सेंकडो किलोमीटर की रफ़्तार से टेक्नोलॉजी की पटरी पर दौड़ने वाली ट्रेनों का विज्ञान

सेंकडो किलोमीटर की रफ़्तार से टेक्नोलॉजी की पटरी पर दौड़ने वाली ट्रेनों का विज्ञान

सेंकडो किलोमीटर की रफ़्तार से टेक्नोलॉजी की पटरी पर दौड़ने वाली ट्रेनों का विज्ञान

दुनिया में एशिया और अमेरिका और रूस के बाद तीसरे सबसे बड़े नेटवर्क वाले भारतीय रेलवे की कुल फैलाव 81,511 किमी जितना है। लगभग 4,12,317 वैगन्स , 39, 263 विशाल यात्री कोच और 7739 इंजन उसके विशाल नेटवर्क में है । देशभर के 6856 स्टेशनों के बीच प्रतिदिन 8702 ट्रेन दौड़ाकर लभगभ 1.4 करोड़ यात्रीओ को भारतीय रेलवे उनके मकाम तक पहुंचाती है । कुल मिलाकर 15.1 लाख कर्मचारी रेलवे में काम करते हैं – और ​​यह भी कि एक विश्व रिकॉर्ड है। दुनिया में किसी भी अन्य संगठन या कंपनी में इतने सारे कर्मचारी नहीं है । न केवल नेटवर्क के मामले में बल्कि रेलवे का इतिहास भी देखें , पूरे एशिया मके भारत जितना तरह ‘अनुभवी’ रेलवे दूसरा कोई नही है । क्योंकि पहली ट्रेन सेंकडो साल पहले दौड़ी थी ।

जापान की बुलेट ट्रेन जिसने सं १९६४ में २१० किलोमीटर की स्पीड से दौडकर रेलवे के सब समीकरणों को बदल क्र रख दिया

भारतीय रेलवे के बारे में बहुत कुछ उत्कृष्ट है। यहां हम नेटवर्क, सिस्टम या इसके बारे में बात कर रहे हैं , उसके तवारीख़ की बात नही कर रहे । लेकिन बात करे टेक्नोलॉजी की तो भारतीय रेलवे दुनिया के एशियाई देशों जैसे जापान और दर्जनों अन्य देशों की तुलना में बहुत पिछड़ा हुआ है। जापान के साथ तुलना करें तो रेलवे प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उसने पूरी दुनिया में अपना नाम प्रस्थापित किया है । 1964 में जापान में पहली बार हाई-स्पीड बुलेट ट्रेन 210 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चली थी । तब ऐसा लग रहा था कि पटरियों पर चलने वाली एक पहिए वाली ट्रेन के लिए वह सीमा गति अधिकतम सीमा है। लेकिन कुछ समय बाद खुद जापान ने वह रिकॉर्ड तोड़ दिया। बुलेट ट्रेनों की नई पीढ़ी की ट्रेनों की रफ्तार 215 किलोमीटर प्रति घंटा है । कुछ साल और साल बीत गए और जापान नाम के इस देश में चुंबकीय ट्रेन का समय आया । पटरियों पर दौड़ने के बदले हवा में सरकने वाली गाड़ियों की रफ़्तार असाधारण थी । इस तरह की ट्रेन की गति का नवीनतम रेकॉर्ड (3 दिसंबर, 2009) रिकॉर्ड 581 किलोमीटर प्रति घंटा है !


टर्बो-प्रो इंजन के साथ सामान्य जेट विमान और जापान की इस ट्रेन के बीच का अंतर मानो व्यावहारिक रूप से मिट गया !

रेलवे क्षेत्र में जापानी और भारतीय टेक्नोलॉजी के बीच 581 माइनस 130 किलोमीटर इक्वलटू 451 किलोमीटर का अच्छा ख़ासा गेप है । भारत की सबसे तेज शताब्दी एक्सप्रेस केवल 130 किलोमीटर प्रति घंटातेजी से दौड़ सकती हैं। अब गति सीमा खुद ट्रेन की नहीं, बल्कि पटरियों के आधार पर तय होती है ये अलग बात हैं ।

टेक्नोलॉजी के संदर्भ में भारतीय रेलवे का कछुआ छाप सिस्टम के पीछे रहे कटाक्ष को देखें :

