महर्षि कश्यप

महर्षि कश्यप

भारतवर्ष के न जाने कितने अमूल्य रत्न विस्मृति की धूल से धूसरित होकर अज्ञात स्थानों में पड़े हुए हैं, मानो भारतीयों की उपेक्षा देखकर निराशा से एकान्तवासी
बन ग़ए हों। सत्य यह है कि अपने महापुरुषों का हमने आदर ही नहीं किया, इसलिए संसार में हमारा भी आदर नहीं हुआ। उन महापुरुषों को खोकर हम स्वयं ही खो गये। हजारों वर्षों के प्रयास के बाद बुद्ध, शंकर और दयानन्द जैसे महापुरुषों ने हमें फिर जगा दिया। इसी जागृति के फलस्वरूप हम अपनी खोयी हुई विभूतियों को ढूँढ़ने के लिए व्यग्र हो गये हैं। किन्तु हमारी स्मृतियाँ इतनी मन्द हो गई हैं कि हम इतिहास के प्रकाश में अपने ही परिजनों को नहीं पहचान पाते। राष्ट्रीय नवोन्मेष में कठिन अध्यवसाय करके हम जिन महापुरुषों को पहचान सके हैं, उनमें महर्षि कश्यप का भी नाम है। महर्षि कश्यप आयुर्वेद के उन अत्यन्त प्राचीन आचार्यों में से हैं, जिन्होंने आयुर्वेद के निर्माण में मौलिक अध्यवसाय किया था। धन्वन्तरि और आत्रेय पुनर्वसु के समान ही महर्षि कश्यप भी आयुर्वेद के विशाल भवन निर्माताओं में आदर से स्मरण किये जाने योग्य हैं। ईसा की ग्यारहवीं शराब्दी में चक्रपाणि ने ‘चरक संहिता’ की व्याख्या लिखते हुए एकाध स्थानों पर कश्यप के उद्धरण दिये हैं। उसके बाद से आज तक प्रायः नौ सौ वर्षों में आयुर्वेद के इस कर्णधार को हम इतना भूल गये कि आज के लोग यही
नहीं जानते कि महर्षि कश्यप ने आयुर्वेद के लिए क्या किया था। हमने भारत की उन महान् आत्माओं का सत्संग छोड़ दिया, इसीलिए भारत की महत्ता हमें छोड़ गई। जगद्गुरु कहलाने वाले लोग आज परापेक्षी हो गये। अन्यथा जिस देश में कश्यप जैसा महान् आयुर्वेद विज्ञान का वेत्ता विद्यमान हो उसे परापेक्षी होने की आवश्यकता ही क्या है? पराधीनता की श्रृंखलाओं में बँधे हुए हमने सुना, इतिहास की आत्मा कोलब्रुक (Cole- brooke) जैसे विदेशी के हृदय में बोल रही थी-
‘Hindus were teachers and not learners.

यही कारण है कि भारतीय आज फिर अपनी खोयी हुई गुरुता को ढूँढ़ने के लिए बेचैन है। वह फिर उपेक्षित खंडहरों और गिरि-कन्दराओं को खोजने लगा है जिनमें भारतीय संस्कृति के जीवन त्त्व बिखरे पड़े हैं। अभी तक दो-चार उद्धरणों के अतिरिक्त हम महर्षि कश्यप के बारे में कुछ नहीं जानते थे । जानने का कोई साधन ही न था। गत 1938 ई. में महर्षि कश्यप की निर्माण की हुई ‘काश्यप संहिता’ का नेपाल में पता चला । वह निर्णयसागर प्रेस, बम्बई से प्रकाशित हुई। ताड़पत्रों पर लिखी हुई एवं बीच-बीच में पत्रों के टूट जाने एवं कीड़ों द्वारा खंडित होने के कारण इस संहिता का बहुत-सा भाग आज भी विलुप्त ही है, तथापि जो कुछ है, वह एक अमूल्य निधि ही समझनी चाहिए। प्रारम्भ के बारह और अन्त के चौवन अध्याय इस ग्रन्थ के अभी भी नहीं मिल सके। आदि और अन्त में ग्रन्थ के खण्डित होने के कारण ग्रन्थ-लेखक और तत्सम्बन्धी अवान्तर बातें बहुत कम जानी जाती हैं। इस प्रकार के उल्लेख प्रायः ग्रन्थ के आदि और अन्त में ही लिखने की परिपाटी है। फिर भी जो अंश शेष है उससे भी हम महर्षि के बारे में अनेक अमूल्य बातें जान सके हैं। उपलब्ध भाग के संहिता कल्पाध्याय में महर्षि कश्यप और उनकी संहिता का इस प्रकार परिचय दिया है-

