भारत में लेखन-कला का उद्भव कैसे हुआ ?

By | October 2, 2020

भारत में लेखन-कला का उद्भव कैसे हुआ ?

प्राचीन भारतीय इतिहास के कतिपय युगों के समान अन्धकारावृत्त है। उसके सम्बन्ध में विद्वानों द्वारा विभिन्न मत व्यक्त किये गये हैं। अनेक यूरोपियन विद्वानों का मत है कि भारतीय पहले लिखना नहीं जानते थे। मैक्समूलर का कथन है : “मुझे विश्वास है कि पाणिनि की शब्दावली में एक भी शब्द ऐसा नहीं है जिससे यह ज्ञात हो सके कि लेखन कला पहले विदित थी।”1 मैक्समूलर के अनुसार पाणिनि चौथी शती ई.पू. में हुए और इस प्रकार भारत में लेखन कला का विकास चौथी शती ई.पू. के बाद माना जायेगा। बर्नेल का कथन है कि भारतीय ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति फोनेशियन लिपि से हुई। उनके मतानुसार ऐसा 500 ई.पू. के बाद हुआ। ब्यूलर ने उपर्युक्त दोनों विद्वानों के विपरीत अपना मत इस प्रकार व्यक्त किया : “हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ब्राह्मी का विकास ई.पू. 500 के लगभग या इससे पूर्व पूरा हो चुका था।

इसलिए भारत में सेमेटिक लिपि के आगमन की वास्तविक तिथि.हम ई.पू. 800 के लगभग रख सकते हैं। यह अनुमान अभी अन्तिम नहीं है। भविष्य में भारत या सेमेटिक देशों में पुरालिपिक नये प्रमाणों की खोज होने पर इस तिथि में कुछ परिवर्तन भी हो सकता है। यदि इस अनुमान में कुछ परिवर्तन आवश्यक ही हुआ तो हाल की खोजों के आधार पर भारत में सेमेटिक लिपि के आगमन की तिथि ई. पू. 800 से पूर्व सिद्ध होगी। इसे संभवतः ई.पू. 1000 या इससे भी पहले रखना होगा

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उपर्युक्त तथा अन्य कई मत 19 वीं शती में और 20 वीं शती के प्रारम्भ में व्यक्त किये गये थे। तब से अब तक विपुल मात्रा में नई सामग्री प्रकाश में आ चुकी है, जिससे प्राच्यविद्याविदों के मतों परिवर्तन हुआ है। अतः यह आवश्यक है कि हम सभी उपलब्ध प्रमाणों का अध्ययन कर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने का प्रयत्न करें।

प्रचलित भारतीय परम्परा में लिपि आविष्कार का श्रेय ब्रह्मा को दिया गया है। पांचवीं शती की नारदस्मृति में कहा गया है कि ब्रह्मा के द्वारा आंखों के लिए उत्तम लिखित साहित्य का सृजन न किया गया होता तो इस संसार की यह शुभ गति संभव न होती। वृहस्पति ने उपर्युक्त परम्परा को इस प्रकार दोहराया है। किसी विशेष वस्तु का ज्ञान छह मास में विस्मृत हो जाता है। अतः सृष्टा ने अक्षरों की उत्पत्ति की। कालिदास के अनुसार जिस प्रकार नदी के मुहाने द्वारा समुद्र तक पहुंचा जा सकता है उसी प्रकार लेखनकला के समुचित अध्ययन से विशाल वांगमय को ग्रहण किया जा सकता है। जैनग्रंथों समवायांग और पण्णवणासूत्र तथा बौद्ध ग्रंथ ललितविस्तर से भी भारत में लेखन-परम्परा की प्राचीनता की पुष्टि होती है। उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि भारतीय कला-परम्परा से भी होती है। डा. बहादुरचंद छाबड़ा को प्राप्त (राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली में सुरक्षित) मिट्टी के एक फलक पर ब्राह्मी अक्ष लिखते हुए एक बालक अंकित है। ब्राह्मी लिपि का अभ्यास करते हुए विद्यार्थी का यह एक अत्यन्त रोचक उदाहरण है। बादामी की एक कलाकृति में एक हाथ में ताड़पत्र है।10 परवर्ती मूर्तियों में ताड़पत्र के स्थान पर कागज मिलता है, जिसमें लिखावट प्रदर्शित है ।” इन मूर्तियों में भी इसी कथा की ओर संकेत है। मथुरा की जैनकला में सरस्वती की एक अभिलिखित मूर्ति मिली है। उसके हाथ में पुस्तक है। मूर्ति की चरण चौकी पर उत्कीर्ण ब्राह्मी लेख ई. दूसरी शती का है। जैन अनुश्रुति में इस बात के पुष्ट प्रमाण हैं कि सरस्वती देवी की मूर्त प्रतिष्ठापना के बाद जैनशास्त्र लेखन कार्य प्रारम्भ हुआ। यह कार्य धीरे-धीरे बहुत विकसित हुआ।