मुंबई-से-ठाणे पर पहली ट्रेन सन 1853 में दौड़ी । यात्रियों के लिए स्थायी ट्रेन सेवा की शुरुआत भी उसी साल हुई । उस साल तो जापान के लोगों ने रेलवे इंजन तक नही देखा था । दूसरे साल 1854 में अमेरिकी नौसेना के कमोडोर एम। सी। पेरी सम्राट जब युद्धपोतों ने जापान की सद्भावना यात्रा पर गए तब शहनशाह इयेसेदा को अमरीकन सरकार की ओर से एओ रेलवे इंजिन , एक रेलवे कोच और लगभग आधा किलोमीटर की परिधि में सर्क्युलर रेलवे बना सके उतनी पटरियां दी । कमोडोर पेरी जब संयुक्त राज्य अमेरिका में लौट आये उस के बाद, उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा,‘जब इंजन और डिब्बे गोलाकार ट्रैक पर चलने लगे तब तीन हजार जापानी जो इकट्ठा हुए लोग उसे देखर हैरान हो गए । जापान के पिछड़ेपन के ख्याल मुजे उस प्रसंग में मिल गया। ”

सोचने की बात प्राचीन जापान के बदले पिछडे हुए भारत की है । अमेरिका की ओर से उपहार के रूप में मिली पहली छुईमुई ट्रेन घंटे के सिर्फ 29 किलोमीटर की स्पीड से चली थी फिर आज जापान 581 किलोमीटर प्रति घंटे के अंक को पार कर चुक है । जबकि भारत की पहली ट्रेन 56 किलोमीटर की स्पीड से दौड़ने के बाद आज भी उसकी ‘ गाड़ी ‘ 130 किलोमीटर की स्पीड पर ही अटकी हुई है । अटकने का कारण क्या ?

पटरी पर दौड़ने के बदले हवा में तैरती जापान की मेग्नेटिक ट्रेन जिसने ५८१ किलोमोत्र प्रति घंटा की स्पीड प्राप्त करके दिखाई

भारत की पहली सुपरफास्ट तथाकथित ट्रेन राजधानी एक्सप्रेस थी, जिसकी सेवा ​​दिल्ली और हावड़ा के बीच 1450 किमी के रूट पर शरू ही थी । राजधानी का 120 किलोमीटर की यात्रा की स्पीड उस समय यूरोपीय, जापानी और यह अमेरिकी ट्रेनों की तुलना में बहुत धीमा था । और तो और यह स्पीड कोच की संख्या को पचास फीसदी कम करने के बाद हासिल की थी । दिल्ली-हावड़ा दूसरी एक्सप्रेस ट्रेन 1187 पैसेंजर सामने वाले 12 कोच साथ दौड़ती हैं जबकि तो राजधानी (दो पावर कार समेत ) आठ डिब्बे वाली ट्रेन है । इस तथ्य के कारण कि केवल छह डिब्बे स्पेर में रहने कारण उसमे मुश्किल से 330 लोग हो सकते है। सालो बाद 1998 में शताब्दी एक्सप्रेस 130 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने लगी। मतलब कि 20 वर्ष के समय मे भारतीय टेक्नोलॉजी के लगभग सिर्फ़ 10 किलोमीटर जितनी तरक्की की । शताब्दी एक्सप्रेस के लिए कानूनी रूप से निर्धारित गति सीमा 140 किलोमीटर है, लेकिन इतनी गति से वह ट्रेन लगातार नही दौड़ती । वास्तव में यह सीमा रेलवे ट्रैक कितना आघात सहन कर सकता है उसकी है । भारत के कई व्यापक क्षेत्र पटरी का वजन 3 किलोग्राम प्रति मीटर है। लंबाई में 11 से 18 मीटर का प्रत्येक बैंड वास्तव में न्यूनतम आधा से एक टन तक का होता है । लेकिन प्रति मीटर उसका वजन 44 किलोग्राम बैठता है । तेज़ रफ़्तार से दौड़ने वाली ट्रेन का दबाव इतना ज्यादा होता की सामान्य वजन की पटरी उस पर उस पर तेजी से गुजरते पहियों के टनो जितना भार को नहीं उठा सकते है।

