विदेशो में भारतीय लिपियाँ

By | October 8, 2020

एशिया के अनेक देशों में भारतीय संस्कृति के प्रसार के साथ वहां भारतीय भाषाओं और लिपियों का प्रचलन हुआ। मध्य एशिया से संस्कृत, प्राकृत और क्षेत्रीय भाषाओं में खरोष्ठी, ब्राह्मी और ब्राह्मी से व्युत्पन्न लिपियों में बहुसंख्यक अभिलेख प्राप्त हुए है। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में प्रचलित वर्णमालाएं भी ब्राह्मी से निकली हुई हैं। वहां के प्रारम्भिक अभिलेखों में संस्कृत का प्रयोग हुआ है। इसके विपरीत लंका में प्राकृत और पालि के तथा बर्मा में संस्कृत तथा पालि में लिखित अभिलेख प्राप्त हुए है।

इन प्रदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार भारत के विभिन्न भागों के लोगों के योगदान से हुआ। वृहत्तर भारत में.इस संस्कृति को ले जाने का श्रेय राजवंशों के अतिरिक्त भारतीय व्यापारियों को भी है। वे व्यापार लिए उन देशों में गये और वहीं बस गये।

मध्य एशिया

पाकिस्तान के पेशावर और हजारा जिलों से प्राप्त अशोक के अभिलेख प्राकृत और खरोष्ठी में लिखे गये हैं। खरोष्ठी अरमड़क लिपि का परिष्कृत भारतीय रूप है जो हरवामनी शासकों के शासनकाल में प्रचलित हुई। अफगानिस्तान में मौर्य सम्राट् का कंधार का द्विभाषिक अभिलेख यूनानी तथा अरमइक दो पाठों से युक्त वहां से प्राप्त परवर्ती प्राकृत और खरोष्ठी अभिलेखों में मीनेण्डर और विजयमित्र के अभिलेख उल्लेखनीय है। ये बजौर क्षेत्र से उपलब्ध हुए हैं। हुविष्क के राज्यकाल का पूर्ण कलश-अभिलेख काबुल से लगभग 50 किलोमीटर दूर पश्चिम में वरदक से प्राप्त हुआ है।

चीनी तुर्किस्तान में बहुसंख्यक पाण्डुलिपियां मिली है। ये आयताकार काष्ठ पट्टिकाओं पर लिखी हुई हैं। इनका समय तीसरी शती ई. है। यहाँ ब्राह्मी के साथ-साथ खरोष्ठी का प्रयोग सातवीं शती ई. तक प्रचलित रहा। उसके बाद वहां के अभिलेखों में स्थानीय भाषाओं का प्रयोग होने लगा।

नेपाल के प्राचीन अभिलेखों में रुम्मिनदेई और निगलीव सागर के स्तम्भलेख उल्लेखनीय हैं। उनमें ब्राह्मी वर्णमाला तथा प्राकृत भाषा का प्रयोग हुआ है। इसी प्रकार प्रारम्भिक लिच्छवि पुरालेखों की वर्णमाला परवर्ती ब्राह्मी तथा भाषा संस्कृत है। परवर्ती लिच्छवि अभिलेखों में सिद्धमातृका लिपि का प्रयोग मिलता है

लंका

दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में भारत से लंका का सांस्कृतिक सम्बन्ध सर्वाधिक प्राचीन है। एक सिंहली परम्परानुसार, राढ़ ( दक्षिण-पश्चिम बंगाल) में सिंहपुर के राजपुत्र विजय तथा बंग (तत्कालीन दक्षिणी बंगाल) नरेश के प्रपौत्र ने लगभग पांचवीं शती ई.पू. के प्रारम्भ में लंका में उपनिवेश बसाया। तृतीय शती ई.पू. में अशोक मौर्य ने एक बौद्ध प्रचारक मण्डल के साथ अपने पुत्र –
पुत्री ( महेन्द्र और संघमित्रा) को लंका भेजा।

प्रचारक-मण्डल के प्रभाव से वहां के राजा देवानांपिय तिष्य तथा उसकी प्रजा ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। 11 वीं शती में चोलों के साम्राज्य में यह द्वीप सम्मिलित था। यहां की भाषा आर्य परिवार से सम्बन्धित है।

परम्पराओं से ज्ञात होता है कि पूर्वी और पश्चिमी भारत के । लोगों ने इस भूभाग में आर्यत्व का प्रसार किया। प्रारम्भिक भारतीय स्वतन्त्र शासक “राजा” उपाधि धारण करते थे। उत्तर-पश्चिम भारत के हिन्द-यूनानी शासक “राजा महान” या “महाराजा” उपाधियां धारण करते थे। कलिंग के शासक खारवेल ने भी “महाराज” विरुद धारण किया। इस में उपाधि का प्रयोग लंका के अभिलेखों मे मिलता है। संभवतः यह उपाधि लंका के शासकों द्वारा पश्चिम या उत्तर-पश्चिमी भारत ये से ग्रहण की गयी। लंका के अनेक प्रारम्भिक पुरालेखों में खरोष्ठी लिपि का प्रयोग किया गया है। जिससे पता चलता है की लंका ग और, खरांष्ठी का प्रयोग करने वाले, भारत के बीच पारस्परिक सम्बन्ध था।