विदेशी विवरण भारत में लेखन कला की प्राचीन परम्परा से चीनी और पाश्चात्य विद्वान भलीभांति परिचित थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत में लेखन की प्राचीनता का उल्लेख करता है। चीनी विश्वकोश फवांगशुलिन13 में कहा गया है कि भारतीय लिपि बायें से दायें लिखी जाती है और इस लिपि का आविष्कार व्रहमा ने किया था। अलबेस्नी14 एक दूसरी कहानी कहता है। उसके अनुसार हिन्दू लिखना भूल गये थे। दैवी प्रेरणा से पराशर के पुत्र व्यास ने पुनः लेखन की खोज की। उसके अनुसार भारतीय लिपियों का इतिहास कलियुग के प्रारंभ (ई.पू. 3101) से प्रारम्भ होता है।

यूनानी इतिहासकार

सिकन्दर के भारत-अभियान में उसके सेनापतियों में से एक निआर्कस था। वह सिकन्दर के साथ पंजाब में रहा और वापसी में भी उसने सिन्ध के मुहाने तक सेनाओं का नेतृत्व किया। वह लिखता है : “यहां के लोग कपास ( या रुई के चिथडों) को कूट-कूट कर लिखने के लिए कागज बनाते हैं।15 मौर्य राजदरबार का यूनानी राजदूत मेगस्थनीज अपनी इण्डिका में उल्लेख करता है कि यहां पर दस-दस स्टेडिया के अन्तर पर पाषाण लगे हैं, जिनसे विश्रामगृहों तथा दूरी का पता चलता है। यहां नये वर्ष के दिन भावीफल ( पंचांग ) सुनाया जाता है, जन्मपत्र बनाने के लिए जन्मसमय लिखा जाता है और न्याय “स्मृति” के अनुसार होता है। एक अन्य यूनानी लेखक कर्टियस भी किसी वृक्ष की छाल के भीतरी नरम हिस्से पर पत्र लिखने का उल्लेख करता है। निआर्कस और कर्टियस के विवरणों से विदित होता है कि ई.पू. 327-25 में लिखने के लिये दो प्रकार की अलग-अलग स्थानीय सामग्रियां काम में आती थीं। इससे निष्कर्ष निकलता है कि उस समय के लोगों को लेखन कला ज्ञात थी।

बौद्ध साहित्य

बौद्ध धर्मग्रन्थ सुत्तंत7 में बौद्ध भिक्षुओं के लिए जिन-जिन बातों का निषेध किया गया है उनमें “अक्खरिका” (अक्षरिका) नामक खेल भी सम्मिलित है। इस खेल में खेलने वालों को अपनी पीठ पर या आकाश में ( अंगुलि से) लिखा हुआ अक्षर बूझना पड़ता था। विनयपिटक में लेखन कला की प्रशंसा की गयी है और बौद्ध भिक्षुओं के लिए सांसारिक कलाओं के सीखने का निषेध होने पर भी “लिखना” सीखने की आज्ञा प्रदान की गयी है। गृहस्थों और उनके बालकों के लिए लेखन कला सुख से जीवन निर्वाह करने का साधन मानी गयी है। जातकों में निजी और राजकीय पत्रों की चर्चा है, जिनमें राजघोषणाओं का भी उल्लेख है। जातक-कथाओं से यह भी विदित होता है कि पारिवारिक मामलों वाले और राजनीति के सूत्र स्वर्णपत्रों पर उत्कीर्ण किये जाते थे। दो बार इण्णण23 और दो बार पोत्थक शब्दों ऐतिहासिक भारतीय अभिलेख का उल्लेख है।