इसलिए पुरानी पटरियां बदलकर अब 52 किलो ग्राम प्रति मीटर वजन की नई पटरियां बिछाई जाती हैं । वैसे तो यह पटरियां भी 150 किलोमीटर से भी तेज़ चल रही ट्रेन का दबाव झेल नही सकते । (कोंकण रेलवे के ट्रैक आधुनिक किस्म के होने के बावजूद 160 की गति सीमा पर ही ट्रेन चल सकती है।)

हाई-स्पीड ट्रेन के पहिए का अधिकतम झटका हमेशा दो पटरी के बीच रहे जॉइंट पर लगता है । जइसे फिशप्लेट कहा जाता है । वास्तव में तो यह जॉइंट ही नहीं होना चाहिए । किसी भी प्रकार के जॉइंट के बिना पटरियां अब ट्रेक रिन्युअल ट्रेन कहि जाने वाली टी आर टी नाम से जाने जाती विशाल 14 मशीनों के साथ वाया एक विशेष टायफा द्वारा बिछाया जा रहा है। हर दिन दो
हजार लीटर डीजल खाने वाला यह ओटोमेटिक यूनिट हर घण्टे 1 किलोमीटर के लंबी पटरियों को उखाड़कर उसकी जगह नई पटरियां सीमेंट क्रोंकीट के स्लीपर्स समेत बिछा सकता हैं । लेकिन इस तरह से रेलवे का नवीनीकरण करने के बाद भी आने वाले समय की सुपर शताब्दी एक्सप्रेस 160 कि.मी से ज्यादा तेजी से नही दौड़ ओआयेगी।

रेल मंत्रालय 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ट्रेन को खींच सके ऐसे एशियन ब्राउन बोवेरी के स्विस इंजन खरीदे है । लेकिन मजबूत पटरियों के बिना वे किसी काम के नही। प्रत्येक आयात किया गया इंजिन महंगा है। लेकिन उसकी गति सीमा भी 160 किमी तक ही सीमित रहने वाला है । यानी हमारी रेलवे जापान की पहली बुलेट ट्रेन के बराबर भी नहीं हो सकती ।

जापान ने जब मेग्नेटिक ट्रेन ओर प्रयोग शुरू किये उससे पहले वहां बुलेट ट्रेन की बोलबाला थी। 1964 जापान ने 210 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने वाली ट्रेन को ‘बुलेट ट्रेन’ नाम दिया तो वह बहुत सार्थक नही लग रहा था, क्योंकि राइफल से दागी गई बुलेट घण्टे के 2400 किलोमीटर की रफ्तार से निकलती है । वास्तव में ‘बुलेट’ शब्द मात्र इसलिए चुना गया था कि ट्रेन का अगला हिस्सा बुलेट की तरह था। हालांकि, 1 अक्टूबर 1964 की सुबह राजधानी टोक्यो रेलवे स्टेशन से निकलने वाली पहली बुलेट ट्रेन जब ओसाका शहर की ओर दौड़ने लगी तब उसमें बैठे 1500 यात्रियों को ट्रेन के नाम की सटीकता के बारे में कोई संदेह न रहा। मुसाफ़िर स्पीड का अनुभव कर सके इसलिए हर डायनिंग कार में स्पीडोमीटर फिट किये थे। डायल कांटा जैसे ही 210 किलो-मीटर के आंकड़े को छुआ की पूरी ट्रेन हर्षोंन्नाद से गूंज उठी । ठीक उसी समय ट्रेनक मुख्य ड्रायवर कार में आया । उसकी वहां रही उसकी हाजरी ने साबित कर दिया कि कॉकपिट में उसकी अनुपस्थिति होने के बावजूद कम्प्यूटर से ट्रेन अपने आप संचालित हो रही था ! इस पहले यात्री के बाद जापान की बुलेट ट्रेन पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गई ।