लंका में संस्कृत अभिलेखों की संख्या नगण्य है। वहां पालि-प्राकृत ही लोकप्रिय थीं। लगभग सातवीं शती ई. के संस्कृत भाषा में लिखित दो अभिलेख–स्वन- वलिसाय स्तम्भलेख और कुच्छवलि अभिलेख महत्वपूर्ण है। उनमें पांचवीं है से सातवीं शती ई. के मध्य की ब्राह्मी वर्णमाला मिलती है।

जेतवनाराम का संस्कृत-अभिलेख उत्तर भारत की सिद्धमातृका लिपि में है जिसका समय नवीं शती है।

बर्मा, स्याम (थाइलण्ड) और मलाया प्रायद्वीप बर्मा के प्रारम्भिक अभिलेखों में संस्कृत और पालिका प्रयोग हुआ है। अराकान के चन्द्र शासकों के अभिलेख छठी शती ई. के. है। वे पद्यमय सरल संस्कृत में हैं और शैली की दृष्टि से बोर्नियो के शासक मूलवर्मा के लेखों से समानता रखते है। इन अभिलेखों की लिपि पूर्वी भारत की परवर्ती ब्राह्मी है। इनकी शैली प्रारम्भिक कदम्बों के अभिलेखों से मिलती-जुलती है। आनन्दचन्द्र का अभिलेख बर्मा में अद्यावधि प्राप्त प्रशस्ति-शैली के संस्कृत अभिलेखों का एक अनुपम उदाहरण है। यह पूर्वी भारत की सिद्धमातृका लिपि में उत्कीर्ण है।अन्य अधिकांश अभिलेख पश्चिम तथा दक्षिण भारत की परवर्ती ब्राह्मी लिपि में हैं। बर्मा में दक्षिण-पूर्व-एशिया की भांति शक संवत् लोकप्रिय न था।


मोस (तलिंग्स) की भाषा के आद्य अभिलेख एक पापाणपट्ट पर प्राप्त हुए है। यह भाषा इरावदी नदी की घाटी में प्रचलित थी। इस भाषा के अभिलेख लगभग छठी और सातवीं शती की लिपि में उत्कीर्ण है और दो देशों के सांस्कृतिक सम्बन्धों का संकेत देते हैं। बारहवीं शती के म्याजेदी (माइनकब, पेगन) अभिलेख के चार विभिन्न भाषान्तर-पालि, बर्मी, मॉन और प्यू-मिलते हैं। लगभग तेरहवीं शती का एक पेगन अभिलेख अंशतः संस्कृत भाषा तथा ग्रन्थ लिपि में और अंशतः तमिल भाषा तथा लिपि में मिला है। इसमें एक वैष्णव भक्त द्वारा पेगन के एक विष्णु मंदिर के निमित दिये गये कई उपहारों के अनुदान का उल्लेख है।

स्याम (थाइलैण्ड) से प्राप्त राजा राम खाम-हेंग का शक संवत् 1214 का सुखोतेह अभिलेख महत्वपूर्ण है। इसकी भाषा एवं लिपि स्यामी है । मलाया प्रायद्वीप से उपलब्ध आद्य अभिलेख बौद्ध मत से प्रेरित है। यहां से प्राप्त बुधगुप्त के खण्डित प्रस्तर अभिलेख में।रक्तमृत्तिका के “महानाविक” बुधगुप्त का उल्लेख है। ये अभिलेख पांचवीं-छठवीं शती की ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं। यहा
से प्राप्त एक अभिलेख में 697 शक संवत् का उल्लेख मिलता हिन्दशिया के अधिकांश प्रारम्भिक अभिलेख काव्यमय शैली में है। कम्बोडियाई अभिलेखों के विपरीत इनका वर्ण्य-विषय संक्षिप्त है। जावा में भारतीय साहित्य के घनिष्ठ परिचय से देशज साहित्य का विकास हुआ। वहां की संस्कृति में भारतीय तत्वों की प्रधानता है। बोर्नियों में कुतेह से प्राप्त मूलवर्मा के अभिलेख बनवासी के आद्य कदम्यों के अभिलेखों की शैली के हैं।

जावा से प्राप्त पूर्णवर्मा के अभिलेख भी इसी शैली के हैं। इनमें साग्धरा और अनुष्टुप छन्दों का प्रयोग मिलता है। इनका समय छठी शती निर्धारित किया गया है। मलाया और हिन्देशिया से उपलब्ध संस्कृत अभिलेखों की संख्या कम्बोडिया और अनाम से प्राप्त अभिलेखों की अपेक्षा कम है। हिन्द एशियाई अभिलेखों में अनुदान या मंदिरों के भवनों का उल्लेख है। अभिलेख प्रायः पापाण पट्टिकाओं या शिलाओं पर लिखे गये हैं। कुछ अभिलेख तांबे, चांदी और स्वर्णपत्रों पर भी अंकित हैं। आद्य अभिलेखों में पश्चिम-दक्षिण भारतीय परवर्ती वाहमी का स्थानीय परिवर्तित रूप मिलता है। कालान्तर में इसी वाङ्मी से व्युत्पन्न कवि भाषा (पुरानी जावाई भाषा) और लिपि का प्रयोग होने लगा।