महावग्ग और जातकों से पांचवीं शती ई.पू. में लेखनकला के अस्तित्व पर प्रकाश पड़ता है। उनसे ऐसी पाठशालाओं का भी ज्ञान होता है जहां यह कला सिखायी जाती थी। महावग्ग में शाला पाठ्यक्रम क्रमशः दिया है : लेखा, गणना और रूप। हाथीगुम्फा। अभिलेख के अनुसार कलिंग-नरेश खारवेल ने अपने यौवराज्य के समय यही तीन विषय सीखे थे। जातकों में लेखन-सामग्री के लिए फलक (लकड़ी की पट्टी) और वर्णक (चन्दन की लेखनी) का वर्णन है। ललितविस्तर में बुद्र का लिपिशाला में जाकर गुरु विश्वामित्र से चन्दन की पाटी पर सोने के वर्णक से लिखना सीखने का वर्णन है। गांधार कला में प्राप्त सिलेटी पत्थर में एक फलक पर एक रोचक दृश्य उत्कीर्ण है। इसमें बालक सिद्धार्थ अपने साथियों साथ अध्ययनार्थ पाठशाला को जाते हुए प्रदर्शित हैं।

उपर्युक्त बौद्र साहित्य के साक्ष्यों से प्रमाणित होता है कि ई.पू. छठी शती के आस-पास भारत में लेखन कला व्यापक रूप से ज्ञात थी। ब्यूलर का कथन है लेखन के सम्बन्ध में छिदति, लिखति, लेख, लेखक, अक्षर – जैसे पुराने शब्दों का प्रयोग हुआ हैं। लिखने की सामग्री काष्ठ, बांस, पण्ण (पत्ते) और सुवरणपट्ट (स्वर्णपत्र) के उल्लेख हैं। इससे इन उद्धरणों की प्राचीनता सिद्ध होती है, जिनमे कड़ी वस्तु पर अक्षर खोदे जाने का कथन है।”

“छिंदति” शब्द के आधार पर ब्यूलर ने उपर्युक्त मत व्यक्त किया है। तालपत्र और भोजपत्र पर अवश्य अक्षर उत्कीर्ण किये जाते रहे होंगे, किन्तु कागज पर स्याही से ही लिखा जाता रहा होगा। निआर्कस और कर्टियस के वक्तव्यों सेनऐसा प्रतीत होता है।

वैदिक-पौराणिक साहित्य

वैदिक साहित्य से लेखन-कला के अस्तित्व का पता चलता है। परवर्ती सूत्र ग्रंथ, महाकाव्य, काव्य, नाटक, स्मृति, राजनीति, नीतिशास्त्र, और कथा-साहित्य तथा तकनीकी ग्रथों से प्राचीन भारत में लेखन-कला पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। रामायण और महाभारत का लेखन कार्य ई.प. चौथी – तीसरी शती में आरम्भ हो चुका था। इन महाकाव्यों में लिख, लेख, लेखक और लेखन
शब्दों का उल्लेख हुआ है। ब्यूलर का मत है कि “इन महाकाव्यों की साक्षी में हमें पर्याप्त सावधानी बरतनी पड़ेगी। किन्तु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि इनमें लेखन सम्बन्धी जो उल्लेख है वे काफी प्राचीन है।” आदिपर्व में ग्रंथ के रचयिता व्यास ने स्वयं गणेश को महाभारत का लेखक बताया है।

भारत में लेखन-कला का उद्भव कौटिल्य के अर्थशास्त्र का मूलभाग ई.पू. चौथी शती का है और अशोक के अभिलेखों के पूर्व लिखा गया। इसमें अनेक स्थानों से
पर लेखन के सन्दर्भ मिलते हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार है :


(1) “मुण्डन संस्कार के बाद वर्णमाला और अंकमाला का व अभ्यास करें।”
(2) “पांचवें, राजा पत्रों द्वारा मन्त्रिपरिषद की राय लें।”
(3) “विशिष्ट संकेत लिपि द्वारा उस सूचना को राजा तक पहुँचायें।”
(4) “राजकीय शासन को लिखने वाले लेखक को अमात्य की योग्यताओं वाला, आचार-विचार का ज्ञाता, शीघ्र ही सुन्दर वाक्य-योजना में निपुण, सुलेखक और विभिन्न लिपियों को पढ़ने-लिखने वाला होना चाहिए।

सूत्र-साहित्य का समय,जिसमें गृह्य और धर्मसूत्र सम्मिलित हैं, छठी शती ई.पू. से लेकर द्वितीय शती ई.पू. के मध्य निश्चित किया गया है। उसमें भी लेखन के अनेक प्रमाण उपलब्ध है। वसिष्ठधर्मसूत्र में इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वैदिक काल में लेखन कला का पर्याप्त प्रचार था। वसिष्ठ ने दस्तावेज को कानूनी प्रमाण माना है।