बुलेट ट्रेन का आधुनिक मोडल

जापान एक बहुत ही घनी आबादी वाला देश है, इसलिए वहाँ परिवहन के मुख्य साधन के रूप में विमानों को नियोजित करना यह आर्थिक रूप से व्यवहारु नहीं है। रेलवे ही ज़्यादा सुविधाजनक बन सकती है क्योंकि प्रत्येक खेप में हर बार हजार-पंद्रह सो लोगो को समा सकते हैं । टोक्यो, हिरोशिमा, ओसाका, क्योटो, योकोथामा आदि जैसे प्रमुख शहरों में ही देश की आधी से ज़्यादा आबादी केंद्रित हुई है । ये शहर आपस लंबी दूरी पर नहीं , उनके बीच यात्री विमानों के लिए
उड़ना ठीक नहीं है। इन परिस्थितियों में बुलेट ट्रेन का आगमन हुआ उससे पहले जापान के रेलवे एक दिन में 15,000 यात्रियों की हेरफेर करता था । ट्रेनें साल में कुल साढ़े छह अरब यात्रियों की हेरफेर करने के बावजूद घनी आबादी के लिए सिर्फ ट्रेन व्यवहार काफी नहीं था। भीड़ वाली ट्रेन इस तरह की थी किजिनके दरवाजे ठीक से बंद न हो तब तक ट्रेन चल नही सकती थी । गिर्दी के कसरत दरवाजे आधे खुले रह जाते थे । परिणाम स्वरूप जापान के रेलवे डिपार्टमेंट को दरवाजो को बंद करने के लिये ‘ धक्केबाजो ‘ को रखना पड़ा ।


बिछाने के लिए प्रतिकूल थे, इसलिए इंजीनियरों ने कई रेलवे लाइन पुलों का निर्माण किया । ओशिनिया-सान नाम से जाने जाते वे सब वर्दी धारि हर दरवाजे पर खड़ा रहके सभी यात्रियों को अंदर धकेल देते तब जाकर ट्रेन रवाना होती !

इन परिस्थितियों में जापान के लिए ऐसी सुपरफास्ट ट्रेनो की आवश्यकता पड़ी जो हजारों यात्रियों को कम समय में अपने गंतव्य तक पहुंचा दे । बुलेट ट्रेन अनिवार्य बन गई । बुलेट ट्रेन परियोजना की शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी। बैंडेज जब बिछाने शुरू हुए तो उस छोटे से द्वीप पर खुली जगह कहि नही दिख रही थी । जगह जगह पर नदियाँ और पहाड़ियाँ भी मुश्किल खड़ी कर रहे थे । इसलिए इंजीनियरों ने कुल मिलाकर 790 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन तो पुल और सुरंग खोदनी पड़ी । जिसमें से एक सुरंग 22.2 किलोमीटर लंबी थी ।

छोटे से द्वीप जापान की भौगोलिक पटरियों के लिए प्रतिकूल थी इसलिए इजनीरो ने ज्यादातर रेलवे लाइन पुल बांधकर बनाई

जापान में हर साल 5,000 छोटे और बड़े भूकंप आते हैं , इसलिए जमीन लगभग हर दिन हिलती है। बुलेट ट्रेन तेज रफ्तार से चल रही हो और कुछ ही दूरी पर अगर भूकंप से पटरी अस्तव्यस्त हो जाये तो ट्रेन को रुकने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं मिल सकता है। इसलिए एक निश्चित दूरी पर सीस्मोमीटर की एक श्रृंखला की व्यवस्था की गई । प्रत्येक मशीन पटरी से कम से कम चालीस किलोमीटर दूर थी; यानी भूकंप की लहरें रेलवे लाइन तक पहुंचने से पहले हैं ही सीस्मोमीटर में उनकी उपस्थिति पकड़ी ली जाती थी। एक विशेष प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक सर्किट के साथ प्रत्येक मशीन का कनेक्शन तरंगों की तीव्रता के अनुसार बुलेट ट्रेन की शक्ति आपूर्ति या तो कम या पूरी तरह से बंद कर देती थी ।


इसके अलावा जापानी राष्ट्रीय रेलवे के इंजीनियर हर दिन रात में फिर से पूरी रेलवे लाइन पर घूमकर पटरी की सीध की जाँच का कार्य करते थे। भूकंप कहीं पर यदि अलाइमेन्ट बिगाड़ दिया हो तो उसे फिर से सही कर दिया जाता था । सर्दियों में बर्फ की परत के नीचे बुलेट ट्रेन की पटरी पूरी लाइन पर बर्फ को पिघला ने के लिए ख़ास व्यवस्था की गई थी । बर्फबारी शुरू होते ही कुछ मशीनें तुरंत गर्म पानी से पट्टी का अभिषेक करना शरू कर देती थी । ऐसे यंत्र पटरी पर कुछ फिट के अंतर पर बैठाए गए थे ।

