विज्ञान के लापता हुए Top 05 ख़जाने

विज्ञान के लापता हुए Top 05 ख़जाने

विज्ञान के लापता हुए Top 05 ख़जाने

ख़जाना ! इंसान इसका नाम सुनते ही जैसे लार टपकाने लगता हैं । क्योंकि उसमें बिना महेनत किये बहुत कुछ मिलने की आशा जैसे पूरी हो जाती हैं । वैसे खजाने की बात करे तो ख़ज़ाने के भी बहुत सारे प्रकार होते हैं । जैसे किसी के पास गोल्ड कहे जाने वाले सोने का खज़ाना होता हैं , किसी के पास नींद कहे जाने वाले सोने का खजाना होता है , किसी के पास ज्ञान का तो किसी के पास शांति का खज़ाना होता हैं। लेकिन ये सब खजाने अलग अलग इंसान के लिए अलग अलग मायने रखते है । किसी के लिए ज्ञान आवश्यक है तो किसी के लिए धन !लेकिन आज हम जिन खजाने के बारे में बात करने वाले है वे सब खजाने तो मानव जाति के लिए बहुत ही मूल्यवान थे । अफ़सोस की सब के सब लापता है । सब खजाने एक तरह के विज्ञान के ख़जाने थे। तो चलिये जानते है विज्ञान के लापता हुए Top 05 ख़ज़ाने !

01 चोरी हो चुके चंद्र खड़क !

अमेरिका के 12 अंतरिक्ष यात्री सब मिलाकर करीब 382 किलोग्राम जितने चंद्र के पत्थर लेकर आये थे । पूरी मानव जाति उसकी ओर से उन सब ने चंद्र की मुलाकात ली थी । इसलिये तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने सद्भावना के प्रतीक के रूप में उन चट्टानों को छोटे छोटे टुकड़ों में तख्तियो में जड़कर 135 देशों, संयुक्त राज्य अमेरिका के 50 राज्यो को उपहारों के रूप में भेजे थे ।
नासा के दृष्टिकोण से, वे सभी टुकड़े उस देश या राज्यों की मलिकी के थे । नासा के पूर्व अधिकारी जोसेफ गुथिंस को कई साल बाद पता चला की चंद्र के कुछ खड़क अपने अधिकृत मालिकों के पास नही नहीं थे। चट्टानें की कालाबाजारी हो रही थी। निक्सन की सत्तावार तकती समेत खड़क के टुकड़े का सौदा किया जाए तो सीधी बात है कि खरीद दार उसकी असलियत में कोई शंका नही रह जाती।


अब बस उस उठाउगिर को कैसे धरदबोचा जाए यही सवाल था। ऐसी बात नहीं थी केई पुलिस जांच जैसी कार्यवाही की जाए । अर्थात् जोसेफ गुथेइंजे ने प्रलोभन का गाज़र लटकाकर एक ट्रेप सेट किया। अमेरिकाक के USA Today अख़बार में Moon Rock Wanted के शीर्षक के तहत की विज्ञापन दिया जिसमें खुद की पहचान के लिए झूठा नाम अपनाया । किसी ने फोन किया और अपोलो 17 में लाई गई चट्टानो के टुकडे कक तख्ती बेचने की ऑफर रखी । फोन पर गुथेइंजे ने फोन पर ही 50,00,000 $ का सौदा किया । बेचने वाले ने चंद्र का सुवेनियर शहर के किसी बैंक की तिजोरी में जमा करने को कहा। तिजोरी की चाबी के लिए पांच मिलियन डॉलर का भुगतान करने थे। बेशक, राशि का भुगतान करने का ही सवाल नहीं था। गुथेइंजे ने नासा को सूचना दी और कुछ दिनों बाद नासा के एजेंटों ने तिजोरी खोलकर चोरी के सामान को जब्त कर लिया।
चाँद का एक टुकड़े की तख्ती मध्य अमेरिकी देश होदुरस की थी। नासा ने इसे अपनी सरकार को सौंप दिया।


