मानवी की आभा का रहस्यमय  विज्ञान : किर्लिआन  फोटोग्राफी

मानवी की आभा का रहस्यमय विज्ञान : किर्लिआन फोटोग्राफी

मानवी की आभा का रहस्यमय विज्ञान : किर्लिआन फोटोग्राफी

किर्लियन फोटोग्राफी का नाम पहली बार सुन रहे हो तो उसका स्पष्टीकरण देने से पहले थोड़ी चेतावनी देना आवश्यक है। विषय भौतिक है और भौतिक सीमा पर भी है, इसलिए इसे किसी ख़ास श्रेणि में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता । प्रभामंडल को चमकाने वाली किलियन फोटोग्राफी के आसपास रहस्य का चक्र बना हुआ है। आज के विज्ञान के पास इसके कुछ रहस्य का खुलासे हैं, कुछ के नहीं। दूसरी ओर ऐसी फोटोग्राफी को कुछ विचारको ने इसके पारलौकिक के रूप में सराहना ने में अतिरंजना कर दी है जबकि उनके कुछ विचार वास्तव में विचारप्रेरक है। उनके दोनों विचार को जानते है और इस दिलचस्प फोटोग्राफी का फ्लैशबैक समझ ने की कोशिश करते है।

ब्रिटेन के डॉ वाल्टर जे नाम के डॉक्टर ने मानव शरीर की आभा / aura के बारे में द ह्यूमन एटमॉस्फियर नामक पुस्तक लिखी। आमतौर पर देवताओं की छवि में उनके सिर के आसपास प्रभामंडल दिखाया जाता है, लेकिन डॉ वाल्टर क्लिनर ने ये आभा हर इंसान के पूरे शरीर होने का दावा किया। चिकित्सा वैज्ञानिक के अनुसार ये आभा तीन परतों में होती हैं । जो शरीर के चारों ओर 1.5 फीट तक फैला हुआ होता हैं । आम तौर पर हम इसे देख नहीं सकते , इसलिए इसे देखने के लिए खास काले चश्मा भी डॉ क्लीनर पुस्तक खरीदने वालो को मुफ्त में देते थे। इस काले चश्मे में आंख के लिए एक सैंडविच की तरह एडजस्टेबल टू-हेड ग्लास इस्तेमाल किये गए थे । जिनके बीच डाईसाइनीन (भूरा वर्णक) का घोल था । आध्यात्मिक दृष्टि वाला व्यक्ति डॉ क्लिनर के अनुसार आभा को देख सकते हैं, लेकिन औसत व्यक्ति काले चश्मे पहनकर उसे देख सकता था । लोगों ने उस आभा को देखा लेकिन भौतिकविदों के अनुसार, यह केवल एक भ्रम था।

अगले साल आभा से जिंदा ख़्याल सन 1912 में एयर ज़्यादा चर्चा में आया । स्वामी पंचदशी नाम धारण करने वाले अमेरिकन प्रचारक विलियम एटकिंसन ने उस वर्ष The Human Aura शीर्षक से एक किताब लिखी। यह हिंदू धर्मी अमेरिकन स्वामी के अनुसार सभी के चारों ओर सात रंग या VIBGYOR रेखाएं होती हैं जो व्यक्ति के स्वभाव और शारीरिक और मानसिक स्थिति के अनुसार बदलाव ला देती हैं । स्वामी पंचदशी नई बात नहीं की, क्योंकि हमारे पौराणीक ग्रंथकारों ने उस प्राणशक्ति को दो फुट तक फैली आभा कहा था । और उसके लिए शरीर के सात चक्रों को कारणभूत बताया था ।

हर रंग की आभा चक के गुणों के अनुसार होती है जिसका विस्तृत वर्णन पुराण कारो ने किया हैं । सालों से चली आ रही मान्यता के अनुसार ऐसा तेजा: पुंज / आभा द्रश्यमान न होने के बावजूद अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति इसकी निकटता में कंपन हम कंपन महसूस कर सकते हैं।