इन सभी व्यवस्था के कारण बुलेट ट्रेन की पटरियाँ बिछाना प्रति किलोमीटर लभग 3 करोड़ डॉलर खर्च हुआ । खर्च करने और पटरियों की पर्याप्त देखभाल करने के बावजूद ट्रेन नाम के मुताबिक तेजी से नहीं चली थी। एक इंजीनियरिंग समस्या आ रही थी। ट्रेन के प्रत्येक एक्सल की चार धुरियां थी । जिसमे 185 किलोवाट की एक इलेक्ट्रिक मोटर का कनेक्शन किया गया था। प्रत्येक ट्रेन में 16 कोच होते हैं, जिसका मतलब है कुल 64 इलेक्ट्रिक मोटर बुलेट ट्रेन को जोरदार धक्का देती थी । घनी आबादी वाले जापान में गलियारे के दोनों ओर रहने वाले लोग इसलिए राक्षसी मोटर्स का ये ऑर्केस्ट्रा बहुत ही शोरगुल करने वाला साबित हुआ । बुलेट ट्रेन तो जैसे खुद भूकंप की तीव्रता को बढ़ाती थी । उसकी धमधमाट दूर तक लोगो को परेशान करने लगी । हरदिन 275 ट्रेन ऐसी आवाज करेगी तो सीधी बात है लोगो के लिए सही बात नही थी । इसलिए जापानी राष्ट्रीय रेलवे पर प्रत्येक ट्रेन की गति मूल गति से 2/3 तक कम कर दिया । प्रौद्योगिकीय तथ्य यह है कि बुलेट ट्रेन पानी की तरह बह सके ऐसी कोई इंजीनियरिंग कमल इसमें नहीं था। 1 अक्टूबर, 1964 के दिन, उन्होंने 512 किमी लंबी टोक्यो-ओसाका लाइन पर पहली बार 6 घंटे और 30 मिनट का प्रवास समय सिर्फ 3 घंटे और 10 मिनट में खत्म कर दिया दुनिया को हैरानी हुई । लेकिन 11,840 किलोवाट बिजली खाने के बाद भी उस ट्रेन के पास विमान से बराबरी करने के लिए शक्ति नहीं थी । आज तक ​​ जापान की सरेराश बुलेट ट्रेन भी तीन सौ किलोमीटर की औसत तेजी से नहीं चल सकती ।

पहली बुलेट ट्रेन के बाद चालीस साल बीत गए। फिर भी जापान पटरी पर दौड़ने वाली ट्रेन को विमान जितनी तेजी से दौड़ाने के लिए असफल ही रहा । दूसरी ओर यह काम फ्रांस ने वह काम दो दशक पहले कर दिखाया । फ्रांस की TGV कहि जानी वाली ट्रेन उसकी असाधारण स्पीड के लिए बुलेट ट्रेन से अधिक प्रसिद्ध है । 1981 में राजधानी पेरिस और लियो शहर के बीच उसकी पहली यात्रा के बाद, उनकी यात्रा की गति धीरे-धीरे बढ़ गई । परिणामस्वरूप पहले दोनों शहरों के बीच हवाई यात्रा करनेवाले यात्री अब TGV टिकट खरीदना पसंद करते है। पेरिस और लियो के बीच की दूरी 215 किलोमीटर है । सामान्य ट्रेनों को निर्धारित होने में लगभग साढ़े चार घंटे लगते हैं । TGV के आने के बाद यह समय सिर्फ दो घंटे हो गया हैं। दोनों छोर पर एयरपोर्ट पर धक्का खाने , भोजन करने , सुरक्षा जांच और प्लेन टेक-ऑफ और लेंडिंग में बीतते समय को भी ध्यान में ले तो टीजीवी ट्रेन विमान से तेजी से साबित होती थी ।

