी उत्पत्ति और (2) सामी उत्पत्ति।

(1) यूनानी उत्पत्ति

ब्यूलर प्रिन्सेप, रावेल डीरोशेत, सेनार, विल्सन आदि विद्वानों का मत है कि ब्राह्मी यूनानी वर्णों से निकली है। ब्यूलर का कथन है : ‘यह सिद्धान्त असंभाव्य होने के कारण तत्काल त्याज्य है, क्योंकि इतः पूर्व हमने जिन साहित्यिक और पुरालिपिक प्रमाणों की चर्चा की है उनसे इसका मेल नहीं बैठता। ऊपर की चर्चा के अनुसार मौर्यकाल के प्रारंभ से कई शताब्दी पहले से ही ब्राह्मी व्यवहार में आती थी। जिस काल के प्राचीनतम भारतीय अभिलेख प्राप्त हैं, उस समय भी ब्राह्मी लिपि का इतिहास काफी पुराना था।

(2) सामी मूल


कुछ विद्वान इस मत के समर्थक है। किन्तु ब्राहमी वर्ण सभी वर्गों की किस शाखा से प्रभावित हैं, इस पर भेद है। इस मत के विचारऊ. को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:

(क) फीनिशियन मूल

वेबर, बेन्फे, जॉन्सन, ब्यूलर26 आदि विद्वान बाहमी वर्गों का मूल फीनिशियन वर्ण स्वीकार करते हैं। उनका कथन है कि लगभग एक तिहाई फीनिशियन वर्ण और उनके अनुरूप ब्राह्मी चिन्हों के प्राचीनतम रुप एक ही थे तथा शेष दो तिहाई में भी न्यूनाधिकरुप में एकरूपता प्रदर्शित की जा सकती है। उपर्युक्त मत को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि बाह्मी लिपि के प्रादुर्भाव के समय भारत और फीनिशियन लोगों के बीच कोई सीधा सम्पर्क न था। दूसरे फीनिशियन तथा वाहमी वर्गों में साम्य स्पष्ट है। अतः यह जानना आवश्यक है कि दोनों लिपियों पर किस तीसरी लिपि का प्रभाव है।

(ख) दक्षिणी सामी मूल

टेलर, डीके और केनन7 का मत है कि ब्राह्मी वर्ण दक्षिणी सामी वर्गों से निःसृत हुए। परन्तु इस्लामी आक्रमण के पूर्व भारतीय संस्कृति पर अरब के प्रभाव का कोई पता नहीं चलता। अतः दोनों के बीच कोई सम्बन्ध निरूपित करना उपयुक्त नहीं लगता।

(ग) उत्तरी सामी मूल

ब्यूलर इस मत के प्रबल पोपक हैं। उनका कथन है कि ‘यदि हम सीधे उत्तरी सामी लिपि से ब्राह्मी की उत्पत्ति दिखला दें तो ये कठिनाइयां सामने न आयेगी। फोनेशिया से मेसोपोटामिया तक उत्तरी सामी का एक ही रूप दिखता है। वेबर के अनेक समीकरण स्वीकार्य न थे, किन्तु अभी हाल ही में सामी अक्षरों के कुछ ऐसे रूप भी सामने आये हैं जिनसे ये समीकरण स्वीकार्य हो जाते हैं। अब उन सिद्धान्तों को पहचानना कठिन नहीं है जिनसे सामी चिन्हों को भारतीय चिन्हों में बदला गया था।

ब्यूलर ने प्राचीन भारतीय वर्णमाला का परीक्षण कर उसकी निम्नांकित विशेषताओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया है :
(1) यथा संभव अक्षर खड़े लिखे गये है। ट, ठ और ब को छोड़कर अन्य अक्षरों की ऊंचाई भी समान है।
(2) अधिकांश अक्षर खड़ी रेखाओं से बने हैं, जिनमें ज्यादातर पैरों में जोड लगे हैं। ये जोड कभी-कभी पैर और सिर दोनों में, और बिरले ही कमर में लगते हैं। लेकिन ये जोड केवल सिर पर नहीं लगते।
(3) अक्षरों के सिरों पर प्रायः खड़ी रेखाओं के अन्त, उससे कम नन्हीं पड़ी लकीरें, उससे भी कम नीचे की ओर खुलने वाले कोणों के सिरों पर भंग होता है। नितान्त अपवादरूप म में और झ के एक रूप में दो रेखाएं ऊपर की ओर उठती हैं। सिरों पर कई कोण, अगल-बगल में, जिसमें खड़ी या तिरछी रेखा नीचे की ओर लटकती हो, नहीं मिलते। इसी प्रकार सिरों पर त्रिभुज या वृत भी जिनमें लटकन रेखा लगी हो, नहीं मिलते।