चक्रों के विषय में भारतीय शास्त्रों में साथ ही पराभौतिक विचारधारा का गहराई अध्ययन करने वाला पहला यूरोपीय विद्वाननस्विट्जरलैंड के डॉ कार्ल जवान था। शरीर का मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, अजना (अजना) और सहस्रदल ऐसे सात चक्र को उसने जैविक ऊर्जा के स्रोत माना है। आभा को भी उसी जैविक शक्ति से बनती है ऐसा उसने कहा । सन 1932 में कार्ल यांग ने ज़्यूरिक शहर की साइक्लोजिकल क्लब के मेंम्बरो को संबोधन करते वक्त कहा कि बहुत समय के बाद प्रतिष्ठित भारतीय दार्शनिक जीन्दू कृष्णमूर्ति ने पश्चिमी दुनिया को चक्रों केआध्यात्मिक पहलू की संकल्पना का ख्याल दिया। जिसमें शरीर की इर्दगिर्द फैली बायोएनर्जी के रूप में आभा का वर्णन भी भी शामिल है । स्वामी विवेकानंद के बाद भारतीय आध्यात्म के विभिन्न पहलू अधिकतम प्रचार जिदू कृष्णमूर्ति ने किया।

भारतीय अध्यात्म का ज्ञान दे रहे जिदु कृष्णमूर्ति

मनुष्य की प्राकृतिक आभा की अधिक प्रसिद्धि सिम्योन किर्लिआन नाम के रूसी के भाग्य लिखी हुई थी । रूस के कम्युनिस्ट सरकार के तहत गोपनीयता नीति के कारण उनका नाम और काम सालों तक अज्ञातवास में रहे । सालो बाद सन 1970 में लिन श्रोएडर और शीला ऑस्ट्रैंडर नाम के अमेरिकीयो ने Psychic Discoveries Behind The iron Curtain नाम की किताब लिखी तब ‘ किर्लिआन फोटोग्राफी ” शब्द सबसे पहले यूरोप-अमेरिका के लोगों के कानों पर पड़ा। पुस्तक बेस्ट-सेलर बना क्योंकि साम्यवाद के लोहे के पर्दे के पीछे चल रहे अलौकिके संशोधनो का उसमें हैरतअंगेज खुलासा था ।

किर्लीआन फोटोग्राफी का आविष्कार बहुत दुर्घटनावश हुआ और जब दो अमेरिकियों ने किताब लिखी तब उसके कई साल बीत चुके थे। ऐसा 19 वीं सदी के रूस में हुआ था । हुआ यूं कि सन 1939 में रशिया के काला सागर के पास क्रास्नोडार क्राइ नाम शहर की रिसर्च इंस्टीट्यूट का एक विद्युतमशीन बिगड़ गया । उसकी मरम्मत करने के लिए शहर में सबसे अच्छे इलेक्ट्रीशियन सिम्योन किर्लिआन को बुलाया गया । यह मशीन मुख्य रूप से लकवा के रोगियों को इलेक्ट्रो थेरेपी देने के लिए विकसित किया गया था। मशीन की शक्ति के माध्यम से रोगी के शरीर में विद्युत प्रवाह दाख़िल किया जाता था, जिससे उनकी आंशिक रूप से झूठा हो चुका चेतातंत्र फिर से थोड़ा सचेत हो जाए । मशीन ही फेल हो गया तो सिम्योन किर्लिआन ने पहले उसे ठीक किया । फिर उससे मरीजों के निस्चेत हाथ मे चेतना जगती हैं या नही ये जानने के लिए उसे जांचा ।