राष्ट्रपति रिचर्ड निक्स विभिन्न देशों और अमेरिकिन राज्यो और संस्थानों को भी चंद्र के सुवेनियर की दो दो तख्तियां दी थी । एक पर चंद्र की धूल का नमूना जड़ लिया गया था तो दूसरे पर चंद्र का टुकड़ा लगाया गया था। उसमें से 237 तख्तियां ब्लेक मार्केट में चोरी हो गई। जोसेफ गुंथेईज और उनके सहायको और नासा एजेंटों ने मिलकर 77 मालिकों को वापस सौंप दिया । लेकिन 150 अभी तक नहीं मिली है। (विशेष नोट: भारत को मिली दोनों तख़्तियक गायब हैं)। जोसेफ गुथेइंजे ने प्रत्यक्ष जाना कि चंद्र का सिंगल टुकड़े का भाव अगर पचास मिलियन डॉलर है तो कुल 160 नमूनों की क़ीमत कितनी ज्यादा होती है ? सच कहें तो क़ीमत की ही नही जा सकती। क्योंकि हमारी पृथ्वी के अरबो अरबो टन खड़क भी चंद किलोग्राम चंद्र के खड़क की आपूति नही कर सकते ।

02 बहुमूल्य रशियन बीज संग्रह

अगर बीज के लिए ‘खजाना’ शब्द उचित नहीं लगता है तो यह लेख आपके लिए है। द्वितीय विश्व युद्ध में, जर्मनी ने 146 डिवीजनों की जंगी सेना के साथ जब रूस पर आक्रमण किया तब हिटलर ने नाजी कमांडो टीम को देश की वैज्ञानिक संस्थानों पर छापा मारने का निर्देश दिया था। उसका ईरादा रॉकेट या हथियार की तकनीक को चोरी नहीं करना था। बल्कि रूस पर हिटलर की नजर बहुचर्चित बीज के संग्रह पर थी । जिसकी मदद से वह युद्ध के बाद कृषि क्षेत्र में नाजी जर्मनी का एकाधिकार करना चाहता था।

दुनिया भर केके अमूल्य बीजों का समृद्ध भंडार रशिया न कई सालों की मेहनत के बाद रूस में जिसने इकठ्ठा किया उस वनस्पतिशास्त्री का नाम निकोलाई वाविलोव था। कैब्रिज, ब्रिटेन विश्वविद्यालय में आनुवंशिकी के प्रणेता विलियम बेटसन से शिक्षा लेकर सन 1914 में वे रूस लौटे और पौधे व बेल पर प्रजनन के प्रयोग शुरू किए। विशेष दिलचस्पी उसे उत्क्रांति के दौरान कसदार बने यानी कि उम्दा जीन्स वाले बीजो में थी । विभिन्न अनाजों फलों और सब्जियों में से ऐसी कुलीनता वाले बीजो कक ढूंढ़कर उनकी Seed Bank बनाने के लिए निकोलाई वाविलोव दुनिया भर में सालो तक भटके । अफगानिस्तान, ईरान, दक्षिण अमेरिका, चीन, मिस्र, मध्य अमेरिका, इथियोपिया जैसे कई देशों की मुलाकात ली । विभिन्न किस्म के 50,0000 अनाज, दालें, फल और सब्जियों के बीज एकत्रित किये। प्रत्येक किस्म में विविधता इतना की सिर्फ गेंहू के 21,000 नमूने थे

वेविलोव ने 1930 तक लेनिनग्राद के संशोधन केंद्र में 250,000 किस्म के उत्तम बीज एकत्र कर लिए । जिसमें और भी ज्यादा बढ़ोतरी होने वाली थी। वेविलोव की एक और उपलब्धि यह कि रूस में ऐसे बीजों पर वैज्ञानिक प्रयोग करने के कई अनुसंधान केंद्र स्थापित किये । ध्यान रहै कि वह पृथ्वी के कई भाग में घूमकर उसने ऐसे बेलों और पौधों को ढूंढ निकाला जो हजारों या लाखों वर्षों से प्रकृति के खुले में सुरक्षित बच रहे थे। फसल का कीट, आंधी, भारी वर्षा, तापमान में विषमता मिट्टी में परिवर्तन, उर्वरता कैंसर जैसी प्रतिकूल परिस्थितियां सहन कर लेने जैसी कठोरता थी ।इस सम्बन्ध में बीज थोड़े मूल्यवान थे। विविधता के मामले में दुनिया भर में अनोखा भी था। द्वितीय विश्व युद्ध में नाजियों आक्रमण के कारण जो तुमुल संग्राम खेला गया उसमे 30,000 बीज के नमूने नष्ट हो गए। दूसरी ओर नाज़ी कमांडो सैनिक ने रूस के लगभग 200 अनुसंधान केंद्रों पर छापा मारकर वहां के बीज के संग्रह को लूट लिया। कमांडो सैनिक लूट के माल के साथ वापस लौट आए। हिटलर का मूल ऑस्ट्रिया तब जर्मनी का हिस्सा था इसलिए वहाँ के एकांत स्थान लानक में मध्ययुगीन किले में माल छिपा दिया गया। द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी आखिरकार हार गया । डच और रूसी सेना में ऑस्ट्रिया की सीमा तक पहुंचा तब किल्ले के नाजी सैनिको ने लुन्ट के माल कक कहि छीपा दिया। लेकिन कहा छुपाया ये कभी कोई जान नही पाया ।

