हॉप डायमंड ; गोलकोंडा का इतिहास में बदनाम  नामचीन हीरा

हॉप डायमंड ; गोलकोंडा का इतिहास में बदनाम नामचीन हीरा

हॉप डायमंड ; गोलकोंडा का इतिहास में बदनाम नामचीन हीरा

तो हुआ यूं कि डायमंड किंग के नाम से जाने जाते हेरि विंस्टन नाम के अमरीकी झवेरी ने नीलम जैसे दिखते 45.5 कैरेट के डार्क ब्ल्यू हीरे का पोस्ट बनाया। जरा दिल थाम के बैठिये क्योंकि इस बंदे ने इस पोस्ट पार्सल का 10,00,000 $ का इंश्योरेंस लिया । इतना ही नही 12.5 डाक टिकट को इंश्योरेंस प्रीमियम चार्ज के रूप में भी दिया । साथ ही 2.44$ की टिकट पोस्टल चार्ज के रूप में मुहर लगाई गई और फिर उस पार्सल को उपहार के रूप में वाशिंगटन के स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन को भेजा दिया । होप डायमंड नाम के हिरे की लगभग 200 साल पुरानी कहानी का वह अंत था । दिन था नवम्बर 10 , 1958 का ! पोस्ट पार्सल भेजने के बाद, हैरी विंस्टन ने एक मित्र से कहा: “मैं हीरे के अभिशाप में विश्वास नहीं करता, लेकिन अब मुझे राहत मिली है।”

विंस्टन की जो भी मान्यताएं थीं । अन्य कई लोग उस हिरे को पनौती मानते थे। खूनी कोहिनूर की तरह होप हीरा भी दक्षिण भारत की गोलकुंडा की खान का उत्पाद था, जहाँ दरिया-ए-नूर, द ग्रेट मोगुल, रीजेंट, जे क्यूब आदि जैसे तीस बेमून हीरे मील चुके थे । ये सब 19 वीं और 19 वीं शताब्दी के बीच मीले थे। दुनिया में सबसे ज्यादा जिस हीरे देने वाली खदान उस समय गोलकुंडा थी , भारत की ! सब मिलाकर 6 खदान थी। सभी होरो से समृध्द थी । उसका कारण यह कि प्रागैतिहासिक कालांतर में पृथ्वी के आंतरिक मेंटल और भूगर्भीय उथल-पुथल के बाद विस्फोट हुए तब रसातल में दबे हीरे ऊपरी सतह पर आ गए। कृष्णा-गोदावरी जलधारा ने चट्टानी इलाके को नष्ट कर दिया । जिसके हीरे और बाहरी सतह के बीच की खाई को चौड़ा किया, जिससे खनन आसान हो गया। सन 1518 में कुतुब शाहीराजवंश के परदेशी आक्रमणकारियों से पहले हिंदू ने गोलकोंडा पर विजय प्राप्त की और वहां खनिकों को काम पर लगाया । राजकुमारों ने कई हीरे निकाले थे। शायद हॉप डायमंड भी उसमे शामिल था । 112 कैरेट के मूल हीरा गोलकोंडा के राम-सीता मंदिर में श्री राम की मूर्ति में प्रयुक्त किया गया था।

मंदिर में हीरा कब तक सुरक्षित रहा है तो राम जाने लेकिन कीमती रत्नों का फ्रेंच सौदागर जिया बाप्तिस्त तावरर्निय गोलकुंडा केके बारे लालची खबरे सुनकर सन 1645 में वहां पर पहुंचकर तब उसने वहां पर वह हीरा देखा ।