विद्युत प्रवाह शरू हुआ उसी क्षण किर्लिआन ने मशीन के इलेक्ट्रोड और रोगी के पैर के अंगूठे के बीच हल्की-सी झिलमिलाहट देखी । वह समझ नहीं सका कि पलक वास्तव में हुई है या फिर यह सिर्फ एक भ्रम था। मान लो कि यदि यह एक भ्रम है, तो यह दूसरी बार बिजली चालू होने पर यह फिर से हुआ।

किर्लिन सोच रहा था कि वास्तव में क्या हुआ ? ये जानना है तो इसकक तस्वीर खींचनी चाहिए । अगर ये हुआ है तो उसकी तस्वीर आएगी और अगर नहीं तो तस्वीर खाली रहेगी ।

इलेक्ट्रोमेडिसिन के लिए संस्थान ने इलेक्ट्रोड कांच के बने थे । जो विद्युत के वाहक भी थे और नही भी । परिणाम एक छोर से दाखिल हुआ विद्युत प्रवाह कुछ समय बाद दूसरे छोर पर दिखता था । इस कम समय के दौरान भी इलेक्ट्रोरोड और अंगूठे के बीच रखी हुई फोटो प्लेट को एक्सपोज कर देता था । इसलिए किर्लिआन को अपना खुद का प्रयोग करने के लिए धातु दंड लेना पड़ा ।

वैसे विद्युत्प्रावह लो एम्पियर का फिर भी हाई-वोल्टेज का था। दूसरी ओर धातु बिजली की छड़ बेहद प्रवाहकीय थी, अर्थात प्रवाह पर स्विच करने के बाद उंगली निश्चित रूप से यह एक बड़े झटके की तरह लगता है । अब किसी साहसिक स्वयंसेवक की खोज करने के बदले सिम्योन ने खुद प्रयोगशाला मेंढक होने का फैसला किया। हथेली के नीचे उन्होंने फिल्म लगाई और नीचे इलेक्ट्रोड रखा । जैसे ही विद्युत प्रवाह शरू किया की उसकी चीख निकल गई। हथेली भी जल गई थी। एक बार नहीं, कई बार ऐसा हुआ- क्योंकि ऐसा हुआ क्यों ये सुनिश्चित करने के लिए प्रयोगों को दोहराना जरूरी था। बेशक सिम्योन ने हर बार ग्रहण समान परिणाम देखने को मिला। फिल्म पर हथेली प्राकृतिक रूप में आने के बदले केवल आसपास का प्रभामंडल भी उसमें अंकित हुआ था । जिसे अंग्रेजी में halo कहा जाता है ।

सिम्योन कार्लिआन और उनकी पत्नी वेलेंती

सिम्योन ने ऐसे ही प्रयोग निर्जीव वस्तु पर करने के लिए फोटोग्राफिक फिल्म पर एक सिक्का रखो। नीचे एक कांच की प्लेट थी और उसके नीचे प्रवाहकीय पदार्थ की एक पट्टिका थी, जिसका अर्थिंग किया गया था। सिक्के को भारी वोल्टेज का प्रवाह दिया गया और यूरेका ! उसके चारों ओर प्रभामंडल की छाप फिल्म पर आई । कोई दूसरे प्रकार सिक्के ने अपने वल्य बिछा देता है। देवी-देवताओं की काल्पनिक छवियों में में इस तरह के वलय बनाये जाते है ।

