भारत में अक्षरों का आविष्कार किस तरह हुआ ?

By | October 7, 2020

भारत में अक्षरों का आविष्कार किस तरह हुआ ?

साहित्यकारों, अध्यापकों और पुरोहितों ने साहित्यिक और धार्मिक कार्य सम्पन्न करने के लिये किया था। काफी समय तक लिखने-पढ़ने के काम में इन्हीं लोगों का एकाधिकार था। तो भी, कुछ ऐसे प्रमाण उपलब्ध हुए जिनसे ज्ञात होता है कि अत्यन्त प्राचीनकाल से ही यहां पेशेवर लेखक या उनका एक वर्ग विद्यमान था जो लिखकर अपनी आजीविका अर्जन करता था। इन लोगों के लिये विभिन्न शब्दों का प्रयोग हुआ है, जिसका वर्णन निम्नप्रकार है

लेखक

लिखकर आजीविका अर्जन करने वालों को लेखक कहा जाता था। इस शब्द का तथा इसके समानवाची शब्दों का उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है। महाकाव्यों में इन शब्दों के उल्लेख से ज्ञात होता है कि उनके सृजन के समय लेखनविधि कला और व्यवसाय के रूप में प्रचलित थी। आद्य पालि साहित्य में इस शब्द का प्रयोग प्रचुरता से किया गया है। विनयपिटक में लेखन की प्रशंसा एक विशिष्ट कला के रूप में की गयी है। एक वार्तालाप में एक लड़के के माता-पिता ने उसे सलाह दी है कि वह आजीविका के लिये लेखक का व्यवसाय चुनें। यद्यपि इस व्यवसाय में उसकी अंगुलियों को कष्ट होगा, किन्तु उसकी जिन्दगी आराम से व्यतीत होगी। महावग्ग और जातक कथाओं से ज्ञात होता है कि पारिवारिक मामलों या नीति और राजनीति के सूत्र स्वर्णपत्रों पर खोद दिये जाते थे। इसके अतिरिक्त दो बार पोत्थर ( पाण्डुलिपि) का उल्लेख मिलता है, जिससे प्रमाणित होता है कि व्यवसायिक स्तर पर लेखकों का एक वर्ग अस्तित्व में था।

लेखन व्यवसाय के सम्बन्ध में अभिलेखिक प्रमाण भी उपलब्ध है। सांची अभिलेखों में पहली बार लेखक शब्द का उल्लेख मिलता है। यहां पर लेखक शब्द दाता के लेखन व्यवसाय को स्पष्ट करता है। यद्यपि ब्यूलर ने इसका अनुवाद “हस्तलिखित ग्रन्थों का प्रतिलिपिक” या “लिपिकार, लिपिक” किया है तथापि वे अपने अनुवाद को सन्देहास्पद मानते हैं। बहुसंख्यक परवर्ती अभिलेखो में लेखक का तात्पर्य उस व्यक्ति से था जो ताम्रपत्र या प्रस्तर पर उत्कीर्ण होने वाले प्रलेख को तैयार करता था।

किन्तु आजकल लेखक उसे कहते हैं जो हस्तलिखित पुस्तकों की प्रतिलिपियां करता है। आस्थावान चरित्रवान् ब्राह्मण तथा गरीब और बूढ़े कायस्थ प्रायः मंदिरों और पुस्तकालयों में प्रतिलिपि कर अपनी आजीविका चलाते थे। अभिलेखों से विदित होता है कि जैन मुनि, श्रावक और साध्वियां अपना समय हस्तलिखित पुस्तकों की प्रतिलिपियां कर बिताती थीं। इसी प्रकार नेपाल में बौद्ध-ग्रन्थों के प्रतिलिपिकारों के रूप में भिक्षुओं, वज्राचार्यों आदि के नाम मिलते हैं।

