मानव शरीर के 07 कुदरती आई – कार्ड्स

मानव शरीर के 07 कुदरती आई – कार्ड्स

मानव शरीर के 07 कुदरती आई – कार्ड्स

शॉपिंग मॉल घूमते हो तब भीड़ भरे रेस्तरां में बैठे हो या अहमदाबाद जैसे रेलवे स्टेशन पर बेंच पर बैठे हो तब आसपास के इंसानों को जरा ध्यान से देखना । किसी भी दो इंसान के नाक नक्शा एक समान कभी देखने को नही मिलता । हरद्वार के कुंभ मेले में भी एक समान इंसान को खोजने की कोशिश करना बेकार है क्योंकि ईश्वर ने आज तक कॉपी-टू-कॉपी इंसान बनाये ही नही । धरती पर हर कोई कोई इंसान दुसरो की तुलना में अलग-अलग हैं। जुड़वां भाई या जुड़वां बहनें भी समान दिखते हुए भी समान होते नही । स्पष्ट रूप से वे राम और श्याम या सीता और गीता की तरह लगते है, लेकिन कई भेद उनमे होते है भले वह ध्यान में न आये । विश्व की कुल मिलाकर 7 अरब की बस्ती में हर इंसान का ढांचा अलग होता है । यह वैविध्य बहुत यूनिक है । किस तरह ?

तो हर इंसान ‘One and Only’ है ? सात बातों के जवाब में हम सात भेदो को बता सकते हैं । जिसके माध्यम से सभी मनुष्यों की अपनी विशिष्टता मिलती है । उंगलियों के निशान की भिन्नता सामान्य रूप से जाना जाता भेद है लेकिन लेकिन बाकी खास प्रचलित नहीं।
चलिए जानते है

01 डीएनए

सूची में पहले स्थान पर डीएनए को रखना उचित ही है , क्योंकि आखिरकार डीएनए ही है जो व्यक्ति का विद्रूप और मन कारण बल है। वही शरीर का आर्किटेक्चरल प्लान है। 2001 में शुरू हुए मानव जीनोम परियोजना में जाना गया कि मनुष्यों के डीएनए 999.9 % बिल्कुल समान है। अंतर केवल 0.1 % है। यह आंकड़ा आखिरी है । पिछले कुछ वर्षों में किए गए शोध के बाद यह अंक 0.5% तक बढ़ गया है । फिर भी गणना लायक नही है । बेशक, मानव जेनेटिक प्रिंट में डीएनए में आधार रूप एडीनिन, साइटोसाइन, गुआनिन और थायमिन चार मूल घटकों की 3.2 बिलियन जोड़िया हिती है। यह बेस को जेनेटिक लूप्रिंट की वर्णमाला कह सकते हैं। संख्या बड़ी है, इसलिए 0.5% × 1.5 करोड़ बहुत ज्यादा अक्षर अलग होते है। इस प्रकार, संख्या 4 पर घातांक के रूप में 1,60,00,000 के फिगर के मुताबिक भेज के अरबो खरबो कॉम्बिनेशन मुमकिन बनते है। किन्हीं दो व्यक्तियों की अगर डीएनए के बीच पूर्ण समानता बनने की संभावना शून्य से अधिक नहीं है।


बच्चों के डीएनए की पहचान शुरुआत में एक ही हो, लेकिन जन्म के बाद भी समय-समय पर डीएनए की नकल में कभी-कभी उस समय वर्णमाला में रहता था । विंस की ‘छाप’ रह गई ब्ल्यूप्रिन्ट की तुलना में थोड़ा अलग रूप देता है। और जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है दोनों डीएनए की अधिक प्रतियां जारी करते हैं । जो लोगों के बीच बंधन से लेकर बुद्धि तक अलगता की चौड़ी खाई बना देती है।

02 फ़िंगरप्रिंट

ब्रिटिश जातीयता-शास्त्री सर फ्रांसिस को वेल्ट 1880 के दशक में आदमी के अंगूठे का पतलई लाइनों की गिन कर नहीं, बल्कि गणित लड़ा कर साबित कर दिया कि दो इंसान की उंगलियों के निशान कभी एक जैसे नहीं होते। कुछ साल बाद, सर एडवर्ड हेनरी नामक एक अंग्रेज ने दुनिया का पहला फिंगरप्रिंट ब्यूरो कलकत्ता में स्थापित किया। इतना ही नही फिंगरप्रिंट के वर्गीकरण का फोरेंसिक मानक भी तैयार किया। इंटरपोल से लेकर पुलिस बल तक सब अरबों की संख्या में फिंगरप्रिंट का कम्प्यूटराइज्ड डेटॉ रखते है । लेकिन कभी भी दोनों प्रिंटों के बीच कभी भी डिट्टो टू डिट्टो साम्यता नही मिली ।