ब्यूलर ने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन ब्राह्मी लिपि की निम्नांकित प्रकृति के आधार पर किया है :

  1. भारतीयों की पंडिताऊ नियमनिष्ठता.
  2. ऐसे चिन्ह जो नियमित रेखाओं के निर्माण के अनुकूल हो.
  3. भारतीय भारी सिरों वाले अक्षरों को नापसन्द करते इस आखिरी विशेषता का कुछ कारण यह भी है कि आदिकाल से भारतीयों ने अपने अक्षर ऐसे बनाये है जो किसी काल्पनिक या वास्तविक रेखा से लटकते हैं और कुछ इस कारण भी क्योंकि उन्होंने स्वर चिन्हों का प्रयोग शुरू किया, जो अधिकतर व्यंजनों के सिरों पर पड़े रूप में जुड़ते हैं। ऐसे चिहन जिनमें खड़ी रेखाओं के अन्त ऊपर को हो इस लिपि के सबसे अनुकूल पड़ते थे। हिन्दुओं की इन पसन्दों और नापसन्दों के कारण अनेक सामी अक्षरों के भारी सिरों को छोड़ देना पड़ा है। इसके लिए चिन्हों को सिर के बल उलट दिया गया है, या इन्हें बगल में डाल दिया गया है; कोण खोल दिये गये हैं या ऐसा ही कुछ कर दिया गया है। लिखने की दिशा में परिवर्तन करने से एक अन्य परिवर्तन भी जरूरी हो गया। अब भी ग्रीक की तरह इसमें भी चिहन दाये से बायें घुमा देने पड़े हैं।’

ब्यूलर के अनुसार ब्राह्मी के बाईस वर्ण उत्तरी सामी वर्णमाला से, कुछ प्राचीन फोनेशिया की वर्णमाला से, कुछ मेसा प्ररतर-अभिलेख से और पांच असीरिया के बांटों पर उत्कीर्ण लिपि से लिये गये हैं। शेष वर्ण नये चिन्हों को जोड़कर तैयार किये गये और इस प्रकार ब्राहमी की पूरी वर्णमाला तैयार की गयी।

ब्राहमी लिपि के उत्तरी सामी मूल के अन्य प्रबल समर्थक डा. डेविड डिरिंजर हैं। उनके मतानुसार अरमाइक अक्षर ही ब्राह्मी के पूर्व माने जा सकते हैं। भारत ने ब्राह्मी लिपि को जन्म नहीं दिया। इसके स्वर तथा व्यंजन को चिह्न से व्यक्त करने की कला भी पश्चिमी एशिया से भारत पहुंची।
सभी तथ्यों पर ध्यान देने से पता चलता है कि ब्राह्मी लिपि के उत्तरी सामी मूल के पक्ष में निम्नांकित तर्क प्रस्तुत किये गये हैं :

(1) सामी तथा वाहूमी वर्गों में साम्य है।
(2) प्राचीन भारतीय लिपि चित्रपरक थीः कोई वर्णात्मक लिपि चित्रवर्णों से नहीं निकल सकती।
(3) ब्राह्मी में दायें से बायें लेखन-प्रणाली को मौलिक माना गया है।
(4) भारत में ई.पू. पांचवीं शती से पूर्व लेखन के उदाहरणों का अभाव है।

उपर्युक्त तर्कों का विवेचन करना आवश्यक है। दोनों लिपियों में वर्ण-साम्य का कारण यह हो सकता है कि वे लोग मूलतः भारत के निवासी थे जो अपने साथ भारतीय वर्णमाला को सूदूर उत्र-पश्चिमी एशिया में ले गये। वे सामी जनों के बीच रहे, अतः उन्होंने सामी वर्णमाला को प्रभावित किया । जहाँ तक दूसरे तर्क का प्रश्न है, यह कहा जा सकता है कि सभी प्राचीन लिपियां मूलतः चित्रात्मक थीं। निश्चय ही यह एक अलग विचारणीय बात है कि चित्रवों के आविष्कारकों में कौन लोग विशुद्ध वर्णों का विकास कर सके और वह भी किस सीमा तक। दूसरे, सैन्धव लिपि के अनेक प्राचीनतम उदाहरण मुख्यतः ध्वनिपरक और पटात्मक हैं तथा उनका झुकाव वर्णात्मकता की और है। अतः बहुत संभव है कि सैन्धव लिपि से ही ग्रामी विकसित हुई हो।