लिपिकर या लिबिकर

चौथी शती ई.पू. में लेखक के अर्थ में “लिपिकर” “लिबिकर” या “दिपिकर” शब्दों का प्रयोग होता था। पाणिनि ने लिपिकर और लिबिकर के समस्त पदों का उल्लेख किया है। अशोक के प्रज्ञापनों में अनेक बार इनका उल्लेख हुआ है। अमरकोष में इसे लेखक का पर्याय बताया गया है। स्वप्नवासवदता में इसका सामान्य अर्थ लेखक है। अशोक के चौदहवें शिलाप्रज्ञापन में इस शब्द का प्रयोग लिपिक पद के लिये किया गया है। उसके ब्रह्मगिरि और सिद्धपुर अभिलेखों का लेखक “पड” स्वयं को लिपिकर कहता है। इस प्रकार अशोक के अभिलेखों में इस शब्द का अर्थ लेखक और उत्कीर्णक दोनों है। सांची से प्राप्त एक अभिलेख का दाता सुबहित गोतिपुत स्वयं के लिये “राजलिपिकर” पद का उल्लेख करताहै। संभवतः वह “राजा का लेखक” रहा होगा।

दिविर

पूर्व मध्यकाल के प्रारम्भिक चरण में अनेक अभिलेखों के लेखक संधिविग्रहाधिकृत (संधि और युद्ध का मंत्री) है, जिनकी उपाधि दिविरपति या दिवीरपति (दिविरों का अध्यक्ष) थी। दिविर शब्द सबसे पहले महाराज जयनाथ के खोह ताम्रपत्र अभिलेख, वर्ष 17718 में मिलता है। दिविरपति से विदित होता है कि सांधिविग्रहिक की अध्यक्षता में बहुत से दिविर होते थे जिनका काम लेख तैयार करना था। इस शब्द की उत्पति के सम्बन्ध में.ब्यूलर का मत है कि “यह दिविर और कोई नहीं फारसी देबीर = लेखक ही था। ये देबीर संभवतः सासानी शासनकाल में पश्चिमी भारत में बस गये थे। इसकाल में ईरान और पश्चिमी भारत के बीच व्यापारिक सम्बन्ध बहुत बढ़ गये थे। डा. राजबली पाण्डेय का अभिमत है कि 7 वीं-8वीं शती ई. में न तो भारत में सीधियन या सासानी शासन था और न ही फारस में अरबों का आधिपत्य हो जाने से भारत और फारस के बीच किसी प्रकार का वाणिज्यिक अथवा सांस्कृतिक सम्बन्ध था। मध्यभारत में भी सीथियन शासन चौथी शती ई. के अन्तिम चरण में समाप्त हो गया। अतः दिविर की उत्पत्ति अशोक के शिलाप्रज्ञापनों में वर्णित दिपिकर – दिविकर – दिवियर – दिविर से संभव प्रतीत होती है। इस शब्द का प्रयोग 11 वीं और 12 वीं शतियों तक प्रचलित था। राजतरंगिणी में इसका उल्लेख है। क्षेमेन्द्र के लोकप्रकाश में इसके अनेक उपभेद यथा गंज-दिविर (बाजार-लेखक), ग्राम-दिविर, नगर-दिविर, रखवास-दिविर मिलते हैं।

कायस्थ

प्राचीन भारतीय साहित्य और अभिलेखों में लेखन-व्यवसाय करने वाले वर्ग या जाति को कायस्थ कहते थे। यह शब्द पहली बार याज्ञवल्क्य स्मृति में आया है, जहां कहा गया है कि चाटों, तस्करों, दुश्चरित्रों, लुटेरों और विशेषकर कायस्थों से प्रजा की रक्षा करना राजा का कर्तव्य है। विज्ञानेश्वर कायस्थ शब्द की व्याख्या करते हुए कहता है कि कायस्थ लोग हिसाब-किताब करने वाले गणक, लिपिक, राजाओं के स्नेहपात्र एवं बड़े धूर्त होते हैं। बुधगुप्त के दामोदरपुर ताम्रपत्र लेख में कोटिवर्ष की विषय परिषद का सदस्य विप्रपाल को प्रथम कायस्थ बताया गया है। परवर्ती अभिलेखों में कायस्थों का उल्लेख प्रायः मिलता है।