एक ऐतिहासिक नोंध के मुताबिक एक चोर ने उसे वह हीरा दिया । जबकि दूसररई ऐतिहासिक नॉट के अनुसार तावर्निय ने मंदिर के पुजारी का धन देकर हीरे की चोरी कराई थी । जो भी हो लेकिन बेशकीमती हीरा बहुत कम समय के बाद भारत की सीमा से बाहर निकल गया था । मंदिर की प्रतिमा की मर्यादा भंग होने से जऐसे अशुभ बन गया हो बन गया हो इस तरह आफत भरी घटनाये बनने लगी। वह भी अचानक से ! संकट का पहला भोग बना बेशक तावर्निय ! वह हीरे का कोई सही क़ीमत दे सके ऐसे धनवान ग्राहक को ढूंढने लिए वह फ्रांस और और पड़ोसी देश बेल्जियम में बहुत भटका । लेकिन आखिर में उसने फ्रांस के राजा लुइ 14 को वह हीरा दिखाया और ने उसे दिखाया उसके साथ सौदा किया । गोलकुंडा के दूसरे बड़े हीरे भी उसने लुई 14 को बेचे। उसके बदले में उसे बहुत सारा धन मिला । ज्यादा पैसो की लालच में वह फिर से गोलकोंडा के हिरे पाने के लिए निकल पड़ा । जहां रास्ते में उसे बाघ ने खा लिया ।

इस तरफ लुई 14 ने उस हीरो को ज्यादा घाट देने के लिए सोनार से उसे कटवाया । जिससके कारण वह हीरा सिर्फ 45 कैरेट का रह रह गया लेकिन उसकी रोनक असाधारण रूप से बढ़ गई । फ्रांस की गद्दी पर 72 वर्ष तक राज करने वाले और अमेरिका का तमाम मिसिपीसी प्रदेश फ्रांस के लिए जीतने वाले और खुद ही नाम के आधार पर लुसियाना जाहिर करने वाले लुई को यह पनौती हीरा दो तरह से मुश्किल साबित करने वाला साबित हुआ । आपखुदी , भ्रष्टाचार और शोषण खोरी के कारण लुई 14 इतनी हद तक वह तिरस्कृत हुआ कि 1712 में पेरिस की सैंट डेनिस एक चर्च पर धूल भरे रास्ते से निकली हुई उसकी स्पेशल यात्रा में महल के सिर्फ नौकर शामिल हुए थे । लुई ने जीता हुआ मिसीपीसी का प्रदेश उसके बाद फ्रांस ने सिर्फ $ 1.5 करोड में अमेरिका को देना पड़ा । एक तिहाई अमरीका के राज्यों का गठन सिर्फ़ फ्रेंच प्रदेश से हुआ । लुई 14 के अनुगामी लुई 15 की बात करें तो उसके शासनकाल के दौरान फ्रांस नके अफ्रीका में कनाडा में और भारत में अपने कब्जे में रहे बहुत सारे प्रदेश गवा दिए। दरबारीयो ने लुई 15 की ज्यादातर सत्ता वापस खींच ली ।

राज्य की तिजोरी में पड़ा तावर्निय का हीरा कुछ साल बाद लुई 16 की घमंडी रानी मेरी एंतोइनेत के नेकलेस में डाल दिया गया । तब पहली बार इसकी गूढ़ असरों की कल्पना रंगीन बाते होने लगी । आपखुद राजाशाही के सामने ऐतिहासिक फ्रेंच क्रांति की चिंगारी उसी समय भड़की ! उसी प्रजाविमुख राजा की तरह मीनारे में रहती नासमझ रानी ने यह कहकर पूरा मामला बिचकाया की भूखे मरते लोगो के पास अगर खाने के लिए ब्रेड नहीं है तो केक से काम क्यों नही चलाते । घाव पर नमक छिड़कने जैसा यह काम था । जिसने पूरी प्रजा का आक्रोश बढ़ा दिया । और राजाशाही की जड़े खींचने के लिए लोग हिंसक आंदोलन पर चढ़ गए ।