ब्यूलर ने बाहमी लिपि को दायें से बायें लिखने के प्रमाणस्वरूप अशोक के अभिलेखों के कतिपय वर्ण और एरण (जिला सागर, म.प्र. ) में प्राप्त मुद्रालेख प्रस्तुत किये हैं। अशोक के अभिलेखों में लिखने का क्रम द्रष्टव्य है। उसके येरगुडी लेख में पहली पंक्ति ठीक ढंग से दायें से लिखी है और दूसरी पंक्ति दायें से बायें। तीसरी, बायें से दायें तथा चौथी दायें से बायें है। इससे स्पष्ट है कि उक्त लेख उत्कीर्ण करने वाला व्यक्ति ब्राह्मी लिपि से अनभिज्ञ था, यद्यपि उसे अभिलेख इसी लिपि में लिखना था।

जहां तक एरण से प्राप्त राजा धर्मपाल के सिक्के का प्रश्न है, यह बहुत संभव है कि सिक्के का सांचा तैयार करते समय उसमें अंकित उत्कीर्ण लेख उलट गया हो चौथा तर्क यह है कि तृतीय-द्वितीय सहस्त्राब्दी ई.पू. तथा पांचवीं शती ई.पू. के बीच लिपि का कोई उदाहरण प्राप्त नहीं होता। इस सन्दर्भ में यही कहा जा सकता है कि इस दीर्घ अन्तराल में लिपि का पूर्व ज्ञान पूर्णतः समाप्त हो गया हो, ऐसा संभव नहीं है। ब्यूलर ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है।

खरोष्टी लिपि

नाम – भारत की दूसरी प्राचीन लिपि खरोष्टी थी। विद्वानों ने उसे बैक्ट्रियन, इण्डो-बैक्ट्रियन, बैक्ट्रो-पालि, उत्तर-पश्चिमी भारतीय, काबुली, गान्धारी आदि नाम दिये हैं। भारत में इसका सर्वाधिक प्रचलित नाम खरोष्टी था। इसका उल्लेख ललितविस्तर तथा चीनी ग्रन्थ फवन सूलीन में मिलता है। ‘खरोष्टी नामकरण के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं है। कहा जाता है कि इस लिपि का आविष्कारक खरोष्ठ (खर + ओष्ठ, गधे के ओंठ वाला) था। दूसरा मत यह है कि यह ‘खरोष्ठों द्वारा प्रयुक्त होती थी, जो भारत की उतर-पश्चिमी सीमा में निवास करने वाले असंस्कृत जन थे। तीसरा विचार यह है कि खरोष्ठ मध्य एशिया के काशगर प्रान्त का संस्कृत रूप है, जो इस
लिपि का सबसे परवर्ती केन्द्र था।

चतुर्थ मत के अनुसार खरोष्टी शब्द ‘खर-पोस्त’ से बना है। खर (गर्दन ) शब्द संस्कृत और प्राचीन ईरानी भाषा में मिलता है। ‘पोस्त का अर्थ है चमड़ा। यह शब्द केवल प्राचीन ईरानी भाषा में मिलता है। इसी से फारसी का ‘पुस्त’ शब्द बना। अतः ‘खर-पोस्त का अर्थ हुआ गधे का चमड़ा। भारतीय जन ‘पोस्त’ (चमड़ा) शब्द से अपरिचित थे। अतः उन्होंने इससे मिलता-जुलता ‘ओष्ठ शब्द बना लिया। इस प्रकार ‘खर-पोस्त’ से ‘खरोष्ठ’ या ‘खरोष्टी’ शब्द बन गया। राजवुल और षोडास नामक मथुरा के क्षत्रप शासकों के नाम मथुरा सिंह शीर्ष अभिलेख
में मिले है। इन नामों के साथ युवराज खरोस्तस’ का नाम मिलता है। यह संभव प्रतीत होता है कि खरोष्टी (गधे के ऑठवाली) शब्द खरपोस्त (गर्दभ-चर्म ) से बना।

अरमाइक उत्पति

ब्यूलर इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक है। उनके विचार इस प्रकार हैं:

(1) खरोष्टी तथा अरमाइक वर्गों में समानता की पुष्टि इस बात से भी होती है कि खरोष्टी के अधिकांश चिहन ई.पू. पांचवीं शती के सक्कारा और तेइमा (समय ई.पू. 482 और लगभग ई.पू. 500) के अभिलेखों में मिलने वाले अरमाइक चिन्हों से अत्यन्त आसानी से व्युत्पन्न सिद्ध किये जा सकते हैं। कुछ अक्षर उत्तरकालीन असीरियायी बांटों और बेबिलोनी मुद्राओं और जवाहरातों पर मिलनेवाले इसके पूर्व के अक्षरों से मिलते-जुलते हैं। दो-तीन अक्षर लघुतर तेइमा अभिलेख, स्टेले बैटिराना और सेरापियम के तर्पण-पटल के अक्षरों के बहुत निकट दीखते हैं। खरोष्टी के अक्षरों की लेखन शैली लम्बे-लम्बे और बड़ी दुमों वाले अक्षर — मेसापोटामियाई बांटों, मुहरों और उत्कीर्ण पत्थरों के अक्षरों की है। ऐसे ही अक्षर सक्कारा, तेइमा और सेरापियम में भी आते हैं।
(2) खरोष्टी लिपि अरमाइक लिपि की तरह दायीं ओर से बायीं ओर को लिखी जाती थी!
(3) खरोष्टी में अरमाइक लिपि के समान दीर्घ स्वरों का अभाव है।
(4) भारत के उन भागों में खरोष्टी लिपि का प्रयोग होता था जो 500 ई.पू. से 331 ई.पू. तक लगातार या अन्तरालों के साथ ईरानी शासन में रह चुके थे।
(5) पश्चिमी पंजाब में प्राप्त अशोक के प्रज्ञापन लेख के लिए ‘दिपि’ शब्द का प्रयोग हुआ है। स्पष्टतया यह शब्द प्राचीन ईरानी भाषा से ग्रहण किया है।
(6) मिस, अरब तथा लघु एशिया में अरमाइक वर्णमाला का व्यापक प्रयोग था तथा प्रशासनिक कार्य हेतु ईरानी सम्राटों द्वारा उसे स्वीकृति प्रदान की गयी। इसी समय ईरानियों के अधीन भारतीय क्षेत्र में अरमाइक लिपि का प्रवेश हुआ, जिससे खराष्टी की उत्पत्ति वास्तविकता ज्ञात करने के लिए उक्त बातों का परीक्षण आवश्यक है।


(1) जहां तक खरोष्टी और अरमाइक वर्णों के साम्य का प्रश्न है, यह साम्य अत्यन्त न्यून है। ब्यूलर का मत इस आधार पर भी उपयुक्त नहीं लगता कि खरोष्टी वर्णों की उत्पत्ति आठवीं-दसवीं शती ई.पू.के अरमाइक वर्गों से हुई।
(2) खरोष्टी लिपि का दायें से बायें लिखा जाना यह सिद्ध नहीं करता कि वह सामी मूल से विकसित हुई।
(3) खरोष्टी लिपि में दीर्घ स्वरों का अभाव है। इसका मुख्य कारण यह था कि यह एक कामचलाऊ लिपि थी और उसका आविष्कार पश्चिमोत्तर भारत की प्राकृत बोलियों को लिपिबद्ध करने के लिए हुआ था। प्राकृत में दीर्घस्वरों, समासों तथा कठिन संधियों का बहिष्कार किया जाता था। अतः दोनों लिपियों की सामान्य विशेषताओं का कारण सामी लिपि का प्रभाव नहीं अपितु उनकी लोकप्रियता है।
(4) पश्चिमोत्तर भारत के एक भाग पर ई.पू. छठी शती से ई.पू. चौथी शती तक ईरानी आधिपत्य की ईरानी स्रोतों से ज्ञात हुई है। किन्तु वहां ईरानी शासकों का एक भी अभिलेख न तो खरोष्टी लिपि में पाया गया है और न ही अरमाइक में। संभवतः ईरानियों का भारतीय क्षेत्र पर प्रभाव नाममात्र का रहा हो। ऐसी स्थिति में यह संभव नहीं प्रतीत होता कि यहां एक नवीन लिपि का प्रारम्भ किया गया हो।
(5) ब्यूलर ‘दिपि’ शब्द को फारसी या संस्कृतेतर मानने का कोई कारण नहीं बताते। संस्कृत में इसका अर्थ ‘प्रकाशित होना है।
(6) मिस, अरब और लघु एशिया में अरमाइक वर्णों का व्यापक प्रचार था। किन्तु भारत में यह बात न थी। यह संभव प्रतीत नहीं होता कि भारतीयों ने अरमाइक वर्णों के अनुकरण करने की आवश्यकता अनुभव की होगी।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि खरोष्टी लिपि की उत्पत्ति भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में हुई। चीनी परम्पराओं से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है कि खरोष्टी का आविष्कारक खरोष्ठ नामक भारतीय था। इसी कारण लिपि का नाम आविष्कारक के नाम पर खरोष्टी पड़ गया। उत्तर-पश्चिमी भारत में कुछ भाग पर जब ईरानी प्रभाव स्थापित हुआ तब इस भाग में यह लिपि लोकप्रिय हो गयी। यही कारण है कि फारसी सिालोई खरोष्टी लिपि में अंकित है। जब मौर्य शासकों की सता के अंतर्गत देश का
यह भाग आया तब उन्होंने भी इस क्षेत्र में लोकप्रिय खरोष्टी लिपि को ही अपनाया । कालान्तर में यवनों, पहलवो, शको तथा कुषाणों ने भारतीय प्राकृत भाषा के लिए इस लिपि का प्रयोग किया।