मनुस्मृति में जबर्दस्ती लिखवाये गये लेख को अप्रामाणिक कहा गया है। वेदांगों को आद्य सूत्रयुग के अन्तर्गत माना जाता है। वेदांगों में व्याकरण, ध्वनिशास्त्र तथा कोश की दृष्टि से जो भी अनुसन्धान हुए हैं, उनके आधार पर अनेक विद्वानों ने लेखन कला की प्राचीनता की मीमांसा की है। साहित्य और व्याकरण का अन्योन्याश्रित संबंध है। यह संभव नहीं कि बिना लेखन कला की जानकारी के व्याकरण और साहित्य की व्यापक रचना की जा सके।

पाणिनि के प्रख्यात अष्टाध्यायी ग्रंथ में लेखन कला से सम्बन्धित निम्नांकित शब्द मिलते हैं :

(अ) लिपि और लिबि37 (लिखना)
(आ) लिपिकर38(लिखनेवाला)
(इ) यवनानी39 ( यवनों की लिपि)
(ई) ग्रन्थ (पुस्तक)
(ए) स्वरित (लेखन में प्रयुक्त एक चिन्ह )

पाणिनि ने चतुष्पदों के कानों पर सुव, स्वस्तिक, पांच तथा आठ के अंकों के बनाये जाने का उल्लेख किया है। उन्होंने महाभारत ग्रंथ के अतिरिक्त आपिशालि, स्फोटयन, गार्ग्य, शाकल्य, शाकटायन, गालव, भारद्वाज, काश्यप, चाक्रवर्मा औरनसेनक नामक वैयाकरणों के नाम देकर उनके मत भी प्रकट किये है।

उपर्युक्त विवरण से ज्ञात होता है कि पाणिनि से लोगों को लिपि और लेखन का ज्ञान था। निरुक्त के रचयिता वैयाकरण यारक ने निम्नांकित वैयाकरणों के नाम दिये हैं और उनके मतों का उल्लेख किया है। औदुंबरायण, क्रौप्टुकी, शतबलाक्ष मौद्गल्य, शाकपूणि, शाकटायन, स्थौलाप्ठीवी, आग्रायण, औपमन्यव, और्णनाभ, कात्थक्य, कौत्स, गार्ग्य, गालव, चर्मशिरस, तैटीकि, वार्ष्यायणि और शाकल्य। इससे अनुमान होता है कि पाणिनि और यास्क के पूर्व व्याकरण और निरुक्त के अनेक ग्रन्थ उपलब्ध थे जो अब अप्राप्त है। यह संभव नहीं कि पाणिनि या यास्क ने उपर्युक्त आचार्यों के एक विषय के ग्रंथ कण्ठस्थ कर लिये हों और फिर अपने व्याकरण ग्रंथ बनाये हों। अतः लेखनकला की तिथि उनके पहले निर्धारित की जा सकती है।

छांदोग्य उपनिषद् में “अक्षर” शब्द मिलता है तथा “इ””उ” और “ए” स्वर, ईकार, ऊकार और एकार शब्दों से सूचित किये गये हैं। तैत्तिरीय उपनिषद में वर्ण और मात्रा का उल्लेख मिलता है। ऐतरेय आरण्यक में उष्मन्, स्पर्श, स्वर और अन्तस्थ का, व्यंजन और घोष का, मूर्धन्य और दन्त्य के मध्य भेद का वर्णन मिलता है। उसमें “संधि” का विवेचन भी किया गया है।