कायस्थ शब्द की अनेक व्याख्याएं की गयी हैं। उशना ने.कायस्थों को एक जाति माना है और उनके नाम की एक विलक्षण व्युत्पत्ति प्रस्तुत की है, यथा काक के “का,”, यम के “य,” एवं स्थपति के “स्थ” अक्षरों से कायस्थ शब्द बना है। काक, यम और स्थपति शब्द क्रमशः लालच, क्रूरता और लूट के परिचायक हैं। आधुनिक सन्दर्भ में राज्यस्पी काय में स्थित व्यक्ति कायस्थ कहलाता है। एक अन्य दार्शनिक व्याख्या के अनुसार जिसके आदर्श एवं इच्छाएं केवल उसकी काय (शरीर) में ही केन्द्रित हो जाय और जो किसी अन्य वस्तु की परवाह न करे वह कायस्थ कहलाता है।

प्रारम्भ में कायस्थ नामक कोई जाति या वर्ण न था। समयानुसार लेखक का कार्य करनेवाला वर्ग कायस्थ
कहा जाने लगा। प्रारम्भ में इस वर्ग में अनेक वर्गों के व्यक्ति थे। इसीलिये जातिप्रथा स्ढ़ हो जाने पर और उनमें विभिन्न रीति-रिवाज प्रचलित होने के कारण वे अपनी ही उपजाति में विवाह करने लगे। आजकल कायस्थ एक विशिष्ट जाति है जिसे समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त है। करण, करणिक, करणि, शासनिन और धर्मलेखी भारत के विभिन्न भागों में लेखक या लिपिक कायस्थ के अतिरिक्त और भी नामों से ज्ञात थे जिनमें करण, करणिक, करणि, शासनिन् और धर्मलेखी प्रमुख हैं। किसी अधिकरण (कार्यालय) से सम्बन्धित होने के कारण लिपिक को करण कहा जाता था। करण संभवतः कायस्थ का पर्याय है। गौतम तथा याज्ञवल्क्य के अनुसार वह वैश्य पति एवं शूद्र पत्नी का अनुलोम पुत्र है। मनु ने लिखा है कि व्रात्य (जिसका उपनयन संस्कार न हुआ हो) संज्ञक क्षत्रिय से क्षत्रिया में उत्पन्न पुत्र “झल्ल, मल्ल, निच्छवि, नट, करण, खस और द्रविड़” कहलाते हैं। महाभारत के अनुसार धृतराष्ट्र की वैश्य नारी से युयुत्सु.नामक एक करण सन्तान थी। अमरकोष की व्याख्या करते समय क्षीरस्वामी ने कहा है कि करण, कायस्थों एवं अध्यक्षों के समाज का परिचायक है। कीलहान33 के मतानुसार करणिक “विधि प्रलेखों का लेखक” है। यह एक सरकारी पद था, जाति नहीं। करणिक’ का उल्लेख कर्णदव के गढ़वा ताम्रपत्र और यशोवर्मा चन्देल के खजुराहो प्रस्तर लेखों में मिलता है। वें सुन्दर अक्षर लिखने में चतुर होने के कारण गौड़देश से बुलाये गये
थे। उन्हें संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान था, अतः वे शुद्ध लिख सकते थे। हर्षचरित में ग्रामाक्षपटलिक के सहायक लेखक “करण” का उल्लेख है। बिहार में अभी तक कायस्थों की एक उप जाति का नाम “करन” है। दानपत्रों को ताम्रशासन, ताम्रपट ताम्रपट्टिका, ताम्रफली आदि नाम दिये गये हैं। इनके लेखक को ही शासनिक कहते थे। इसी प्रकार धार्मिक दान का लेखक होने के कारण उसे धर्मलेखी भी कहा जाता था