ब्राह्मी से अन्य लिपियों का विकास

ब्राहमी लिपि भारत की अत्यन्त प्राचीन लिपि है, जिसके अस्तित्व का प्रमाण लगभग ई.पू. 500 से मिला है। पिप्रहवा और भी गांव से प्राप्त आभलेख इसके प्रमाण है। इन अभिलेखों तथा अशोक के शिलाप्रज्ञापनों की लिपि में विशेष अन्तर नहीं है। दक्षिण भारत से प्राप्त भट्टिप्रोलु लेखों की लिपि, पिप्रहवा, बर्ली और अशोक के लेखों से निसृत प्रतीत होती है। ई.पू. 500 से लेकर 350 ई. तक की समस्त लिपियां ब्राहमी संज्ञा से अभिहित कालान्तर में ब्राह्मी लिपि में कुछ परिवर्तन हुए और उससे
अनेक लिपियां विकसित हुई। कई लिपियों के कुछ अक्षर मूल अक्षरों से बहुत बदल गये। इस विकास में दो प्रवाह स्पष्ट देखे जा सकते हैं। इन्हें क्रमशः उतर भारतीय और दक्षिण भारतीय शैली कहा जाता है। उतर भारतीय शैली प्रायः नर्मदा नदी के उतर में और दक्षिणी शैली उस नदी के दक्षिण में विकसित हुई। उतर भारतीय शैली के अन्तर्गत निम्नांकित मुख्य लिपियां हैं

गुप्त लिपि

गुप्त शासकों के शासनकाल में ब्राह्मी लिपि का अधिकविकास हुआ और इसकी कई क्षेत्रीय शैलियां अस्तित्व में आई। हार्नले के अनुसार इसके दो भेद हैं –
(1) पूर्वी और (2) पश्चिमी।

पूर्वी विभेद के उदाहरण समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति और स्कन्दगुप्त के कहाँव स्तम्भलेख36 में मिलते हैं। इन अभिलेखों में ल, ष और ह पश्चिमी शैली से बिल्कुल भिन्न उत्कीर्ण किये गये हैं। इ के लिए दो बिन्दु तथा सामने लम्बवत् रेखा ( 🙂 का प्रयोग मिलता है। पश्चिमी भेद की भी दो शैलियां हैं – घसीट गोलाईदार और कोणीय तथा स्मारक शैली। कोणीय शेली की विशेशता सिरों पर – मोटी रेखाएं और र का हुकवाला रूप है। कुमारगुप्त प्रथम के । बिलसड स्तम्भलेख की लिपि पश्चिमी लिपि की प्रतिनिधि समझी जाती है। घसीट शैली का नमूना चन्द्र के मेहरौली स्तम्भलेख तथा स्कन्दगुप्त के इन्दौर ताम्रपत्र में मिलता है ।

गुप्तकाल की उत्तर भारतीय शैली ई. पांचवीं-छठी शती में पश्चिमोत्तर भारत तथा मध्य एशिया पहुंची। कालान्तर में इस नई लिपि ने खरोष्टी लिपि का स्थान ले लिया। बावर महोदय ने मध्य एशिया के काशगर स्थान से कई हस्तलिखित प्रतियां प्राप्त की, जो इसी लिपि में हैं।

कुटिल लिपि

ब्राह्मी लिपि में निरन्तर विकास होता गया। छठी शती में इस विकास ने एक नया मोड़ लिया। उस समय उतर भारतीयभारतीय लिपियों का विकास अभिलेखों के अक्षरों में अधिक कलात्मकता परिलक्षित होती है। अक्षरों में नीचे की ओर खड़ी रेखाएं बायीं ओर मुड़ी हैं तथा स्वर की मात्राएं टेडी और लम्बी हैं। इस लिपि-शैली के अक्षरों की खड़ी रेखाओं के नीचे छोटे न्यूनकोण बनते हैं इसीलिए ब्यूलर ने उसे न्यूनकोणीय लिपि का नाम दिया। प्रिन्सेप इसे कुटिल लिपि कहते हैं। अभिलेखों में ‘कुटिलाक्षर’ नाम का उल्लेख हुआ है। इसकी पुष्टि देवल-प्रशस्ति से होती है।

विक्रमांकदेवचरित43 में भी ‘कुटिललिपिभिः’ का उल्लेख हुआ है। आदित्यसेन के अफसद प्रस्तरलेख में ‘कुटिल’ के स्थान पर ‘विकट’ शब्द मिलता है। विकट और कुटिल दोनों पर्याय हैं और अक्षरों की टेढ़ी आकृति के सूचक है।