आज भी लानक का महल के मूल्यवान बीजों की कहीं कोई पता नहीं। बीजो को यदि पा लिया जाए दुनिया में कृषि में नई हरित क्रांति हो सकती है । क्योंकि 1968 की हरित क्रांति के बाद अब केवल संकर अनाज उत्पन्न करने की त्रुटियों के कारण आज लगभग सभी नस्लें अपनी मौलिकता खो चुकी है । कई सालों की मेहनत के बाद निकोलाई वाविलोव एकत्रित किये हिये बीजों से अरबों टन कृषि उत्पाद मिल सकता है उसके मूल्य का कोइ अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।

03 दमास्क्स स्टील की तलवार

क्या आप कोई ऐसी तलवार की कल्पना कर सकते है जो 90 के कोण पर मोड़ने के बाद छोड़ दें तुरंत सीधी हो जाये !!!!

ईसा पूर्व 300 से शुरू करके सन 1500 तक इस तरह की तलवारें बहुत अच्छी प्रसिद्व थी। और सीरिया के देश की राजधानी दमास्क्स के कारीगर खास तरह के पोलाद से इसको बनाते थे। स्टील दमासक्स स्टील के नाम से जाना जाता था। तलवार के मामले में ऐसा कहा जाता है यदि आप हवा में एक रूमाल फेंककर उस पर तलवार का वार कर तो रूमाल दो टुकड़ों में विभाजित हो जाता था। तंबाकू की लोहे की नली को भी दमास्क्स की तलवार ककड़ी की तरह काट देती थी ।

इस तरह की बात शायद अतिशयोक्ति भी हो सकती है लेकिन इतना सच है कि दमास्क्स ब्रांड की तलवार एक साधारण तलवार जैसी नहीं थी। अनोखी मिश्र धातुओं और धातुविद्या से बनाई जाती थी । धर्मयुद्ध के समय में ख्रिस्ती यूरोप के कारीगरों ने ऐसी तलवारें बनाने की बहुत कोशिश की लेकिन उनको सफलता नही मिली । किस धातु का कितने स्टील के साथ संयोजन करना है ये उन्हें पता नहीं था और दमास्क्स के कारीगर ने कभी इस बात को कभी जाहिर नहीं होने दिया ।

अत्यंत तीक्ष्ण होना के बाद भी यह तलवार लचीली रहती दमास्क्स तलवार की सूक्ष्म बनावट वाला कच्चा माल भारत के धातु विज्ञानी सीरिया भेजते थे ये बात ध्यान में रखने लायक है। इस माल को अंग्रेजी में wootz स्टील कहा जाता है। वुड्ज़ शब्द तमिल और मलयालम
भाषा के उरुक्रे का अपभ्रंश है। अब इस शब्द बोलना अंग्रेजो के लिए तो मुमकिन था नही तो वह शब्द वूटज़ हो गया। वुट्ज़ के उत्पादन करने के लिए 910 C के तापमान पर लोहा को गर्म करके उसे तुरंत ठंडा किया जाता है, परिणामस्वरूप इसकी आंतरिक जाली / जाली की संरचना भिन्न होती है और स्टील को तब पेर्लाइट कहा जाता है। दूसरी किस धातु को मिलाया जाता है यह भेद भारतीय विशेषज्ञों ने कभी बताया ही नही । जब उन्होंने वुड्स सीरिया भेजना बंद कर दिया तब दमास्क्स का तलवार का कारोबार ढह गया। कौन सी धातुएं एक दूसरे के साथ किस मात्रा में मिश्र करनी है , किस प्रक्रिया से ये फॉर्म्युला हमेशा के लिए रहस्यमय बन गई । इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से भी उस रहस्य का खुलासा नहीं हो सका। सभी क्षेत्रों में जहां स्टील का उपयोग किया जाता है
दिशा एक जबरदस्त क्रांति के लिए भी खुल गए है लेकिन शोधकर्ता अभी उस रहस्य को जान नही पाए वे सब अभी भी भटके हुए ही है।

