क्या हम धर्म छोड़कर आज़ाद हो सकते हैं ?

क्या हम धर्म छोड़कर आज़ाद हो सकते हैं ?

सबसे पहले तो हम मानवी आज तक ‘ धर्म ‘ क्या हैं इस बात को ही समझ नहीं पाए है । लेकिन आज हम उस धर्म को छोड़कर जिसे हम जानते तक नही क्या हम आज़ाद हो सकते है ? इस बारे में जानेंगे ।
इस बात समझने के लिए हम महाभारत जो भारत की धरोहर है उसकी बात करते है । महाभारत में भीष्म कहते हैं – ‘मेरा धर्म कठोर है। मैंने इसे अपनाया है और मैं वही हो गया हूं। अब चाहे जो हो जाए, चाहे मेरा जीवन ही क्यों न चला जाए, मैं अपना धर्म नहीं बदल सकता, क्योंकि मैं यही बन गया हूं।’
आप अपने धर्म को अगर इस तरह से स्थापित करते हैं, तो वही आपके अस्तित्व के होने का तरीका बन जाता है।
‘योगस्थ कुरु कर्मणि’ का यही मतलब है कि पहले
अपने अस्तित्व के होने का तरीका स्थापित करो , फिर कर्म करो। पहले आपका धर्म, फिर आपके कर्म। लेकिन आप बिना अपना धर्म जाने बहुत सारे कर्म इकट्ठा कर लेते हैं। यही समस्या है। कर्म सिर्फ वही नहीं हैं, जो आप इस संसार में कर रहे हैं, इसमें वो सारी बेतुकी चीजों भी शामिल हैं जो आपके दिमाग में चलती रहती हैं।

Can we leave religion and be free?
Can we leave religion and be free?

यह सब कर्म है। कर्म का मतलब है ‘एक्शन’ । अब इस कर्म के चार स्तर हैं –
शारीरिक कर्म,
मानसिक कर्म,
भावनात्मक कर्म और
ऊर्जा -कर्म ।
जीवन के हर पल आप कर्म के इन चार पहलुओं को कर रहे हैं ।अगर आप खा रहे हैं, आप कर्म कर रहे हैं, आपचल रहे हैं, आप कर्म कर रहे हैं, आप सोए हैं, तब भी आप कर्म के चारों पहलुओं को कर रहे हैं । कर्म तो आप कर ही रहे हैं, चाहे जगे हुए हों या सोए हुए। दूर न ले जाएं, इसके लिए आपको पहले अपना धर्म तय करना होगा। अगर आपने अपना धर्म निश्चित नहीं किया है, तो कर्म आपको कल्याण से दूर ले आपके कर्म आपको अपने कल्याण जाएंगे, क्योंकि आपके अधिकतर कर्म अचेतन हैं ।