क्रांति की ज्वाला देशभर में फैलने लगी तब राजाशाही प्रथा वाले ऑस्ट्रिया और प्रशिया जैसे देशों ने फ्रांस को प्रजासत्ताक बनता रोकने के लिए लुई की सहायता के लिए सेना भेजी लेकिन लोकतंत्र में जुड़े हुए सैनिकों ने उन्हें पेरिस तक पहुंचने ही नहीं दिया । उस दौरान प्रजा का दिनप्रति दिन बढ़ता आक्रोश देख कर राजा और रानी ने जून 20 , 1971 की रात भेष बदलकर रात्रि में तांगे में बैठ कर चले गए । अगर विशि में नही रुकते तो उनके बेतुके चाल ढंग देखकर उस विशि का मालिक उन्हें पहचानता नही और सहीसलामत वहां से निकल जाते लेकिन उनका भांडा फुट गया । राजा रानी को कैद करके पेरिस लाये गए। जहां पर उन पर कस चलाया गया। जो कि औपचारिक ही था क्योंकि मृत्यु दंड के सिवा दूसरा दंड को क्रांतिकारियों को मंजूर ही नही था । जनवरी 21 , 1793 के दिन लुई 16 और उसके बाद अक्टूबर 16 , 1793 के दिन रानी को जाहिर में शिरच्छेद कर दिया। राजशाही को मिटाने के बाद नया प्रजासत्ताक शासन स्थापित हुआ । सेनापति नेपोलियन बोनापार्ट के लिए सत्ता का मार्ग खुल गया ।

यह नहीं कहा जा सकता है कि तावर्निय के हीरे ने फ्रांस के इतिहास को बदल दिया लेकिन समय के साथ इस घटना को हीरे के कथित प्रभावों से जोड़ दिया गया ।इस हीरे हिरे का मालिक का अहित होने का पहला अंकुर फ्रांसीसी क्रांति के दौरान फूटा । लुई मेरी का शिरच्छेद हुआ उससे पहले हार सहित उसके सभी शाही आभूषणों को जब्त कर लिया गया था। बाद में उनको पेरिस के एक संग्रहालय में भेज दिया गया । लेकिन वहां ये सब सुरक्षित नहीं था। एक दिन दंगा भड़क गया और सैनिकों ने संग्रहालय पर धावा बोल दिया जिसमे और गहने चुरा लिए गए।

फिर हीरे के लिए कई साल गुमनामी में बीत गए । इतिहास के पन्नों पर इसका कोई संकेत हालांकि आधिकारिक तौर पर पंजीकृत नहीं हुआ है । लेकिन व्यापक अटकलें हैं कि तस्कर सैनिकों के बीच शाही गहने बांटने के बाद यह हीरा ग्यूलो नामक एक फ्रांसीसी सैनिक के पास गया । फ्रांस की नई सरकार देश भर में शाही आभूषण चोरों की खोज कर रही थी, इसलिए अंग्रेजी खाड़ी के फ्रांसीसी तट पर ले हार्व शहर में कुछ समय तक छिपने के बाद ग्यूलो ने खाड़ी को पार करके इंग्लैंड चला गया ।

चोरी के हीरों की अशुभ घटनाये उसके बाद होती रही। इंग्लैंड में रहकर गुजर बसेरा करने में संघर्ष कर रहे ग्यूलो ने इस हीरे को 19 वीं शताब्दी में जेम्स फॉक्स नाम के एक अंग्रेज जौहरी को सस्ते में बेचकर कुछ पैसे कमाए । लेकिन बाद में वह फ्रेंच होने की खबर होते ही उसे अंग्रेजो ने पंद्रह साल के लिए जेल में डाला दिया गया । दूसरी ओर जेम्स फॉक्स की मालिकी का बने हिरे को उसी के बेटे ने चोरी कर लिया और फ्रांसिस नाम के दूसरे जौहरी को बेच दिया । थोड़े समय बाद उसने आत्महत्या कर ली । कुछ वर्षों बाद फ्रांसिस ने उस हिरे को सितम्बर 1812 में प्रसिद्ध अंग्रेजी हीरा व्यापारी डैनियल एलसन को बेच दिया लेकिन वे पैसा बनाने के लिए जीवित नहीं थे। सौदे के बाद तीसरी सुबह एलसन उनसे मिलने गए तो फ्रांसिस बिस्तर में मृत पड़े थे। इन सभी अवसरों (और बाद की घटनाओं) में वह हॉप हीरा को एक स्वादिष्ट किंवदंती में लंबे समय तक रहस्यमय पात्र के रूप में सब के साथ था।