उपर्युक्त वर्णित लिपि का भारतीय नाम सिद्रमातृका था। इसकी पुष्टि अलबेर इस कथन से होती है कि कश्मीर वाराणसी तथा मध्यदेश (कन्नौज के आस-पास का क्षेत्र) में सिद्धमातृका लिपि का प्रयोग होता था और मालवा में नागरी लिपि का प्रचलन था। अलबेस्नी के कथन से प्रतीत होता हैं कि कठी शती ई. से दसवीं शती तक की उत्तर भारतीय लिपि का नाम सिद्धमातृका था। इसी लिपि को ‘सिद्धम् लिपि’ भी कहा जाता था, क्योंकि इस लिपि के लेख ‘ओं नमः सिद्धम’ से प्रारम्भ होत थे।

देवनागरी लिपि

8वीं तथा 10 वीं शती के बीच न्यूनकोणीय या सिद्धमातृका।लिपि धीरे-धीरे विकसित होकर देवनागरी लिपि में परिवर्तित हो गयी। नागरी नाम की उत्पति तथा उसके अर्थ के सम्बन्ध में विटान एकमत नहीं हैं। कुछ का कथन है कि गुजरात के नागर ब्राहमणों ने सबसे पहले इस लिपि का प्रयोग किया, अतः ‘नागरी’ नाम पड़ा।

स्थापत्य की उतर भारत की एक विशेष शैली को ‘नागर शैली कहते हैं, अत ‘नागर’ या ‘नांगरी’ शब्द उतर भारत के किसी बड़े नगर से सम्बन्धित प्रतीत होता है। यह भी संभव है कि नगर-निवासी इसका प्रयोग करते रहे हो, जिससे इसका नाम नागरी हो गया। इस लिपि की एक अन्य संज्ञा ‘देवनागरी’ है जो इसके दैवी संबंध की अभिव्यक्ति करती है। संभवतः प्रारम्भ में शारत्र लिखने के लिए वाहमणों ने इस लिपि का प्रयोग किया था इसीलिये यह नाम प्रसिद्ध हुआ।

14वीं-15वीं शती में विजयनगर के शासकों ने अपने
अभिलेखों की लिपि को ‘नदिनागरी’ नाम दिया। कहा जाता है कि वाकाटकों और राष्ट्रकूटो के समय के महाराष्ट्र के प्रसिद्ध नंदिनगर ( आधुनिक नांदेड ) की लिपि होने के कारण इसका नाम नंदिनागरी पड़ा। 8वीं – 9वीं शती ई. से सम्पूर्ण देश में इस लिपि का प्रचार हुआ और यह एक सार्वदेशिक लिपि बन गयी।

गुप्तकालीन ब्राह्मी तथा परवर्ती कुटिल लिपि में अक्षरों के सिरों पर छोटी आड़ी लकीरें या छोटे ठोस तिकोन (कीलें) है। किन्तु नागरी अक्षरों में खड़ी लकीरों के सिरों पर कीलों के स्थान पर आड़ी रेखाएं मिलती हैं। ये आड़ी रेखाये उतनी ही लम्बी हैं जितने कि अक्षर। ऐसे भी लेख मिलते हैं जिनमें कुछ अक्षरों में कीलशीर्ष है और कुछ में आड़ी शिरोरेखाएं है। उत्तर भारत में सर्वप्रथम गुर्जर-प्रतिहार शासकों के राजकीय लेख नागरी लिपि में उत्कीर्ण किये गये। आठवीं शती ई. में अवन्ति प्रदेश से बढ़कर इन शासकों ने कनौज पर अधिकार कर लिया। प्रतीहार-शासक महेन्द्रपाल का दिध्वादबौली ताम्रपत्र इस लिपि का पहला अभिलेख है।

12 वीं शती ई. के बाद उत्तर भारत के प्रायः सभी हिन्दु शासकों ने नागरी लिपि का प्रयोग किया।

शारदा लिपि

9वीं-10 वीं शती ई. में नागरी एक सार्वदेशिक लिपि थी। उसी समय अनेक प्रादेशिक लिपियां भी जन्म ले रही थीं। इन लिपियों की प्रमुख विशेषता यह है कि एक ओर।उनके अक्षर प्राचीन वाहमी की शैलियों के अक्षरों से मिलते हैं और दूसरी ओर वर्तमान कई प्रादेशिक लिपियों के अक्षरों से भी मिलते हैं। शारदा लिपि का जन्म पंजाब और काश्मीर प्रदेशों में हुआ।

शारदा ( सरस्वती) को काश्मीर की आराध्यदेवी माना जाता है, इसीलिये काश्मीर को ‘शारदादेश’ या ‘शारदामंडल’ भी कहा जाता था। शारदादेश की लिपि के कारण ही इसका नामकरण शारदा लिपि हुआ। नागरी लिपि की तरह यह लिपि भी कुटिल लिपि से निकली।