TGV ट्रेन जिसने विमान और रेलवे के बिच का फासला ही मिटा दिया

प्लेन और ट्रेन में क्या अंतर है? बुनियादी दो मुख्य अंतरों में से पहला यह है कि विमान आकाश उड़ता है जबकि ट्रेन जमीन पर चलती है। दूसरा यह कि यात्रियों को विमान घंटे या मिनट के भीतर मुकाम तक पहुंचा डेटॉ है जब की ट्रेन कभी-कभी दिन भी लगा देती है । दोनों अंतर को टीजीवी ट्रेन की तेजी जे लगभग मिटा दिया है । यह सुपरफास्ट ट्रेन पहली है यात्रा के दौरान 270 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ी तब लाखों टेलीविज़न दर्शक उसकी तेजी को देखकर ताजुब्ब हो गए थे । TGV केऑपरेटरों ने दावा किया कि ट्रेन का स्पीडोमीटर का कांटा 400 किलोमीटर के अंक को भी छू सकता है ,लेकिन ज्यादा घात पहुँचना ठीक नही । फिर भी 270 किलोमीटर की स्पीड भी कम नही कहि जा सकती । मुंबई-टू-अहमदाबाद का बिना रुके प्रवास आप इसे TGV में करते हैं, तो आप 2 घंटे से कम समय में वहां पहुंच जाएंगे । वही प्रवास गुजरात एक्सप्रेस में करे तो पूरा दिन लग जायेगा ।

तकनीकी रूप से टी.जी.वी ट्रेन के सामने जापान की प्रसिद्ध बुलेट ट्रेन का भी कोई ‘क्लास’ नहीं रहा । बुलेट ट्रेन (जापानी भाषा मे शिंकानसेन) 315 प्रति घंटे की स्पीड से चल सकती थी लेकिन यह रफ्तार से वह हर दिन प्रवास नही करती थी । शरुआत में 210 किलोमीटर की गति से लगातार चलती थी । बुलेट ट्रेन की अधिकतम गति 315 किमी प्रति घंटा की स्पीड को स्वीकार कर ले तब भी TGV के वेग का रिकॉर्ड-ब्रेकिंग अंक 515.3 किलोमीटर है । 18 मई, 1990 के दिन TGv ट्रेन कुछ मिनट के लिए ही इतनी तेजी से दौड़ी थी। टीजीवी ऐसी गति प्राप्त कर सकी उस के दो कारण थे: पहला शोध कार्य जो लगभग 24 साल तक चला था । फ्रांस सरकार ने सुपरफास्ट ट्रेन परियोजना सफल बनाने के लिए डेढ़ अरब डॉलर का खर्च किया था। इस असाधारण ट्रेन की परियोजना वहां की सरकार के लिए बहुत बड़ी है । फ्रांसीसी इंजीनियरों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था । उन्होंने वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग बाधाओ को दूर करना पड़ा था । टेक्नोलॉजी की मदद से उसे दूर करने के लिए बहुत संशोधन करना पड़ा। एक समस्या ड्रेग से संबंधित थी । चलती गाड़ी में जमीनी स्तर पर संघनित हवा का अवरोध उसे तेज़ी से चलने नही देता। हवा का अदृश्य विपरीत दिशा का दबाव ट्रेन को अदृश्य ब्रेक से मारता है । हवा की दीवार ट्रेन को तेज रफ्तार से आगे बढ़ने से रोकती है । ट्रेन के पीछे बना वैक्यूम इसे पीछे की ओर खींचता है। यह तनाव के परिणामस्वरूप ट्रेन को खींच ने के और इंजिन द्वारा धक्का देने में लगेने वाली ताकत के कारण आखिर में ड्रेग पैदा हो जाता है । जिसका सामना करने के लिए उच्च वाहन जैसे बस और ट्रक के आगे के हिस्सो को 40 % जितना डीजल का बर्बाद करना पड़ता है। ड्रैग के समीकरण बहुत ही जालिम है। वाहन की गति बढ़ने पर ड्रेग की गति वर्ग द्वारा गुणा हो जाती है । गति 8 किलोमीटर बढ़ाने पर ड्रेग का अंक 64 का बनता है । दूसरी समस्या यह कि ईंधन का सप्लाय न बढाये तो वाहन को स्पीड नही मिलती। मोटरकार काटो समझ मे आता है लेकिन ट्रेन का हिसाब पावर जहां 200-300 किलोमीटर में गिना जाता है वहां आपूर्ति बढ़ाने के लिए किस हद तक पावर सप्लाय दे ? कुछ हद तक फिर ट्रेन तक सुपरस्पीड पर चलाने का कोई वित्तीय लाभ नहीं है।