अब ये किर्लिआन की आँखों के सामने कोई कल्पना नहीं थी। फोटोग्राफिक प्रिंट था, जो वास्तविक था। प्रकाश किरणो की टशरों में दिखाइ दे रही थी। विज्ञान के हित में किर्लिआन ने अधिक प्रयोग किये। खुद पर भी और उसने अपना हाथ जला लिया। कुछ समय बाद उनकी पत्नी उनके लिए स्वयंसेवक बनी । किर्लिआन ने प्रयोग के रिकॉर्ड के लोए डायरी में लिखा, “हम प्रत्येक तस्वीर खुशी आउर दर्द के साथ फोटो देखे। क्या यह खोज क्रांतिकारी है? या यह एक खोज से ज्यादा कुछ नहीं था? क्रांतिकारी या नहीं ? ” जो भी किर्लिआन ने एक खोज जरूर की थी ? कुछ ही समय बाद उस खोज के 12 पेटेंट अधिकार भी पंजीकृत करवाये । नवीनता की खोज उन्होंने फोटोग्राफी में की प्रोसेस से जुड़े अधिकार उनके थे तो इसलिए समय के साथ ये किर्लिआन फोटोग्राफी के नाम से ही पहचानी गई हैं। कोई कमर्शियल अगर इसे इस्तेमाल में लाया जा सकता तो किर्लिआन को कुछ आर्थिक लाभ संभव था । जो उसे कभी कोई मुआवजा नहीं मिला। किर्लिआन नियति में आर्थिक लाभ था ही नही। केवल नाम लिखा था। वर्षों बाद दुनिया में वह बहुत प्रसिद्ध हुआ । उसका कौतुक आज भी थमा नही । आज तो काफी कम पीड़ा देने वाली किर्लीआन फोटोग्राफी के कुछ सबसे अजीब पहलू वैज्ञानिक रूप से अभी भी पूर्ण तरह से समजे जा सके नहीं । एक सवाल पूछें कि क्या आप किर्लिआन तस्वीरों के सामने देखने वाले व्यक्ति वास्तव में क्या देखता है?

यह प्रश्न कई अन्य प्रश्न उठाता है। फोटो में चारों ओर आभा दिखाई देती है । सच है, लेकिन वह आभा किस चीज से बनी है? क्या वे अदृश्य ऊर्जा की किरणें हैं? बड़ी समस्या यह है कि शक्ति अदृश्य नहीं। शक्ति वहां अपरिचित है । परिचित ऊर्जा बिजली है। द्वितीय शक्ति चुंबकत्व है, जो स्वयं बिजली से पैदा होता हैं। किर्लिन फोटोग्राफी के कंटेनर में एक क्षणिक बिजली की आपूर्ति डालकर किया जाता है । ऐसा माना जाता है की वही फिल्म में आभा के रूप में होता है । बिजली ही चमकती है; या बिजली उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की रेखाएं है। लेकिन वह धारणा सच नहीं है।

बिजली या विद्युत चुम्बकीय के कारण आभा फैल जाती है तो यह सभी के लिए समान हैं । जब वास्तव में समान नही होता है। व्यक्ति की तरह जितना प्रभामंडल बदलता है, इतना ही नही उसी व्यक्ति के मूड के अनुसार भी प्रभामंडल बदल रहा है। आंदोलन, भय, दुःख, प्रेम और क्रोध के अनुसार तस्वीर बदलती रहती है । अगर तस्वीर रंगीन है तो इसमें भी समान रंग नही होते । संक्षेप में, आभा को बिजली से ज्यादा व्यक्ति के साथ लेनादेना है; व्यक्ति में (और अभी भी सही है) रही अस्पष्टीकृत शक्ति के साथ लेना देना है । ऊर्जा के सभी प्रकार के जरा रहस्यमय है।