शिल्पी, रूपकार, सूत्रधार और शिलाकूट अभिलेखिक साक्ष्यों से प्रमाणित होता है कि प्रशस्ति अथवा काव्य, चाहे वे प्रशस्तिपरक, दानपरके, धर्मपरक या और कोई प्रकार के हों, पहले कवियों या योग्य व्यक्तियों द्वारा रचे या लिखे जाते थे। तब पेशेवर लेखक द्वारा उसकी एक स्वच्छ और स्पष्ट अक्षरों में एक प्रतिलिपि तैयार की जाती थी। अन्ततः वह प्रतिलिपि कारीगर (शिल्पी, रूपकार, सूत्रधार या शिलाकूट ) को दी जाती थी जो उसे शिलाफलक या धातुपत्र पर उत्कीर्ण कर.देता था । ब्यूलर का कथन है कि “मेरी देखरेख में भी एक बारयही काम हुआ था। उसमें भी इसी परम्परा का अनुकरण किया गया था। कारीगर को ठीक उस पत्थर के आकार का एक कागज दे दिया गया जिस पर प्रलेख (मंदिर की प्रशस्ति लिखा था।

उसने पहले एक पंडित की देखरेख में पत्थर पर अक्षर बनाये फिर उन्हें खोदा।” कई बार प्रशस्तिकार यह भी कहता है कि उन्होंने कारीगर का भी काम किया है, पर ऐसे उदाहरण अपवादस्वरुप ही मिलेंगे। कभी-कभी कारीगर यह भी कहते हैं कि प्रलेख की स्वच्छ प्रतिलिपि उन्होंने ही बनायी है। जहां तक, ताम्रशासनों में प्रलेख उत्कीर्ण करने वालों के नामों का सम्बन्ध है, उनका उल्लेख अत्यन्त विरल है और वह भी पूर्वमध्यकालीन अभिलेखों में ही मिलता है। लिखित ताम्रपत्रों को.उत्कीर्ण, उन्मीलित और उत्कट्टित कहा जाता था। उत्कीर्णकर्ता कारीगरों को पीतलकार, लौहकार या अवस्कार, कांस्यकार या ताम्रकार, हेमकार,48 शिल्पी या विज्ञानिक कहा जाता था। उड़ीसा के ताम्रशासनों50 में इनके विपरीत अक्षशाली, अक्षशालिक, अखशाली या अखशाल शब्दों का प्रयोग हुआ है।

प्रलेखों का निर्माणकर्ता

अभिलेखिक स्त्रोत इस सन्दर्भ में पर्याप्त प्रकाश नहीं डालते। वे केवल उसी व्यक्ति का नाम लेते है जिसने प्रलेख की रचना की या उसे लिखा। इस सन्दर्भ में अमात्य, सांधिविग्रहिक, सेनापति, बलाधिकृत, महाक्षपटलाधिकरणाधिकृत, महासामन्त,महाराज आदि का उल्लेख मिलता है। एक उदाहरण से वस्तुस्थिति स्पष्ट हो जावेगी। धरसेन के वलभी तासलेख में लिखा गया है “स्वयं मेरे हस्ताक्षर महाराजाधिराज श्रीधरसेन । दूतक सामन्त शीलादित्य। पशिविग्रहाधिकरणाधिकृत दिविरपति स्कन्दभट द्वारा लिखा गया।”

उपर्युक्त अवतरण से विदित होता है कि प्रलेख के अन्त में.शासक के हस्ताक्षर होते थे। लेख जारी करते समय शासक के प्रतिनिधि के रूप में दूतक उपस्थित रहता था और दिविरों के अध्यक्ष तथा शान्ति और युद्धमंत्री के समक्ष प्रलेख उत्कीर्ण किया जाता था। प्रस्तुत उदाहरण से ज्ञात होता है कि प्रलेख तैयार करने का कार्य सांधिविग्रहिक का था। तो भी, ऐसा प्रतीत होता है कि अभिलेख लिपिकों द्वारा ही तैयार किये जाते थे। कल्हण लिखता है कि काश्मीर शासकों के यहां अभिलेख तैयार कराने के लिये एक विशेष अधिकारी होता था जिसे पट्टोपाध्याय कहते थे।