हिन्देशिया के आठवीं शती के अभिलेखों में शक संवत् का न प्रयोग मिलता है। प्राचीनतम अभिलेख शक संवत् 700 (778 ई.) में अंकित है।20 शक संवत् 876 (954 ई.) का मिण्टो पापाण अभिलेख कवि भाषा में है।21 इसके प्रारम्भिक दो श्लोक संस्कृत में है।

कम्बोडिया

सम्पूर्ण कम्बोडिया में पांचवीं से चौदहवीं शती तक के संस्कृत भाषा में लिखित बहुसंख्यक अभिलेख प्राप्त हुए हैं। इन अभिलेखों में कई तो पर्याप्त बड़े हैं। इनमें शक संवत तथा संख्यागत दाशमिक प्रणाली का प्रयोग छठी-सातवीं शती से ही दृष्टिगोचर होता क है।

पश्चिम तथा दक्षिण भारत की परवर्ती वाहमी कम्बोडिया लायी गयी और धीरे-धीरे अनेक रूपों में परिवर्तित हो गयी। यहाँ के से सस्कृत अभिलेखों के वर्ण-विन्यास में “द” के लिये “ड” औ मे “” के लिये “न” तथा इसके विपरीत भी मिलता है। ये कभी-कभी “ण द” के लिये “ण डे” भी लिखा गया है।

अभिलेखों की भाषा शुद्ध संस्कृत है। उनको पापाण पर नता सावधानीपूर्वक उत्कीर्ण किया गया है। सामान्यरूप से अभिलेखों में राजाओं का गुणानुवाद तथा धार्मिक संस्थाओं को दिये गये अनुदानों का वर्णन किया गया है। भारतीय प्रशस्तियों के विपरीत वहां की प्रशस्तियों में ऐतिहासिक तथ्यों के अतिरिक्त शासन करने वाले सम्राटों की राज्यारोहण तिथियां तथा उनके पूर्वजों का विवरण मिलता है।

कम्बोडियाई अभिलेखों की विषयवस्तु धर्मपरक है। इनमें देवी-देवताओं के नाम, दैनिक या ऋतु सम्बनधी पूजा सामग्री की लम्बी सूचियां और मंदिर की चल-अचल सम्पति का विवरण मिलता है। कुछ वैष्णव मत के अभिलेखों को छोड़कर अधिकतर अभिलेख शैवमत सम्बन्धित हैं। बौद्ध अभिलेखों की संख्या तो और कम है। प्रलेखों से ज्ञात होता है कि यहां शिव, विष्णु और बुद्ध का सहपूजन प्रचलित था। भागवत, पांचरात्र, पाशुपत आदि धार्मिक मत अस्तित्व में थे। राजाओं, भद्रपुरुषों और सामान्य लोगों के नाम संस्कृतनिष्ठ होते थे। भारत के पाणिनि, पंतजलि, मनु, वात्स्यायन, विशालाक्ष, प्रवरसेन, मयूर, गुणाढ्य और सुश्रुत की कृतियां यहां विशेष लोकप्रिय थी। अनुश्रुतियों से ज्ञात होता है कि यहां के शासक यशोवर्मा ने पंतजलि के महाभाप्य पर एक टीका लिखी थी और उसका एक मंत्री होराशास्त्र में निष्णात था।

राजा इन्द्रवर्मा के प्रसत कनडोल डोम-अभिलेख से ज्ञात होता है कि राजा के गुरु शिवसोम ने स्वयं भगवत्पाद शंकर से धर्मग्रन्थों का अध्ययन किया था, जो दक्षिण भारत के पश्चिमी समुद्रतटीय भूभाग में उत्पन्न हुए थे और एक महान् भारतीय दार्शनिक थे।

दक्षिण अनाम

दक्षिण अनाम (चम्पा) में संस्कृत के अभिलेख प्रचुर मात्रा में मिले हैं। अभिलेख आकार में छोटे हैं। गद्य और पद्य में. या गद्य-पद्य मिश्रित रूप में वे प्रायः शिलाफलकों पर उत्कीर्ण किये गये हैं। कुछ अभिलेख मूर्तियों और धातुपत्रों पर भी लिखे गये हैं। अनाम से प्राप्त अभिलेखों से प्रकट होता है कि वहां भारतीय संस्कृति की प्रधानता थी। वहां ब्रह्मा, शिव तथा विष्णु की पूजा प्रचलित थी। एक अभिलेख में मानव-बलि का वर्णन किया गया है। उल्लेख है कि महाराज भद्रवर्मा ने “तुम्हे अग्नि को समर्पित करंगा” कहकर एक दास को यूप से बांधने को कहा। इस क्षेत्र में शक संवत् का प्रयोग छठी शती ई. के उत्तरार्द्ध से प्रारम्भ हुआ ।

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