दो-तीन उदाहरण देखते हैं । दो लोग आपस में प्यार करने वाले जब हाथ मिलाते हुए फोटो में देखे तो उनकी आभा भी पारस्परिक फैली हुई एकदूसरे में समाई हुई दिखती है । आभा भी बढ़ता है। एक दूसरे से नफरत करने वालो में ये सारी बात विपरीत हो जाती है। किर्लिआन फोटोग्राफी में आभा के बीच अपाकर्षण बताती हैं। आभा भी एकदूसरे से विपरीत दिशा में बिखरती दिखती हैं । वह एक अल्पविराम वाली रेखाओं को भी जानता है , ऐसा लगता है जैसे कोई दरार है। ये बदलाव जिन्होंने अनगिनत प्रयोग में देखे वह अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ थलमा मूसा ने यह भी देखा कि कुछ समय पर तो दो शेड भी अलग दिखता हैं । किसी अकथनीय कारण के प्यार से अधिक घृणा में अधिक रंगों और रंगों की छाया रॉनक के साथ खिलते है। किर्लिआन फोटोग्राफी का एक और गूढ़ पहलू ‘ डोमिन्सन फेक्टर ‘ का है, जिसमें से एक प्रभावी व्यक्ति का आभा मंडल दूसरे कमजोर व्यक्ति के प्रभामंडल को खिलने ही नहीं देता है। जैसे एक ही फिल्म पर माता-पिता और उनके बच्चे पंजे देते है तब माता-पिता फोटो आती है। किसी बच्चे ने फिल्म पर सिक्के पर पंजा रखा हो और साथ ही उतने ही प्रेशर से तब भी प्रिंट में बच्चे का पंजा आता ही नही । उसी तरह उंगली को बिना छुये दो लोग एक दूसरे की हथेलियों को पास रखकर सिर्फ उनकी नज़रे मिली हुई हो तब भी फ़िल्म में एक ही व्यक्ति की आभा जाती है – तार्किक रूप से अधिक प्रभावशाली व्यक्ति की !

सिम्योंन के बाद किर्लिआन फोटोग्राफी का सबसे ज्यादा अभ्यास करने वाली डोक्टर थेल्मा मोस

भले ही सौ प्रतिशत सत्य न हो फिर बी एक बात तो सही है : किर्लिआन फोटो पर छाने वाली सूर्य जैसे भड़के के रंगों का मानव शरीर से संबंध है। उसके लिए केवल बिजली का करंट ही जिम्मेदार नहीं, क्योंकि अगर ऐसा होता तो हर बार बहु ​​रंग ड्राइंग सभी के लिए समान हो जाता है। लेकिन ऐसा नहीं होता है, तो भी यह अजीब है केवल एक वैज्ञानिक कारण खोजने के लिए बैठते है तो विचार आता है कि मानव शरीर की सीमा उसकी उंगली की नोक के पास, उसके पैर उसके सिर के पास शायद खत्म नहीं होती है। यह सीमा केवल दृश्य निकाय की है। हड्डियाँ मांस की हैं। यहां से उनका शरीर अदृश्य रूप से आगे था । जो केवल बायोएनेर्जी है। वैसे तो मांस में भी, वह ऊर्जा बनी हुई है जो चारो ओर फैली हुई है । बायोएनेर्जी भौतिक सीमा से अधिक है । शरीर के भीतर और बाहर है । यह चारों ओर कुछ सेंटीमीटर तक फैली हुई होती है । बेशक केवल किर्लिआन की फोटो में !

यहाँ केवल ‘बायोएनेर्जी’ शब्द उपयोग के लिए उपयोग किया जाता है। वास्तव में सेंटीमीटर में कुछ फैलता तो है लेकिन क्या वह हम नहीं जानते। जो भी फैलता है उसमें शारीरिक चेतना का योगदान महान है। जो व्यक्ति की परिस्थितियों के अनुसार और उस समय व्यक्ति की मनोदशा के अनुसार उसकी अपनी आभा इस तरह के बदलाव के लिए, ड्राइंग में बदलाव होता है । इसके पीछे का कारण खोजना मुश्किल है। किर्लिआन ने बिना कैमरे के निर्जीव चीजों का उदाहरण लें तो उनकी तस्वीरों में छाया नहीं बदलती । डिज़ाइन हमेशा एक ही आती है अर्थात् चेतना में परिवर्तन घटित न हो तो रंगों में कोई परिवर्तन नही होता । यह सरल तर्क है स्वीकार करने के बाद हालाँकि एक और सवाल उठता है । जीवों का गठन या प्रतिक्रिया लाल, नीले, के अनुसार नारंगी, बैंगनी रंगों में फिल्म पर यदि केवल बायोएनेर्जी यदि चिह्नित हो तो जैव निर्जीव ऊर्जा कहां है? शब्द ‘बायो’ ही उसी चेतना के लिए जैव जो जीवन को इंगित करता है । इसके बिना ऊर्जा संभव नहीं है।तो निर्जीव वस्तु फिर बायो नहीं, बल्कि कुछ अलग ऊर्जा पैदा करती है ?