लेकिन अगर आप धर्म तय कर लेंगे तो आपका कर्म स्वाभाविक रूप से एक निश्चित राह पर चलेंगे। आपके कर्मों में एक दिशा होगी, उनका एक लक्ष्य होगा और एक पूर्णता होगी। लेकिन अगर आपने अपना धर्म नहीं अपनाया, तो आपके कर्म इधर – उधर भटकते रहेंगे। आप जो भी देखेंगे, आपका मन, आपके भाव, आपका शरीर उसके पीछे भाग सकता है। इस तरह से आप एक भ्रमित प्राणी बन जाएंगे।
होता यूं है कि जब प्राणी इस शरीर को छोड़ता है, तो उसे पता ही नहीं होता कि उसे कहां जाना है, क्योंकि वह भ्रमित होता है। अब ये किसी भ्रमित मन की बात नहीं है । यब एक भ्रमित प्राणी की बात है । प्राणी भ्रमित है, क्योंकि उसका कोई धर्म नहीं है। जब आप इस शरीर को छोड़ते हैं और आपके अस्तित्व को यह पता ही नहीं होता कि उसे किधर जाना है तो यह एक बेहद कष्टदायक स्थिति होती है। यह सबसे बुरी स्थिति है, जो किसी इंसान के साथ हो सकती है । दुर्भाग्य से ऐसा बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है, क्योंकि लोग किसी भी तरह के धर्म को नहीं मान रहे हैं, और इसे वे अपनी आजादी समझते हैं। आजादी के नाम पर अगर हम यातायात के नियमों को न मानें, मसलन सड़क पर अगर हर कोई अपने मन से जिस तरफ चाहे, उधर गाड़ी चलाने लगे, तो लोग आजाद नहीं होंगे, वे ट्रैफिक में फंस जाएंगे। आजादी नियमों को तोड़ने से नहीं आती। आजादी को असली अभिव्यक्ति तब मिलती है जब एक स्पष्ट रास्ता सामने होता हैं। इसलिए ऐसा न सोचें कि जीवन में जैसे-जैसे चीजें आती जाएंगी, उन्हें वैसे- वैसे देख लेंगे। इसे सहजता नहीं कहते, यह एक तरह की बाध्यता है। सहजता के लिए एक बुनियाद की जरूरत है। अगर बुनियाद ही नहीं है, तो सिर्फ बाध्यता होगी सहजता नहीं।

जो कुछ खेल हो रहा है, उसके परे जाना और अपना धर्म अपनाना आसान काम नहीं है। ‘यह
मेरा धर्म है’, ऐसा कहने का मतलब है कि आप अपने पूर्वजों के द्वारा तय की गई सीमाओं से परे
जा रहे हैं। एक तरह से आप अपनी अनुवांशिकी को नकार रहे हैं और अपना खुद का रास्ता बना रहे हैं। भीष्म ने अपने पिता के व्यवहार में एक खास अंदाज देखा कि उनके भीतर बाध्यकारी प्रवृत्ति थी। वह किसी को देखते ही प्रेम में पड़ जाने वाले इंसान थे। लेकिन ये भीष्म के कर्म नहीं थे और न ही यह उनका धर्म था। ‘मैं कभी अपने धर्म से नहीं डिगूंगा। मेरा जीवन देश के लिए समर्पित है। और बस मेरे लिए यही सब कुछ है।’ उन्होंने अपने जेनेटिक पैटर्न से खुद को अलग कर लिया और अपना एक अलग रास्ता बनाया।

आध्यात्मिक साधना का मतलब यही है। अपने खुद के धर्म को स्थापना करना ताकि बीती हुई चीजें आपके जीवन पर हावी न हों। जब किसी ने जीसस से कहा कि वह अपने मृत पिता का अंतिम संस्कार करने जाना चाहता है, तो जीसस ने कहा, ‘मृतक को मृतकों के लिए छोड़ दो’। जिसके पिता की मृत्यु हो गई हो, उसके सामने यह बात कहना बहुत अमानवीय और दयाहीन लग सकता है। लेकिन जीसस ने ऐसा कहा, क्योंकि वह सिर्फ मरे हुए पिता को छोड़ने की बात नहीं कर रहे थे, बल्कि उन पूर्वजों से भी उसका पीछा छुड़ाना चाहते थे, जो अब भी उसके मन के भीतर मौजूद थे । अगर आप मरे हुए को नहीं छोड़ेंगे, तो आप न तो अपनी साधना कर पाएंगे और न ही इस जीवन को सही तरीके से जी पाएंगे। ऐसा लगेगा कि कोई और आपके माध्यम से जीने की कोशिश कर रहा है। अपने धर्म की स्थापना करने का मतलब है, मरे हुए को पीछे छोड़ देना और अपने लिए एक नए मार्ग का सृजन करना। यही आजादी है। धर्म को छोड़ना आजादी नहीं है दुर्भाग्य से ऐसा बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है कि लोग किसी भी तरह के धर्म को नहीं मान रहे हैं, और इसे वे अपनी आजादी समझते हैं ।

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