04 लोक नेस मॉन्स्टर की त्वचा

स्कॉटलैंड के प्रसिध्द लॉक नेस मॉन्स्टर के बारे में कथित जल राक्षस के बारे में कहीं भी जाना है ? (स्कॉटलैंड में बहुत संकीर्ण, लेकिन बहुत लंबी झील को lock कहते है )। गणना के अनुसार लगभग लेक नेस में 3,000 लोगों ने राक्षस को देखा है- यानी देखने का दावा किया है। औसतन 15% मामले ऐसे हैं जिनमें राक्षस का अस्तित्व लोगों के भ्रम में है ऐसा नहीं किया जा सकता बाकी मौके औसत फर्जी हैं। लोक नेस में गिरे हुए पेड़ का सूखा कुंड, तेल से भरा हुआ है । स्कॉटलैंड में जंगली गाय के तैरते शव को या राक्षस जैसे आकार वाली चीज को लोग जल राक्षस मान लेते है ।

वैसे महव 15% अंक का है। उससे भी ज्यादा अधिक महत्वपूर्ण कुछ तस्वीरें हैं। गवाहों केई पहली नज़र डालें तो वह धोखा है लेकिन तस्वीर दस्तावेज होती है जो कभी मिटती नहीं। सूक्ष्मदर्शी की आंखों से भी इसे जितनी बार चाहें उतनी बार देखा जा सकता है।


1933 से शुरू करके आज तक बहुत कम तस्वीरें ली गई हैं। कुछ तथाकथित में विशाल की लंबी, मुड़ी हुई गर्दन मिली है, लेकिन लॉग शॉट छाया के समान होने के नाते आँख, नाक, जबड़े आदि की पहचान करना मुश्किल है । फिर भी उन तस्वीरों के आधार पर एक शोधकर्ताओं ने लॉक नेस मॉन्स्टर के अस्तित्व को स्वीकारा है । प्रागैतिहासिक और प्रागैतिहासिक डायनासोर आर्कटिक समुद्री प्लेसीसोर का वंशज बताया है ।

इस दिलचस्प विषय के बारे में विशेष ध्यान देने वाली बात यह है कि 17 वीं शताब्दी में लंदन का रॉयल समाज कुछ अजीब पशु-पक्षियों के नमूनों की संग्रहालय की स्थापना की गई थी। आज परिचित लगे लेकिन सालों पहले बार मीले नमूने थे । नेहेमिआह ग्र्यू नाम के वैज्ञानिक ने प्रत्येक का वर्णन करती सूचकांक पुस्तक के रूप में प्रकट की । जिसमे सील कहै जाने वाले स्तनपायी / स्तनपायी जलीय त्वचा के बारे में संक्षिप्त विवरण था। खल की ख़ासियत के बारे में, उन्होंने लिखा: “महत्वपूर्ण अंतर यह कि उसकी गर्दन बहुत लंबी होती है। नाक से शुरू होकर पूंछ की लंबाई के बराबर होती है। ” सील की गर्दन इतनी छोटी होती है कि केवल गर्दन के रूप में ही नहीं जाना जाता है, इसलिए नहेमायाह ग्रू जिस त्वचा का वर्णन किया वह एक जानवर की होने की संभावना नहीं है। हालाँकि, उनका वर्णन कई साल बाद 1751 में जेम्स पार्सन्स नाम के वैज्ञानिक ने रॉयल सोसाइटी के मुखपत्र में उद्धृत किया ।

भेद भरम वाली त्वचा फिर गायब हो गई। किसने चुराया था प्रदर्शन या परीक्षण के लिए ले गया या कहि पर भेज दिया ये कभी कोई जान नही पाया । एक समय उसके अस्तित्व को लेकर कोई संदेह नहीं है। लॉक नेस राक्षस का तथाकथित आकार (मुख्य रूप से गर्दन का आकार) के साथ और प्रागैतिहासिक समुद्री Plesiosaurus के अलावा त्वचा आकार से मेल खाती है। इसमें भी बेमत नहीं। विज्ञान की दृष्टि से, खल एक निश्चित रहस्यपूर्ण खजाना है । लेकिन विज्ञान ने इसे खो दिया है। परिणाम: स्कॉटलैंड के लेक नेस में ‘दिखाई देता है’ लॉक नेस मॉन्स्टर अभी भी वैज्ञानिकों के लिए जांच का विषय है।

05 ग्रीक फायर की गुप्त फॉर्म्युला

कोई आग ऐसी भी हो सकती है जिसे पानी से भी बुझाया ना जा सके ? एक समय में ऐसी आग थी।