ऐतरेय ब्राहमण में “ॐ” अक्षर को अकार, उकार, और मकार वर्णों के संयोग से बना हुआ बताया गया है। उपर्युक्त तथ्यों से प्रमाणित होता है कि उपनिषदों, आरण्यकों और ब्राह्मणों के समय तक व्याकरण अस्तित्व में आ चुका था। वेद ब्राह्मण साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ हैं, जिनसे लेखनकला के अस्तित्व का बोध होता है। ऋग्वेद में गायत्री, उप्णिह्, अनुष्टुभ, बृहती, विराज, त्रिष्टुभ और जगती छन्दों के नाम मिलते हैं। इनके अतिरिक्त वाजसनेयी संहिता में पंक्ति, द्विपदा, त्रिपदा. चतुष्पदा, पट्पदा, ककुभ आदि छन्दों के भेद भी लिखे है। अथर्ववेद में छन्दों की संख्या ग्यारह बतायी गयी है। लिखना न जानने वाली जातिया गीत और भजन गाती हैं, पर उन्हें उनके छन्दों का नाम ज्ञात नहीं होता। वेदों और ब्राहमणों में मिलने वाले छन्दों के नाम लेखन कला की उन्नत दशा की सूचना देते हैं। वैदिक साहित्य से न केवल लेखन कला के प्रचलन पर प्रकाश पड़ता है अपितु तत्कालीन प्रचलित गणित का अस्तित्व भी प्रकट होता है। यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता में “गणक” शब्द का उल्लेख है, जिसका अर्थ गणित करनेवाला या ज्योतिषी होता है। उक्त संहिता में दश (10), शत (100), सहस्त्र (1,000), अयुत (10,000), नियुत (1,00,000), प्रयुत (10,00,000) अर्बुद (100,00,000), न्यूर्बुद (10,00,00,000), समुद्र (1,00,00,00,000), मध्य (10,00,00,00,000), अन्त (1,00,00,00,00,000) और परार्द्ध (10,00,00,00,00,000) तक की संख्या दी गयी है। ठीक यही संख्या तैत्तिरीय संहिता52 में भी उपलब्ध होती है। शतपथ ब्राह्मण में रात और दिन के सूक्ष्म विभाजन का उल्लेख है। ग्रंथ में कहा गया है कि रातदिन के 30 मुहूर्त, एक मुहूर्त के 15 क्षिप, एक क्षिप्र के 15 एतर्हि, एक एतर्हि के 15 इदानीं और एक डदानी के 15 प्राण होते हैं अर्थात् रातदिन के कुल ( 30 x 15 x 15x15x150 1518750 प्राण होते हैं।

उपर्युक्त साहित्यिक प्रमाणों के बावजूद अति प्राचीन लिखित ग्रंथ उपलब्ध नहीं हैं। इसका मुख्य कारण हमारी शैक्षणिक पद्धति थी। वेदों के शुद्ध उच्चारण के लिए उन्हें स्वर सहित कण्ठस्थ किया जाता था। गुरु के द्वारा मंत्र का एक-एक अंश शिष्यों को सुनाया जाता था। वे उसे ज्यों का त्यों रटकर कण्ठस्थ कर लेते थे। वेदों के पठन की यही मौखिक शैली अनेक शतियों तक प्रचलित रही और उनके पठन में लिखित पुस्तक की अनावश्यकता ऐतिहासिक भारतीय अभिलख प्राचीन रीति हो गयी। इसकी देखा-देखी अन्य शास्त्र भी रटे जाने लगे। बोथलिंग का मत है कि साहित्य के प्रचार में नहीं, अपितु नये ग्रंथों की रचना में लेखन का उपयोग होता था। ग्रंथकार अपने ग्रन्थ की रचना लिखकर करता था। परन्तु लिखने के बाद उसे वह या तो स्वयं कण्ठस्थ कर लेता था या दूसरों को कण्ठस्थ करा देता था। कदाचित् प्राचीन समय में एक बार लिखे ग्रन्थ की प्रति नहीं उतारी जाती थी। मूल लिखित प्रति ग्रन्थकार के वंश में उसकी पवित्र स्मृति के रूप में प्रायः गोपनीय ढंग से रखी जाती थी। यह भी संभव है कि ग्रन्थकार अपने ग्रन्थ को कण्ठस्थ कर उसकी प्रति स्वयं नष्ट कर देता था जिससे दूसरे उसका अनुकरणन कर सकें और स्वयं को ब्राह्मण जाति के विरुद्ध काम करने का दोपी न बनना पड़े।

राथ का मत है कि लिखने का प्रचार भारतवर्ष में प्राचीन समय से ही होना चाहिए, क्योंकि यदि वेद लिखित रूप में विद्यमान न होते तो कोई भी प्रतिशाख्यों की रचना करने में समर्थन होता। ब्यूलर का कथन है कि इस अनुमान के निराकरण का कोई कारण नहीं कि वैदिक काल में भी मौखिक शिक्षा में अन्य अवसरों पर हस्तलिखित पोथियों से सहायता ली जाती थी। इस अनुमान की पुष्टि में यह अकाट्य तथ्य प्रस्तुत किया जा सकता है कि ब्राह्मी वर्णमाला की रचना ध्वनिशास्त्रियों या वैयाकरणों ने वैज्ञानिक कार्यों के लिए की थी।

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