रूसी विज्ञान अकादमी के कुछ शोधकर्ता इस बारे में बहुत कम जानते हैं ऐसा लगता है। यह उनका स्पष्ट है उत्तर: निर्जीव चीजो में भी इलेक्ट्रॉन परमाणु लगातार कंपन कर रहते है। जिसमे बिजली से चार्ज होने से चारो ओर की हवा को भी उस वक्त के लिए चार्जिंग कर देता हैं । हवा के अणु नेगेटिव आयन में बदल जाते हैं। इतना ही नही मामूली ध्रुवप्रकाश की तरह थोड़ी चमक फैल जाती है। फोटो में वही आभा की तरह दिखती है ।

वैसे किर्लियन फोटोग्राफी का रहस्य यदि ऐसा मामूली होता तो सन 1940 के दशक के बाद आज तक उसका शोरगुल न होता । वास्तव में रोमांच पारा विशेष नीचे नहीं आया है । निर्जीव वस्तु नहीं सजीवों ने इसे उच्च स्तर पर बनाए रखा है – क्योंकि जीवित चीजों की आभा ‘स्थिर’ नहीं। चेतन के साथ परस्पर संबंध है । उसका एक निश्चित कारण है। जीव के रूप में आदमी या पौधा भी चुनें ले तो हर किसी के मामले में परिवर्तन देखा जाता है।

ये सब क्यो हुआ ? चलिए और जानते हैं ; थोड़े समय बाद एक अप्रत्याशित घटना घटी। एक बार बगीचे में टहलते हुए सिम्योन ने समान पेड़ों की दो पत्तियाँ की फोटोग्राफी की। पत्तीयो की फोटो में दीवाली के टिमटिमाते दिए कि तरह दिखाई दी । प्रत्येक हरी पत्ती का फोटो सुंदर लग रहा था। पत्ता हमेशा रोशन दिखाइ दे रहैक था। लेकिन दूसरे पत्ते की तस्वीर ने उसे अचंभे में डाल दिया। यह उज्ज्वल था, लेकिन पीला था। गलत था कि उसमें से तेल गायब हो गया था। दोनों पत्तियों को नग्न आंखों से देखा तो दिन के उजाले में फिर से जाँच की, लेकिन दोनों एक समान हरे और तरोताजा लग रहे थे। कुछ भी समझ में नहीं आया । इसलिए उन्होंने रूसी विज्ञान अकादमी के वनस्पति विज्ञानियों की राय मांगी।


एक प्रिंट शाइनिंग और दूसरा प्रिंट धुंधली निकलने का कारण समजमें नही आया । प्रयोगशाला के निष्कर्षों से पता चला है कि दोनों पत्ते एक ही प्रजाति के थे, एक ही उम्र और एक ही तरह की जमीन पर बड़े हुए थे ।वनस्पतिविदों ने दो पौधों को आमने-सामने लाया गया और बात वहीं खत्म हो गई।