एक विशिष्ट नाम के बिना वह हीरा होप डायमंड के नाम से उस समय से जाना गया जब 1830 में डैनियल एल्सेन से करोड़पति अंग्रेजी बैंकर हेनरी फिलिप के साथ 15,000 $ के लिए इसका सौदा किया। हीरे का भूतकाल कलुषित था फिर भी हेनरी ने होप को खरीदा । क्योंकि वह ऐसे अंधविश्वास में कोई विश्वास नहीं था । इसलिए उसने इस हीरे को अपने नाम हेनरी हॉप के नाम से हिरे को हॉप नाम दिया। हॉप ने दूसरे कम कैरेट के हीरे खरीदे और उसका एक शानदार हार बना दिया।


सन 1839 में होप की मृत्यु के बाद यह हीरा उसके भतीजे से विरासत में मिला, जिसने इसे अपने प्रिय पोते, फ्रांसिस होप को दे दिया। कई साल बिना किसी घटना के बीते। यदि घटनाओं के अशुभ अनुक्रम के टूटने के बाद स्थिति बनी रहती थी, तो लोग कोहिनूर से दूसरे दर्जे के नायक के रूप में आधे वजन वाले हॉप को भूल जाते लेकिन लंबे अंतराल के बाद, अधूरा क्रम आगे भी जारी रहा। फ्रांसिस होप परिवार के स्वामित्व वाले बैंक दिवालिया हो गए और कर्जदार फ्रांसिस होप डायमंड को सिर्फ-29000 $ में बेचना पड़ा।

हिरे को खरीदने वाला जौहरी जैकी सेलो नाम का एक फ्रांसीसी था । जिसने अपना संतुलन खोने के बाद आत्महत्या कर ली । ज़ारिस्ट रूस के प्रिंस कैनिटोलकी तब होप डायमंड के नए मालिक बने। उन्होंने एक फ्रांसीसी अभिनेत्री को हीरे का हार इस्तेमाल करने के लिए दिया। अभिनेत्री बाद में अपनी पिस्तौल का शिकार हो गई, जबकि कैनिकोली खुद रूसी आंदोलनकारी किसानों के जख्मी घांव लेकर मर गया था। उसके बाद हमीद बे नाम के डायमंड व्यापारी ने उसे खरीदा वह भी जिब्राल्टर के तट से समुद्र में डूबने के बाद उसकी भी मौत हो गई । कुछ साल बाद हीरे का स्वामित्व फिर से बदला।

इस हीरे के नए मालिक तुर्की के सुल्तान अब्दुल हमीद (दूसरा) था उन्होंने एक पेरिस डायमंड ज्वैलरी मार्केट में नीलाम होप डायमंड के लिए 90,000 पाउंड का भुगतान किया और फिर अपनी बेगम सुबेया को पहनने के लिए हीरे का हार दिया। अत्यधिक, क्रूर और आलसी
अब्दुल हामिद के शासन के तहत तुर्क शासन खोखला हो चुका था । युवा तुर्कों ने देश में तख्तापलट करने के लिए आंदोलन शुरू किया और महल में गुप्त षड्यंत्र रचने लगे । बेगम सुबैया भी शामिल है ऐसी शंका होते ही अब्दुल हमीद ने उसका सिर कलम करवा दिया। पेरिस के समाचार पत्रों ने उनकी तुलना मैरी एंतोइनेत की और डायमंड हॉप को समाचारों में चमकाया । हीरा सही मायनों में पनौती है ऐसा मानकर हामिद ने उसे एक सीलबंद डिब्बे में रख दिया और चुपके से अपने विश्वसनीय दरबारी के माध्यम से इसे बिक्री के लिए पेरिस भेज दिया । लेकिन उस तरह से छूटने के बाद भी हमीद की दुर्दशा नही बदली। 27 अप्रैल, 1909 को युवा तुर्क ने हटा दिया और वह मरा तब तक बोस्फोरस की सामुद्रिधुनि के किनारे छोटे से महल में नजरकैद रखा गया । ओटोमन साम्राज्य के पांच सौ साल पुराने इतिहास का वही पर अंत हुआ।