9वी 10 वीं शती ई. की है। कालान्तर में इस लिपि का विकास हुआ और उसका विस्तार उत्तर भारत में 5 भी हुआ। इस लिपि को घसीट में लिखने के कारण एक नई लिपि का जन्म हुआ, जिसे टाकरी कहा जाता है।।इस नई लिपि का प्रचार पंजाब, जम्मू और पहाड़ी क्षेत्रो में हुआ। पंजाबी और गुरुमुखी के अक्षर भी शारदा लिपि के अनुरूप प्रतीत होते हैं। बंगला लिपि अनेक विद्वान बंगला लिपि का जन्म भारत के पूर्वी भाग ने की सिद्धमातृका या कुटिल लिपि से मानते हैं। वे बंगला को नागरी की पुत्री स्वीकार करते है। बंगला लिपि का आरंभ 10 वीं शती ई. के पूर्वी भारत के अभिलेखों में दृष्टव्य है। 12 वीं शती में इस लिपि ने सर्वथा नया रूप धारण कर लिया। बंगाल के पाल-राजाओं के ताम्रपत्रों में बंगला के कुछ अक्षरों का आभास मिलता है। तदनन्तर सेन-शासक विजयसेन के देवपाड़ा अभिलेख ‘के अक्षर बंगा के और अधिक निकट है।


12 वीं शती ई. के कामम्प शासक वैद्यदेव के ताम्रपत्र53 की लिपि स्पष्टतः बंगला है। 14 वीं शती ई. तक उड़िया और बंगला लिपि का विकास।प्रायः एक-जैसा मिलता है। बाद में उडिया लिपि के अक्षर अधिकाधिक गोलाकार होते गये। इसी समय मिथिला (बिहार) में संस्कृत में ग्रन्थ लेखन के लिए बंगला से मिलती-जुलती नयी लिपि का जन्म हुआ, जो ‘मैथिली’ लिपि के नाम से अभिहित हुई।
यह लिपि मुख्य रूप से मैथिली ब्राह्मणों द्वारा व्यवहृत हुई। बिहार में ही नागरी से एक और कामचलाऊ लिपि का विकास हुआ। कायस्थों द्वारा व्यवहृत होने से इसका नामकरण ‘कैथी’ लिपि हुआ।

दक्षिण भारतीय शैली

भारत में विन्ध्यपर्वत के दक्षिण में नर्मदा नदी उत्तरापथ और दक्षिणापथ की सीमा बनाती है। लिपि के आधार पर पूर्व में बगाल के दक्षिण भाग और पश्चिम में काठियावाड को दक्षिण भारत केनअन्तर्गत रखा जाता है। उन भागों में प्रचलित लिपि को दक्षिण भारतीय शैली कहते हैं। दक्षिण शैली की लिपियां प्राचीन वाहमा लिपि के उस परिवर्तित रूप से विकसित हुई जो क्षत्रप और सातवाहन राजाओं के अभिलेखों तथा उनके पूर्ववर्ती नासिक, कार्ले आदि गुफाओं से प्राप्त अभिलेखों में उपलब्ध है। दक्षिण भारतीय शैली की लिपियों का वर्णन संक्षेप में इस प्रकार है:

पश्चिमी लिपि

430 से 900 ई. तक काठियावाड़, गुजरांत, नासिक, खानदेश तथा सतारा जिलों में पश्चिमी लिपि का प्रचार था। पांचवीं शती ई. में राजस्थान और मध्यभारत में भी इसके यदा-कदा प्रयोग के प्रमाण मिले हैं। किन्तु 9 वीं शती ई. में नागरी के प्रभाव के कारण इसका पूर्णतः लोप हो गया। यह लिपि चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल से गुप्त सम्राटी और उनके सामंतों के अभिलेखों में, वलभी के राजाओं, भड़ौच के गुर्जरों, बादामी के कतिपय चालुक्य शासको, नासिक और गुजरात के चालुक्यों और उनके सामन्तों, त्रैकूटको, खानदेश के अश्मका और गुजरात के राष्ट्रकूटों के अभिलेखों में मिलती है।55 उत्तरी शैली के पडास की लिपि होने से इस पर इसका प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर है।

मध्य भारतीय लिपि

यह लिपि मध्यप्रदेश, आन्ध्रप्रदेश के उतरी भाग तथा बुन्देलखण्ड के कुछ भागों में ई. 5 वीं शती से 8 वीं शती तक मिलती है। इस लिपि का पूर्ण विकसित स्प समुद्रगुप्त के एराण अभिलेख, चन्द्रगुप्त द्वितीय के उदयगिरि अभिलेख, शरभपुर राजाओं के ताम्रपत्रों, वाकाटकों के ताम्रपत्रों, तीवर राजाओं के दानपत्रों और दो प्राचीन कदम्ब अभिलेखों में प्राप्त होता है।