सच कहै तो इसकी शुरुआत हुई। बगीचे में उन बुझते दीपक पौधों में से कुछ दिन के बाद बुझ गया; यानी मर गया। विज्ञान अकादमी की वनस्पति विज्ञानी उस समाचार को जानकर वापस आये पौधे के शवों का पोस्टमॉर्टम किया और उसे देखा की वह जीवाणु से संक्रमित था । एक विशेषज्ञ ने अकादमी को अपनी रिपोर्ट में लिखा की पौधों का संक्रमित होना आम बात यह है, लेकिन बोटनिकल विधि सके संक्रमण से पहले उसका पता लगाया जा सकता है यह बात किर्लिन की तस्वीर में इसका एक आकलन मिल पाया ये मामला सामान्य नहीं है। इस तरह से यदि मानव रोगों का निदान हो सके तो रोग फैले और पैथोलॉजिकल एक्स-रे लेने के समय का इंतजार करने के प्रश्न ही नही रहता । ”

सजीव पदार्थ में बायोएनेर्जी होता है और प्रभामंडल को आभा के रूप में व्यक्त किया जाता है। एक और प्रयोग उस तर्क की पुष्टि करता है । प्रयोग के लिए ब्रोकोली नामक एक सब्जी थी। किर्लिआन विधि ताजा ब्रोकोली की तस्वीर ले जाने पर किनारे से शुरू होने वाली चमक: द्रव्यमान फिल्म पर लंबे समय तक फैली हुई थी । जबकि उसी सब्जियों को पानी में उबालने के बाद वह आभा सीमित थी । इसके अलावा सभी शेड्स एक ही आकार की नहीं थी । सिम्योंन ने अनुमान किया कि प्राकृतिक पकी हुई ब्रोकोली ने की कुछ बायोएनेर्जी खो दी थी ।

रूस में इस तरह के हुए प्रयोगो ने उसे अलग ही फोकस में रख दी । फोटोग्राफी करने के लिए रूस में विशेष प्रकार के उपकरण बन गए और अस्पतालों में उनका उपयोग करना शुरू कर दिया । यूरोप-अमेरिका में भी इस फोटोग्राफी का इस्तेमाल चिकित्सीय आधार पर किया जाने लगा। भारत में मद्रास की सरकार जनरल अस्पताल प्रमुख न्यूरोलॉजिस्ट डॉ, पी नरेंद्र की किर्लिन फोटोग्राफी के प्रति आकर्षित हुए और सन 1979 में किर्लिआन फोटोग्राफी का एक अलग खंड खोला।

परिणाम आश्चर्यजनक थे । कैंसर से लेकर लिवर के सिरोसिस तक की बीमारियों तक के रोग शरीर में उनकी शरुआत हो उससे पहले ही किर्लिन फोटोग्राफी उनके अस्तित्व को बताती है । उदाहरण के तौर पर एक बार डॉ नरेंद्र ने अस्पताल के ही एक डॉक्टर का फोटो लिया। इस बार प्रयोग का विषय बने डॉक्टर पुरानी किलियन तस्वीरें डॉ। नरेन्द्रन के पास थी। नई फोटो पुरानी फोटो से अलग है। आभा फीकी थी। लाल पीला और बैंगनी रंग के टशर्स भी कम थे। जो उसी समय पर एक डॉक्टर द्वारा एक पूर्ण चिकित्सा जांच किया गई । लेकिन उनके नाखून में रोग भी नहीं मिला। रोग, ज़ाहिर है था लेकिन पकड़ में नही आ रहा था । दस दिन बाद उस डॉक्टर की चिट्ठी आई । इस समाचार के साथ उनको पीलिया हो गया है ।

यह मामला कोई अपवाद नहीं है। कई अन्य मामले और दुनिया कोने में वे रिपोर्ट किए गए हैं। इस प्रकार फिर भी किर्लिआन फोटोग्राफी ने अनजान कोने में छिपाये हुआ रहस्य आज भी रहस्य ही है । सम्भव है कि ये हमेशा के लिए रहस्य ही रहेगा क्योंकि ज़्यादातर वैज्ञानिक उस कोने को भौतिक क्षेत्र नहीं मानते हैं। उसे आधिभौतिक कोना मानते है जो कि उनके लिए प्रतिबंधित क्षेत्र हैं ।

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