तुर्की के शाही खजाने के हॉप डायमंड पेरिस में से जिसने बहुत कम दाम पर पाया वह खरीददार ख्यातनाम झवेरी पिअर कार्तिये था। झवेरी की नजर में कोई भी हीरा कभी भी पनौती नहीं हो सकता। फिर भी वह हॉप का सौदा करके नकद पैसा कमालेना चाहता था। अनुकूल मौका उसे सन 1911 में एक अनुकूल अवसर मिला, जब अमेरिकी करोड़पति एडवर्ड मैकलीन पेरिस गए। (एडवर्ड लाखों लोगों के संचलन वाले वाशिंगटन पोस्ट का वह मालिक था।) पेरिस के ब्रिस्टल होटल में, पियरे कार्टियर दो आमने-सामने मिले और उन्हें होप डायमंड से जड़ा हार दिखाया। एवलिन को भूरा हीरा पसंद था, लेकिन उसकी सेटिंग उसे पसंद नही आया। शायद इसलिए कि वह हार नहीं पहनना चाहती थी जो उसने पहले इस्तेमाल किया था। कार्टिये उसका इरादा जान गया और ने उसने सौदा करने के लिए बिना मतलब दबाव करने से अच्छा वहां से विदा हो गया । हिरे की भारी क़ीमत को देखते हुए खरीददार शायद नहीं मिलेगा यह सोचकर उसने अपने बाहोश कारीगर के पास हार तुड़वाया । हॉप डायमंड सहित हीरे को उकेर दिया, और अलग हुए हीरो से तीन नए डायमंड एंकरों के साथ एक अलग सेटिंग का नेकलेस बनवाया । जिसमे हॉप डायमंड सोलह बड़े हीरे के बीच पेंडेंट के रूप में बिठाया गया।

कुछ महीने बाद, कार्टिय ने फिर से कोशिश की । वह अमेरिका हार के साथ पहुंचा। एडविन मैकलीन की पत्नी एवलिन मैकलीन कोई निर्णय पर आए उससे पहले कार्टिय उन्हें कुछ दिनों के लिए नेकलेस इस्तेमाल करने के लिए कहकर वहा से निकल गया । उच्च मूल्य के हिरे को उसने इवालीन के भरोसे छोड़ दिया था। यह नाटकीय चाल ने कार्टिय के मुताबिक अपना असर दिखा गई । यावलिन ने अपनी आत्मकथा में वर्षों बाद लिखा, ‘ समय-समय पर रात के दौरान जागते हुए मैंने होप डायमंड को हाथ में लिया। यह हीरा शुभ या अशुभ हो सकता है, लेकिन अंत में उसने अपने गले में पहना और अपना भाग्य उसे सौंप दिया। ‘

पियरे कार्टियर ने इस हार के लिए 1,80,000 $ मांगे – और मिल गये एवलिन के पति और ‘द वाशिंगटन पोस्ट अखबार के मालिक एडवर्ड मैकलीन की अपार संपत्ति को देखते हुए यह राशि बड़ी नहीं थी। कोहिनोर जैसे ऐतिहासिक हीरो की तुलना में भले ही होप डायमंड छोटा था, फिर भी उसी कैरेट का एक भूरा हीरा मिलना मुश्किल था। ब्राउन हीरे के लिए एक दुर्लभ रंग है, इसलिए मैकलेन दंपति ने होप डायमंड के बाद प्रसिद्धि प्राप्त की, साथ ही अह्मुनी के संतुष्ट होने की भावना भी रही उसी में सब पैसे वसूल होते रहे।