एक समय यह व्यापक रूप से माना जाता था की आइडेंटिकल ट्विन्स के अंगूठे की छापें समान होती है । हकीकत में मैच होता है । लेकिन सौ प्रतिशत नहीं। जैसे की जुड़वे बच्चों की रेखा किसी बिंदु पर दो में विभाजित होती है । उसी पंक्ति में दूसरे की विभाजित नही होती एक की लाइन घुमावदार होती है तो दूसरे की समान रेखा का घुमाव थोड़ा तेज होता है । हर मोड़ व घुमाव की साम्यता का विरल अपवाद आज तक मिला नही । वैसे कुदरत ने किस उद्देश्य से इंसान को ये यूनिक फिंगरप्रिंट दी है इसका सटीक कारण आज तक नही मिला । एक प्रमुख कारण यह बताया जाता है कि फिंगरप्रिंट देने का कारण चीजों पर पकड़ मजबूत करना है । इसके विरोध में की जाती दलील भी तर्क संगत है : अंगूठे की अंगुली का कुल क्षेत्रफल ‘खांचे’ के कारण कम होने केवजह से पकड़ होती नहीं है।

विकास के उपहार के रूप में प्राप्त हुई फिंगरप्रिंट का महत्वपूर्ण व्यावहारिक उपयोग लगता नही है। बिना प्रिंट के भी काम चल जाने का उदाहरण वर्ष 2012 के शरुआत में American Journal of Human Genetics पत्रिका ने नोट किया। वह भी पांच ऐसे परिवारों का परिचय दिया जिनके एक भी सभ्य को फिंगरप्रिंट नहीं । हालांकि उनके रोजमर्रा की जिंदगी में फर्क आया नहीं। केवल सुरक्षा जाँच के दौरान भयावह स्थिति हो सकती है ।

03 चाल

लगभग 15,00,000 लाख साल पहले धीरे-धीरे चार पैर पर चलने वाला इंसम मानव दो पैर पर चलने लगा । लेकिन उस के बाद से चलने का तरीका अटपटा ही रहा है। सब का चलने का क्रम समान रहा लेकिन स्टाइलिंग एक समान नही ! सन 1970 के दशक में किये गए सर्वेक्षण के दौरान पाया गया कि पीठ दिखाकर चलने वाले इंसानों को 90% मामलों में लोगो ने उनकी चाल से ही पहचान लिया था ।

बचपन में बच्चे की चाल साल दर साल बदलती रहती है । किशोरावस्था तक पहुंचने के बाद भी चलना कुछ कुछ शैलियाँ स्थायी ट्रेडमार्क बन जाती है । पैर की लंबाई, नितंब की चौड़ाई के साथ-साथ मांसपेशियों की मोटाई इन तीन चीजों से चलने की शैली निर्धारित होती है और यह काफी सहज होती है । मनुष्य इसे बदल नहीं सकता। कुछ शब्दों से इन्हें पहचान संभव नहीं, लेकिन आंखें
इसे पहचान लेती है । वैसे कम्प्यूटर ने भी इसे बढ़ते हुए अंग- संख्या में लाइन में वर्गीकृत अलग साबित दिया है। कुछ मामलों में आँकड़े तुच्छ हैं, लेकिन समान हैं नहीं।

04 आंख

आदमी की आँखों की बनावट विरासत में मिलती है । कई परिवार के सदस्यों की आँखें लगभग समान दिखती हैं । इसमे कोई अचरज भी नहीं। स्कैंडिनेवियाई देश के लोगों की आँखों मे नीला रंग में साम्यता प्रसिद्ध है । रूसियों की स्लाव की आबादी में बिल्ली जैसी आंखे सामान्य है । दुनिया में हर किसी आंखों का दिखावा उसके रूंग के आधार पर नहीं, लेकिन रचना से तय किया जाता है। भी पूर्ण दृष्टि नहीं है। आँखों का रंग और बनावट आनुवंशिकी द्वारा निर्धारित होती है ना कि आइरिस के आधार पर । दूसरे शब्दों में कहे तो इसकी रचना के बारे में कुछ खास नहीं है। आईरिस के कई ऊतक, फीका डॉट्स, रेशेदार मांसपेशियां, रक्त वाहिकाओं, रैखिक खांचे आदि पैटर्न बहुत ही मिलनसार तरीके से बनते हैं, प्रत्येक व्यक्ति के मामले में फिंगरप्रिंट की तरह ये भी विशिष्ट और दुर्लभ होते हैं। दुनिया की आबादी सात अरब है लेकिन दो लोगो का आईरिस कभी एक सा नहीं होगा।