उसका कार्य स्वत्वलेखों के तैयार करने का ढंग बताना था। वह अक्षपटल कार्यालय में काम करता था।स्टाइन के अनुसार यह कार्यालय महालेखापाल का था। ब्यूलर54 उसे अभिलेखागार बताते हैं।

लिपिकों और लेखकों के लिये नियमावली

प्राचीन भारतीयों ने न केवल लिपि का आविष्कार कर उसमें निरन्तर सुधार किया अपितु पत्राचार और लेखों के प्रारूप तैयार करने के लिये नियम बनाकर लेखनकला का विकास किया। ऐसे अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं जो लिपिकों और लेखकों के मार्गदर्शन के लिये तैयार किये गये थे। लेखपंचाशिका एक ऐसा ही ग्रन्थ है जिसमें व्यक्तिगत पत्रों के साथ-साथ भूदान-लेखों और संधियों के मसौदे बनाने के नियमों का वर्णन है। क्षेमेन्द्र के लोकप्रकाश में विभिन्न प्रकार के बन्ध-पत्रों, हुण्डियों आदि के प्रारूपों के नियम लिपिबद्ध हैं।

विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक वररुचि था जिसने पत्र-मंजरी नामक ग्रन्थ लिखा है। चूंकि इस ग्रन्थ में कागज पर लिखने का उल्लेख है अतः बर्नेल का मत है कि यह ग्रन्थ भारत में मुस्लिम आक्रमण के बाद लिखा गया। उपर्युक्त मत स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यूनानी लेखकों के अनुसार भारत में ई.पू. चौथी शती में कागज पर लिखने का चलन था। लिपि के विकास में लेखकों तथा कारीगरों का योगदान लिपि के विकास में जनता के तीन वर्णों का हाथ रहा। इनमें पहला वर्ग ब्राह्मण-अध्यापकों, साहित्यकारों और पुरोहितों का था जिन्होंने अक्षरों का आविष्कार किया और साहित्यिक तथा धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु उनमें आद्य मानवों की चित्र लिपियों और प्रतीक चिन्हों के आधार पर परिष्कार किया। उन्होंने इसमें व्याकरण और ध्वनि विज्ञान के अनुसार पुनः परिवर्तन किये और लिपि को पूर्णता प्रदान करने का प्रयास किया। उनका यह प्रयत्न बौद्ध और जैन भिक्षु तथा भिक्षुणियों द्वारा आगे बढ़ाया गया क्योंकि.उन्होंने धार्मिक ग्रन्थों के लेखन और प्रतिलिपि करने में एकनिष्ठ होकर कार्य किया। अक्षरों के विकास को प्रभावित करने वाला दूसरा वर्ग पेशेवर लेखकों और उनकी जाति का है। यद्यपि इनमें सृजनात्मक प्रतिभा का अभाव था, तो भी, लेखन में गति लाने के लिये अक्षरों के सुधार लायक मेधा उनमें थी। अतः अक्षरों के आकार-प्रकार में उन्होंने परिवर्तन किया। किन्तु सबसे अधिक परिवर्तन तीसरे वर्ग द्वारा किया गया। ये प्रस्तर और धातु पर लेख खोदने वाले थे। यद्यपि ये पहले दो वर्गों के समान शिक्षित न थे, तो भी, अपने काम में आने वाली सामग्री (प्रस्तर, धातु) की प्रकृति को समझते थे। अतः लेख उत्कीर्ण करते समय उन्होंने अक्षरों के सुन्दर और शीघ्र लेखन हेतु अनेक परिवर्तन किये।

Leave a Reply