संयोग से यह दौर लंबा नहीं चला । क्योंकि हॉप हीरे के चारों ओर चल रही अंधविश्वासी किंवदंती बुनाई अभी भी रुकी नहीं थी ।

इवोलीन और एडवर्ड ने सन 1917 में केंटकी स्टेट डब्बी रेस देखने गये थे तब उनका नौ साल का बच्चा विन्सन अंगरक्षकों का ध्यान भटका कर ट्रैफिक वाले रास्ते ओर चला गया जहां तेजी से आने वाली कार ने उसे कुचल दिया। कुछ साल बाद एडवर्ड के ‘वाशिंगटन पोस्ट के समाचार पत्र का प्रसार सरकार समर्थक नीति के कारण घटने लगा । मंदी बिगड़ती वित्तीय स्थिति के कारण उसे ऋण लेना पड़ा । 1930 तक उसका बोझ इतना बढ़ गया कि अदालत ने लेनदारों को मान्य रखकर फडचे की कार्यवाही शरू करने का आदेश दिया । एडवर्ड मैकलीन ने अखबार का स्वामित्व खो दिया दिया। एवलिन को छोड़कर उसने घर छोड़ दिया । नशे की लत हो गई और उसी दशा में अंत में चैरिटी सेनेटोरियम में उसका निधन हो गया।

होप डायमंड को कब्जे में लेने वाले एवलिन भी संकट मुक्त न रह पाई ।अब आय का कोई साधन नहीं था, फिर भी वह पहले की तरह महंगे आवास से चिपकी रही और अचल संपत्ति और गहने पर लाखों डॉलर कर्ज चढ़ गया । सन 1946 में उनकी 25 वर्षीय बेटी का नींद की गोलियों की अधिकता के कारण मौत हो गई। एवलिन के लिए वह गहरा सदमा था। अगले वर्ष उसकी भी मृत्यु हो गई। दो दशकों तक उन्होंने उनके सभी हीरे मरणोपरांत भुगतान के लिए नीलामी के लिए रखे । जिसमे हॉप हीरा भी शामिल था। इवालीन का दूसरा हीरा 94.8 कैरेट का स्टार ऑफ ईस्ट था। तीसरा 31 कैरेट का मैकलीन डायमंड था और चौथा 15 कैरेट का स्टार ऑफ द साउथ था।

होप के संदिग्ध अतीत को देखते हुए।अदालत के रिसीवर को इसकी उम्मीद नहीं थी । नीलामी में उसका नंबर आये उससे पहले ही अंतरराष्ट्रीय हीरा बाजार में डायमंड किंग के नाम से जाने जाते विंस्टन नाक के झवेरी ने सब हिरे 11,00,000 $ डॉलर में खरीद लिये ।

थोडे समय बाद हॉप के अलावा अन्य हीरे उन्होंने बारी बारी बेचकर 20,000,000 $ कमा लिए । जिसका अर्थ था हॉप हीरा उनके लिए अब बोनस था। इस हीरों के साथ जोड़ी गई सब घटनाओ को हैरी विंस्टन केवल अंधविश्वास मानता था । यह भी एक सच्चाई है कि उन्होंने होप को अपने पास नहीं आने दिया। हमेशा अलग रखा। धर्मार्थ कार्य के लिए धन जुटाने के बहाने उन्होंने अमेरिका के हर बड़े शहर में उन ऐतिहासिक हीरों को प्रदर्शित करने के लिए एक लंबा कार्यक्रम तैयार किया। जब न्यू यॉर्क में पहला प्रदर्शन लगा तो पहले दिन, 10,000 लोगों की भीड़ जम गई। निस्संदेह हॉप हिरे के सौंदर्यशास्त्र बदले लोग उसकी तीन सौ साल पुरानी रहस्यमयी तवारीख थी। तथाकथित रहस्य और घटनाओं के कारण उस पनौती बने हीरे को देखते हुए रहस्य के साथ-साथ रोमांच का आनंद भी बड़ा इमोशनल वाला था।