टीजीवी का एरोडायनामिक आगे का हिस्सा

ये दुष्चक्र फ्रेंच TGV पर भी लागू होता है । फिर भी किफायती गति सीमा को बढ़ाने के लिए बहुत सारी तकनीकों का उपयोग किया गया है । पहला यह है कि इस ट्रेन का अगला हिस्सा एरोडायनामिक बनाया है । विंड सुरंग में हवा का प्रवाह को छोड़कर उन्होंने सबसे अच्छा आकार तय किया है, जिसे सामने की हवा तीर की तरह कटती है। वास्तव में काटती नही उसकी आस पास से निकल जाती है । T.G.V. जब चलती है तब हवा भले स्थिर हो लेकिन लगातार 380 किलोमीटर की तेज रफ्तार ट्रेन के संदर्भ में हवा की गति भी पूरे 380 किलोमीटर की ही गिनी जाती है । टीजीवी को बवंडर जैसा हवा के थपेड़े ट्रेन को लगते है । जिसमें से इंजन के त्रिकोणीय अगला हिस्सा अपना मार्ग बड़ी आसानी से अपना मार्ग कर लेता है । इसके अलावा ट्रेन की बाहरी सतह को भी बूत साफ रखा जाता है ताकि मेल पपड़ी घर्षण का कारण न बने ।

जैसा कि पहले बताया गया है कि सुपरफास्ट गति में ट्रेन दूसरा प्रश्न उसका ट्रैक है । जो जबरदस्त कैनेटीक्स का सामना नहीं कर सकते है। जब भी कोई मोड़ आता है तो ट्रेन हमेशा एक सीधी रेखा में आगे बढ़ना चाहती है । ट्रेन खुद झुकती है, इसलिए जिस ओर मोड़ होता है उसकी विपरीत दिशा की पटरी को एक इंच तक ऊँचा रखा जाता है । सौभाग्य से पेरिस और लियो एकदूसरे के बिल्कुल सीधी दिशा में है । फिर भी ताकत के लिए हर मीटर 60 किलोग्राम वजनी भारी वजन वाले हेवी पटरी बिछाई गई है । और तो और बीच के फिशप्लेट से उनको जोड़ने के बदले वेल्डे किये गए है। वेल्डिंग भी एक सामान्य प्रकार नहीं। जिस तरह से दो पटरी पूरी तरह से एक ही हो इस तरह का वेल्ड बनाने के लिए 3 kHz के विद्युत प्रवाह के साथ पट्टी का ठोस स्टील गर्म करने के बाद उन्हें जोड़ा जाता है। इस तरह उनको एक पटरी का रूप दिया गया है । तेज रफ्तार से जब TGV पटरी पर चलती है तब पैदा होने वाली कंपन के कारण पटरी को स्लीपर के साथ मजबूती से जोड़ने वाले बोल्ट भी खुलने लगते हैं । पटरी पर की रोज का आवागमन बोल्ट को ढीला कर देता है – और आख़िर में स्लीपर की पकड़ ढीली हो जाती है। यह फ्रांसीसी इंजीनियरों की ताकत को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक बोल्ट के नीचे 5 मिमी रबर एक मोटा आवरण रखा था । कई झटके वह रबर अवशोषित कर लेता हैं, अर्थात बोल्ट का कंपन का विशेष प्रभाव नहीं होता है।

अधिकतम गति प्राप्त करने के लिए और पटरी को लगने वाले आघात को कम करने के लिए इंजीनियरो ने ट्रेन की संरचना को काफी हल्का बनाया है । जापान के टेक्नीशियन बुलेट ट्रेन को आकार के अनुपात में उतना हल्का नहीं कर सके । लेकिन फ्रेंच इंजीनियरों ने कुल 200 मीटर लंबा टीजीवी का वजन 5 टन से अधिक नही बढ़ने दिया । पहले तो वे वजन कम करने से पहले ट्रेन के पूरे ढांचे को एल्यूमीनियम से बनाना चाहते थे, लेकिन स्पीड के दौरान उत्पन्न होने वाली कंपन एल्यूमीनियम शायद सह न सके इसलिए उन्होंने ठोस स्टील का उपयोग करना पड़ा । विशेष एल्यूमीनियम से ढांचा बनाते तब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन ट्रेन की बोगी के लिए यह धातु खतरनाक साबित हो सकती थी । क्योंकि पूरी गति से चलने वाली ट्रेन की संरचना में झटके कभी समान रूप से नहीं फैलते। झटके की संख्या अलग होती है।