हैरानी की बात है तो वह आदमी की बाईं-दाई आंख का आइरिस भी समान नहीं होता । स्वाभाविक रूप से समान नही होता । इसलिए कह सकते है कि पूरी दुनिया में सभी की बाई और दाहिनी आंख नहीं समान नही होती ।

05 गंध

हर आदमी के शरीर की गंध अलग अलग होती है ये बात कुत्ते तो सालों से जानते हैं। आज परीक्षण और प्रयोगों के माध्यम से शोधकर्ताओं इसका प्रमाण दिया है। अनुसंधान उन्होंने उस सवाल का जवाब पाने के लिए ऐसा किया की दुनिया भर में सात अरब लोग है ! सब की गंध में विविधता है या नही ? वास्तव में इस सवाल का जवाब बिना रिसर्च किये ही तर्क के आधार पर दिया जा सकता हैं ! पहले कहा था DNA के साइटोसिन, गुआनिन और थाइमिन के चार आधार अक्षर हैं, फिर भी स्वाभाविक रूप से उनके अरबों संयोजन हो सकते है तो गंध की उसमें भी बहुत विविधता सैद्धांतिक रूप से लाना असंभव नहीं है।

शोधकर्ताओं ने 200 लोगों के पसीने की गंध की जांच करने के बाद एसिड, किटोन, शराब और एल्डिहाइड रसायन की पहचान की, विभिन्न संयोजनों के अरबों के बीच प्रत्येक मामले में वह अद्वितीय गंध पैदा करता है। ग्रंथियों से उत्सर्जित गंध बैक्टीरिया के कारण कुछ गंधों बदल जाती है । जो प्रति व्यक्ति भी अलग है। कभी-कभी मानव विकास के दौरान इस गंध ने कोई भूमिका निभाई होगा । आज की रोजमर्रा की जिंदगी में इसकी उपयोगी प्रतीत नहीं होती लेकिन फिर भी सभी के पास वह पहचान पत्र है।

06 आवाज

जब कोई आदमी बोलता है तब आवाज पैदा करने के लिए उसके शरीर के अंग अपने तरीके से भिन्न योगदान देते है। ध्वनि उन सब के योगदान के समन्वय का परिणाम है। स्वरपेटी , नाक, तालु, जीभ, दांत, होंठ, गाल आदि अंगों के साथ विशिष्ट ध्वनियाँ आवृत्ति और वॉल्यूम में ध्वनि बनती है । वायु प्रवाह का रूप जिस तरह से बदलता है उसी तरह अलग ध्वनि पैदा होती है। यह स्पष्ट है कि किस तरह का परिवर्तन होता है । प्रत्येक अंग के आकार पर ये निर्भर करता है – और वह सब शरीर रचना के आधार पर । अब इंसानों एकसा नही होता तो इसमें भी समानता नही हो सकती । जैसे स्वर मुखर डोरियाँ / ध्वनिक मांसपेशियाँ थोड़ी छोटी होती हैं वही पर थोड़ा अधिक लंबा होने पर शोर उत्पन्न होता है।

रचनात्मक अंगों की संख्या आधा दर्जन है, अर्थात्, उनके द्वारा बनाई गई ध्वनियाँ संयोजन कई हैं और प्रति व्यक्ति अलग होने की हैरानी नहीं होनी चाहिए वास्तव में अपराध के विषय में फोरेंसिक विज्ञान में पहचान के लिए उंगलियों के निशान के साथ आवाज की छाप पर बजी भरोसा किया जाता है। अमेरिका की बेल अनुसंधान प्रयोगशालाओं के तीन विशेषज्ञ वॉइसप्रिंट निकाल देते साउंड स्पेक्टग्राफ नाम के प्राथमिक उपकरण को 1940 के दशक में बनाया था। सालों बाद लॉरेंस केस्ट्रा और ऑस्कर टोसी नाम के दो अमेरिकियों ने वॉयसप्रिंट की सटीकता की व्याख्या करने की विधि तैयार की । जो अपराध का पता लगाने के क्षेत्र में आज इस्तेमाल की जाती हज और कई देशों के कोर्ट इसे सबूत के तौर पर इस्तेमाल करते हैं ।