इन सभी अभिलेखों में अक्षरों के सिरों पर खाली या भरे हुए वर्ग मिले है जो. देखने में छोटे पिटकों या बक्सोनुमा लगते हैं। इसीलिए इस लिपि का नामकरण पेटिका शीर्प लिपि ( बाक्स-हेडेड) किया गया है। इस लिपि में ताम्रपत्र अधिक मिले हैं।

तेलुगु – कन्नड़ लिपि

तेलुगु और कन्नड़ लिपियों का जन्म लगभग एक ही समय हुआ। दक्षिण भारत में ये बहुत लोकप्रिय हुई। साधारणतः इनका चलन बम्बई के दक्षिण कर्नाटक और आन्ध्रप्रदेश में हुआ। दक्षिण के चालुक्य राजाओं के अभिलेखों में इनका प्रारम्भिक स्वरुप मिलता है। कन्नड़ लिपि का सबसे पुराना लेख बादामी की वैष्णव गुफा के बाह्य भाग पर उत्कीर्ण चालुक्य राजा मंगलेश का है।

हलबीड से प्राप्त काकुरथवर्मा का ताम्रपत्र58 भी इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है। कन्नड़ भाषा की सबसे पुरानी उपलब्ध हस्तलिपि ‘कविराजमार्ग 877 ई. की है।

छठी शती से तेलुगु भाषा के लेख प्राप्त होते हैं। प्रारम्भ में कन्नड़ और तेलुगु लिपियां एक जैसी थीं। 8 वीं शती ई. से तेलुगु लिपि ने स्वतन्त्र रूप ग्रहण कर लिया और 13 वीं शती ई. तक दोनों लिप्रिया एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न हो गयीं। इसी समय तेलुगु कवि मंचन ने अपनी लिपि को आन्ध्र लिपि की संज्ञा दी।

ग्रन्थ लिपि

तामिलनाडु में 350 ई. के बाद पूर्वी तट के पल्लवों, चोलो और पाण्ड्यां के संस्कृत अभिलेख सुलभ हैं। इनमें से पल्लव अभिलेखों का इतिहास सबसे अधिक पुराना है। 5 वीं शती ई. से पल्लव अभिलेखों की लिपि अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार की लिपि का प्रयोग भारत के बाहर दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक अभिलेखा में मिला है। इस लिपि को ‘पल्लव’ लिपि नाम दिया।गया। इसी लिपि के और अधिक विकास होने पर इससे पल्लव ग्रन्थ’ लिपि का जन्म हुआ। कालान्तर में संस्कृत ग्रन्थ लिखने हेतु एक स्वतन्त्र लिपि की आवश्यकता हुई। अतः संस्कृत ग्रन्थ जिस लिपि में लिपिबद्ध किय गये उसे ‘ग्रन्थ लिपि कहा गया। केरल की मलयालम लिपि डगी ग्रन्थ – लिपि से विकसित हुई। पल्लव ग्रन्थ लिपि के उदाहरण नरसिंहवर्मा के मामल्लपुरम् लघुलेखो तथा नंदिवर्मा के उदयेंद्रिय ताम्रपत्रों आदि में प्राप्त होते हैं।

कलिंग लिपि

7वीं शती से 11वीं शती ई. तक कलिंग देश में गंगवंशी राजाओं का शासन रहा। इस लिपि का सबसे पुराना अभिलेख पूर्वी गंगवंशी शासक देवेन्द्रवर्मा का गांगेय संवत् 87 का है । लेख की लिपि को ‘कलिंग’ लिपि का नाम दिया गया है। इस लिपि के सिरे वर्गाकार है।

तमिल लिपि

दक्षिण भारत की तमिल, मलयालम, तेलुगु और कन्नड़ भाषाएं.दक्षिण भाषा परिवार की हैं। इन सभी भाषाओं की लिपियां ब्राह्मी लिपि से विकसित हुई। तमिल भाषा अत्यन्त प्राचीन है। तमिल लिपि का विकास पल्लव – ग्रंथ लिपि से हुआ। परमेश्वरन् 7 वीं शती के कूरम ताम्रपत्र में इस लिपि का प्रारम्भिक स्वरूप देखने को मिलता है। सुदूर दक्षिण के पाण्ड्य प्रदेश में तमिल भाषा लिखने के लिए ‘वट्टेलक्तु’ लिपि का विकास हुआ।

इरा नई लिपि के अक्षर गोलाकार हैं, जो ग्रन्थ लिखने के लिये सुविधाजनक थे। प्रस्तरों पर उत्कीर्ण करने में असुविधा के कारणनचोल नरेश राजराज प्रथम ने उपर्युक्त लिपि के स्थान पर सीधे अक्षरों वाली ‘कोल-एलुतु’ लिपि को लेखों में स्थान दिया। यह लिपि राजराज के बाद भी बहुत लोकप्रिय हुई।

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