। ‘ ग्रीक फायर ’ उसका नाम था । ज्वलनशील पदार्थ या पदार्थों के मिश्रण का आविष्कार प्राचीन ग्रीस में पैदा हुआ था । 6 ठ्ठी सदी में भूमध्य सागर के सभी तटीय क्षेत्रों को समाने वाला बीजान्टिन नाम का विशाल ख्रिस्ती साम्राज्य था।

इसमें अफ्रीका, यूरोप और एशिया के क्षेत्र शामिल थे ।इस्लामी जिहादी रोमन कैथोलिक बीजान्टिन
के खिलाफ लड़े और 1096 में पहला धर्मयुद्ध छिड़ गया। सब मिलाकर चार धर्मयुद्ध हुए । समुद्री लड़ाइयों ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बीजान्टिन यूनानियों ने दुश्मन के लकड़ी के जहाजों पर हमला किया था । प्रभावी ढंग से आग के हथियार की कोशिश की। जहाज में आग लग गई । यह सच है कि उसकी आग को बुझाया नहीं जा सकता । लेकिन एक उग्र टॉन्सिल की तरह आग का गोला समुद्र में गिरने बाद भी वह बुझता नहीं था । अगर उसका एक टुकड़ा शरीर को लगे तो वह शरीर के साथ चिपककर मांस को भून डालता था ।

रोमन कैथोलिक का शस्त्र आधुनिक युद्धों में उपयोग होने वाले हथियारों जैसा था। नाविक‘ग्रीक फायरिंग’ एक ज्वलनशील पदार्थ को पिप में भरने के ग्रीक फायरिंग कर तब लंबी अग्नि शिखा जलाता हुआ आग का गोला शत्रु के जहाज पर चिपककर उसे अग्नि स्नान करा देता था । नाविक ज्यादा से ज्यादा समुद्री सतह पर ऐसी अग्नि को प्रज्वलित करते थे । जिसके कारण दुश्मनों के जहाज इधर उधर भी ना जा सके ।

बायजेन्टाइन साम्रज्य 16 वीं शताब्दी में मिट गया। ग्रीक फायर की फॉर्म्युला भी यूनानी रसायनशास्त्रीयो ने अंत तक इतनी गोपनीय रखी कि उसका रहस्य का परदा कभी नहीं खुला। सल्फर, आधुनिक रसायनज्ञ कलिचुनो, नीना, देवदार के पेड़ बेरो / राल, सुरोखर आदि ज्वलनशील चीजों पर प्रयोग कर चुके है । फिर भी पानी से जो आग ना बजे ऐसी आग पैदा भी नहीं कर सके।

विज्ञान के क्षेत्र में, जैसे “खो गया है लेकिन मिले नहीं” जैसे अन्य खजानों के बारे में भी बात हो सकती है ।

दो या तीन उदाहरण देख लेते है।

1971 में अमेरिकी वन विभाग के वनस्पति विज्ञानियों के लिए प्रश्न हुआ कि अंतरिक्ष यात्रा वनस्पति के बीज को लंबे समय तक की भारहीन अवस्था प्रभावित करता है या नहीं? अपोलो -14 के साथ ही उन्होंने रेडवुड और पाइन जैसे पेड़ के 500 बीज चंद्रमा पर भेजे गए थे।

यात्रा के अंत में जमीन पर उन बीजो बोने के बाद देखा तो लगभग सभी बीज अंकुरित हो गए। प्रत्येक बीजो को उस के बाद स्विट्जरलैंड, जापान,ब्राजील और अमेरिका जैसे देश राज्यों को उपहार में दिए गए। इनमें से केवल 4 पौधे ही बड़े हुए । बाकी पौधों में पत्तियां नहीं होती हैं, क्योंकि जंगलों में उनका निवास स्थान नोट नहीं किया गया। इस प्रकार सिर्फ 65 बीज अन्ततरिक्ष यात्रा के बाद पेड़ बने । बाकी के 434 का पता नही । 87% बीज पर अवकाशयात्रा ने क्या असर किया उस बारे में विद्वान अंधेरे में है ।

एक और उदाहरण पृथ्वी के पहला पक्षी आर्कियोप्टिरिक्स का साबुत बचा हुआ अश्मी स्वरुप ला कंकाल 1991 में रहस्यमय तरीके खो गया । सभी खोजने का प्रयास करते हैं लेकिन सब प्रयास विफल रहे है ।


ये सब खजाने ऐसे है जिनको पैसे के पलड़े से तौला नही जा सकता । विज्ञान की दृष्टि से ही उनका मूल्यांकन करना होगा ।

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