सबसे प्रसिद्ध उदाहरण अमेरिका का वाटरगेट घोटाला है । राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने सन 1972 में प्रतिद्वंद्वी पार्टी के व्हाइट हाउस में हुए अधिवेशन पर जासूसी करने के लिए व्हाइट हाउस के कुछ स्टाफ सदस्यों को कहा था। भूल यह थी की जासूसी में बातचीत के उन्होंने टेप रिकॉर्डिंग को होने दिया । जिसकी वॉयसप्रिंट ने उनको फंसा दिया । षड्यंत्र में भाग लेने वाले कर्मचारियों को जेल हुई जबकि राष्ट्रपति निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा।

07 दिल की धड़कन

कोई भी दो इंसानो का दिल कभी एक ही लय में नहीं धड़कता ! ईसलिए दिल भी आदमी के पहचान पत्र के रूप में अच्छा है । स्टेथोस्कोप से दिल की धड़कन को विशिष्ट श्रेणियों में वर्गीकृत नही कर सकते हैं लेकिन इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ बीट्स नामक एक उपकरण स्पष्ट रूप से ऐसा किया जा सकता है । तरीका आसान है । हृदय हर धड़कन पर मंद विद्युत प्रवाह रिलीज करता है । जो वास्तव में ह्रदय के संकोचन के लिए जिम्मेदार है । इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ़ ऐसी बिजली के मोज़े की तीन प्रकार के शिरोबिन्दुओ को रेकॉर्ड करता है । जब ऊपरी कोशिकाएं सिकुड़ती हैं तब P-लहर पंजीकृत होती है, तो QRS लहर को थोड़ा कम करें भारी संकुचन और के रूप में रिपोर्ट किया जाता है ।


कार्डियोग्राफ़ इंस्ट्रूमेंट तत्परता उसके बादलहर को नोट करता है। अंत में इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम कहा जाता एक लंबा ग्राफ तैयार होता है ।

कोई भी दो इंसान इस तरह के ग्राफ इसलिए समान नहीं होते की उनके दिल के आकार और आकार से संबंधित है कोई निश्चित मानक समान नहीं होते है। वयस्क व्यक्ति के दिल का वजन 255 ग्राम से 315 ग्राम तक कुछ भी संभव हो सकता है। सभी के दिल की धड़कन भी कुछ अलग होती है।

इस कारण से इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम पर एक शीर्ष बनाने मोजे की ऊँचाई, लंबाई और दो कोने के बीच की दूरी वाला व्यक्ति-दो-व्यक्ति का अंतर मामूली होता है।

किसी व्यक्ति के दिल की धड़कन की तरंग संरचना को बदला नही जा सकता क्योंकि उसका संचालन अर्धजागृत दिमाग के द्वारा होता हैं । वह ओटोमेटिक ! इसलिए बायोमेट्रिक्स का बिजन्स करने वाली कुछ कंपनियां ऐसा स्केनर बनाने के चक्कर मे है जो अधिकृत इंसान को उसकी heart beat की तरंग के आधार पर पहचान ले । कम्प्यूटर बनाए वाली कंपनी Apple तो दिल की धड़कन को ही पासवर्ड के रूप में उपयोग करने के लिए प्रयोग कर रही है।

दुनिया में हर कोई आप व्यक्ति से अलग की पहचान कराती सात अनन्य विशेषताओं के बावजूद हमारे लिये चेहरा ही व्यक्ति की पहचान है। वास्तव में आदमी का चेहरा आई कार्ड की 100% गारंटी नहीं है । इस साल की शुरुआत में फोटो पहचान के लिए हजारों नार्वे के चेहरो जब का प्रदर्शन किया गया, तो पाया गया कि उनमें से 3% हमशकल्स थे । सॉफ्टनर वाला कंप्यूटर भी उन्हें उन्हें दो अलग-अलग व्यक्तियों के रूप में पहचान ने में असफल रहा ।

सारांश यह कि : आदमी को इसकी मूल रूप में पहचान करनी हो चेहरे पर भरोसा मत करिये ।

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