यह बहुत खतरनाक स्थिति है। रोजमर्रा की जिंदगी का अनुभव भी इस खतरे को समझने के लिए पर्याप्त है। हाथ में से नीचे गिरने वाला कांच का कप पहली बार मे शायद नही टूटता । आघात की समान कंपन की लहरें कम्पन सहन कर लेता है। लेकिन दूसरी बार कप गिरने पर कप टूट जाता है । क्योंकि इस बार उत्पन्न हुए कंपन की संख्या भिन्न होने के कारण शीशा चकनाचूर हो जाता है । पूर्ण गति से चलती ट्रेन के लिए भी वही भौतिकी नियम लागू होते है। बोगी के आगे और पीछे के हिस्से में झनझनाहट कंपन की संख्या बहुत भिन्न होती है, अर्थात संरचना की धातु काफी हद तक यह ‘मुड़’ जाता है। टीजीवी की संरचना में कमी रखने के बदले ट्रेन के वजन में कटौती करने के लिए फ्रांसीसी तकनीशियनों ने केवल दो इंजन और 8 कोच रख दिए। दूसरी ओर 490 kW इलेक्ट्रिक मोटर्स में टेक्नोलॉजी के संभव हो सके उतने हिरे जड़े है । इसके टॉप गियर में प्रत्येक मोटर 3 मिनट पर, 3000 बार घूमता है। ऊर्जा का उच्च उत्पादन देने वाली मोटर का वजन केवल 300 किलोग्राम है। इस कार्यक्षम मोटर का डिज़ाइन भी तकनीकी है। लियो और पेरिस के बीच लागतार बिजली का सप्लाय की ट्रेन को जरूरत नही । ढलान आने पर बिजली की आपूर्ति अपने आप कट जाती है और जहां थोड़ी सी चढ़ाई होती है वहां बिजली की आपूर्ति बढ़ जाती है । इन दोनों शहरों के बीच अलग अलग 128 किलोमीटर का अंतर तो TGV के इंजन ‘स्विच ऑफ’ कंडीशन में ही काट लेता है

ट्रेन जहा ढलान पर सरकती हो वहा विद्युत मोटर ऑटोमेटिक ऑफ़ हो जाती है इसलिए पावर सेविंग के नाम पर अच्छी खासी बचत हो जाती है

1.5 बिलियन डॉलर की लागत से कुल 87 ट्रेनों का निर्माण किया गया है । जो विभिन्न शहरों के बीच चलती है। प्रोजेक्ट के पीछे खर्च किये पैसे निकालने के लिए और रेलवे नेटवर्क के रखरखाव के पीछे लागत को कवर करने के लिए टिकट की कीमतें थोड़ी अधिक है । फिर भी टीजीवी का प्रवास विमान यात्रा से सस्ता है । हर साल 3 करोड़ लोग इस ट्रेन का इस्तेमाल करते है । पेरिस-लियो के बीच विमान सेवाअब बस नाम मात्र की ही चलता है। जहां तक ​​फ्रांस की बात है प्लेन और ट्रेन में कोई अंतर नहीं रह गया। दुनिया केअन्य देशों इस तरह अंतर खत्म करने के लिए उत्सुक है । इसलिए उन्होंने टीजीवी ट्रेनों के लिए फ्रांस को ऑर्डर दिए है । स्पेन, ब्रिटेन, इटली, बेल्जियम, नीदरलैंड,जर्मनी और कोरिया जैसे देश फ्रेंच TGV तकनीक का इस्तेमाल करते हैं । प्लेन का सामना करने वाली ट्रेनों को चलाने की तकनीकी संघर्ष में भारत का स्थान तो कहीं भी नहीं । अमेरिका भी ठीक ठाक पीछे रहा है। केवल जर्मनी, फ्रांस और जापान में ही ट्रेन को तेज बनाने के प्रयास चल रहे है और उसके लिए भारी भरखम बजट भी बन रहै है। ऐसी परिस्थितियों में हमारी शताब्दी एक्सप्रेस 150 किमी प्रति घंटे की गति प्राप्त करें तो भी वाह भैया वाह कहना होगा !

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