जनता प्रदर्शन के लिए न्यूयॉर्क फिर और अग्रणी शहरों का नंबर लगने में नौ साल लगे जिसके मजबूत ग्लास पोर्टेबल शो-केस में रखे गए और पहरेदारों से सुरक्षित होप डायमंड ने 2.5 लाख किलोमीटर की यात्रा की । और परोपकार के लिए 10,000,000 $ का धन भी इकठ्ठा किया। हेरि विंस्टन ने भी देशभर में असाधारण प्रसिद्धि मिली ।

देशव्यापी भृमण के दौरान खुद हॉप डायमंड को जो प्रसिद्धि मिली वह नकरात्मक थी। नकारात्मक था। स्थानीय जहां प्रदर्शन हुआ समाचार पत्रों , टी.वी. और रेडियो स्टेशन ने हॉप के अतीत को जानबूझकर या अनजाने में उखाड़ फेंककर उसे अशुभ साबित करते रहे । विंस्टन को अब ऐसे कुख्यात हीरों का कोई ग्राहक मिले यह सम्भव नही था । 1957 में उस हीरे के हार को वाशिंगटन की प्रसिद्ध स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन को स्थायी प्रदर्शन के लिए एक उपहार देने के बारे में सोचा ।

इतिहास में यादगार बना चुके उस हिरे को संस्था के संग्रहालय में प्रदर्शित किया जाए ऐसी शर्त स्वीकृत होने के बाद 10 नवंबर 1958 को हैरी विनस्ट ने हॉप का एक पार्सल न्यू यॉर्क पोस्ट ऑफिस में प्रस्तुत किया ।

पार्सल बॉक्स पर भूरे रंग का कागज लिपटे हुए थे, ताकि यह अन्य साधारण पार्सल के साथ मिश्रित हो और कम से कम तस्करों का उस पर ध्यान न खिंचे । न्यूयॉर्क से पार्सल सादा कपड़े पहने पहरेदारों की निगरानी में वाशिंगटन और वहां स्मिथ सोनियन इंस्टीट्यूशन की प्रशासकों की उपस्थिति में होप डायमंड की नेकलास संगठन को एक औपचारिक उपहार के रूप में आधिकारिक रूप से दे दिया।

स्मिथ सोनियन इंस्टीट्यूशन की प्रशासकों की उपस्थिति में होप डायमंड की नेकलास संगठन को एक औपचारिक उपहार के रूप में आधिकारिक रूप से दे दिया।

वआज भी स्मिथसोनियन संग्रहालय में सख्त पहरे में होप डायमंड को संग्रहालय में प्रदर्शन के लिए रखा गया है । उसकी अपनी सुंदरता के अलावा उसके संदिग्ध अतीत से सबको मुग्ध करता है। विज्ञान की नजर में हर दूसरे हीरे की तरह गोलकोंडा का होप डायमंड कार्बन के चंद टुकड़ों की तुलना में विशेष और पनौती नहीं ।

हॉप के नक्शे कदम पर बनी घटनाये संयोग से विशेष नहीं। इस प्रकार फिर भी दुनिया की सबसे कीमती और प्रसिद्ध हीरे के बीच होप डायमंड अविस्मरणीय है , क्योंकि वह सिर्फ एक हीरा नहीं। वह एक कहानी है, जो रोमांचकारी है, रोमांटिक है और डायमंड की तरह फॉरएवर हैं ।

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