एक बार स्वर्ग में दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ किया दक्ष पर क्रुद्ध होकर भगवान् शंकर ने उस यज्ञ को विध्वंस करना शुरू कर दिया। डर के मारे देवता और महर्षि इधर-उधर प्राण लेकर भागे। प्रबल सन्ताप और भय के कारण उसी समय से विभिन्न रोगों का आविर्भाव हुआ। यह सतयुग की घटना थी। उसके अनन्तर त्रेता में व्यक्तियों में शारीरिक और मानसिक रोग फैले, जिनका वर्णन भी संहिता के प्रारम्भ में किया गया है। रोगों से जीर्ण-शीर्ण जनता की यह दुर्दशा देखकर भगवान् ब्रह्मदेव की प्रेरणा एवं अपने हृदय की करुणा से प्रेरित होकर महर्षि कश्यप ने तपोनिष्ठ होकर निर्मल ज्ञानदृष्टि से इस शास्त्र की रचना की थी। तदनन्तर यह अमूल्य शास्त्र महर्षि से अन्य ऋषियों ने प्राप्त किया। महर्षि से इस शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करने वाले शिष्यों में तपस्वी ऋचीक मुनि के पुत्र जीवक भी थे जीवक की आयु उस समय केवल पाँच वर्ष की ही थी। किन्तु फिर भी प्रतिभा और ज्ञान में वह सारे ही मुनियों में अग्रणी था । कश्यप के भाव को जैसा जीवक ने ग्रहण किया वैसा अन्य किसी ने नहीं। वे पीछे रह गये। केवल जीवक ही उस ज्ञान का पूरा अधिकारी बना।

महर्षि कश्यप
महर्षि कश्यप

मुनियों ने जो बात फिर जाननी चाही, महर्षि ने उसे बताने का भार जीवक को सौंप दिया। यह बालगुरु वृद्ध मुनियों को शिक्षा देने के लिए गुरु के आसन पर बैठा। ‘यह पाँच वर्ष का बालक हमें क्या शिक्षा दे सकता है!’ इस अभिमान से मुनियों ने उसका तिरस्कार किया। जीवक यद्यपि पाँच वर्ष का था, किन्तु उसे यह तिरस्कार असह्य प्रतीत हुआ। गंगा के तट पर कनखल के आयुर्वेद विश्वविद्यालय में एकत्र उन सब मुनियों के देखते-देखते तिरस्कार की असह्य वेदना लिये हुए वह आत्माभिमानी बालक गंगा के गम्भीर गहर में निमग्न हो गया बालक के इस साहसपूर्ण आत्मोत्सर्ग को देखकर वयोवृद्ध मुनियों का हृदय ‘धक’ से हो गया कल-कल-निनाद में बहते हुए गंगा के प्रवाह को वे देखते रह गये। लोग अभी संतप्त हृदय से प्रवाह की ओर देख ही रहे थे कि गंगा की अगाध जलराशि के ऊपर वही बालक एक वृद्ध का रूप लेकर प्रकट हो गया। संतप्त हृदय चकित होकर रह गए। लोगों के आश्चर्य की सीमा न रही। ज्ञान के धनी उस छोटे से
बालक का यह चमत्कार देखकर अहंकारी मुनियों के मस्तक श्रद्धा से झुक गए। उस ज्ञान-वृद्ध शिशु को सारे मुनियों ने आदर से ‘वृद्ध-जीवक’ कहकर सम्बोधित किया।


तभी से महर्षि कश्यप का वह बाल-शिष्य वृद्ध जीवक नाम से प्रसिद्ध हुआ। मुनियां ने नतमस्तक होकर ज्ञान-वृद्ध उस बाल-गुरु से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया। महर्षि कश्यप के बाद दूसरा सम्मान मिला तो वृद्ध जीवक को ही। यह घटना द्वापर की थी। कलियुग प्रारम्भ हुआ तो इस ज्ञान की प्रतिष्ठा रखने वाले व्यक्ति पैदा ही न हुए। या यों कहिये कि ज्ञान-विज्ञान की प्रतिष्ठा करने वाले
लोग ही न रहे इसलिए कलियुग आ गया। महर्षि कश्यप का यह शास्त्र छिन्न-भिन्न हो गया। अज्ञान की घटाओं ने घुमड़कर हमारे दुर्दिनों का सूत्रपात किया। ऐसी दशा में अनायास नाम के एक विद्वान यक्ष ने इस शास्त्र को फिर से संकलित किया। अनायास की यह करुणा यदि अनायास ही हमें प्राप्त न होती तो कश्यप का यह आयुर्वेद शास्त्र कभी का विलुप्त हो गया होता। इस शास्त्र को फिर से अध्ययन और अध्यापन क्रम में प्रतिष्ठित करने का श्रेय अनायास को ही है ।

इसी समय वृद्ध जीवक के वंश में उत्पन्न वात्स्य नाम के एक विद्वान् अनायास की श्रद्धापूर्ण सेवा की। प्रसन्न होकर अनायास ने कश्यप की वह धरोहर विद्वान वात्स्य को सौंप दी। वात्स्य वेदों का विद्वानु और भक्त पुरुष था। अनेक विच्छिन्न अंशों का वात्स्य ने फिर से प्रतिसंस्कार किया। संक्षिप्त को युगानुकूल बुद्धिगम्य बना देना तथा अधिक विस्तृत सन्दर्भ को समयानुकूल संक्षेप कर देना एवं गहन को सरल शब्दों में प्रस्तुत करना ही प्रतिसंस्कार है।’ वात्स्य का किया हुआ प्रतिसंस्कार ही ‘काश्यप संहिता ने का अन्तिम रूप है।

अनायास ने वात्स्य को आठ संस्थानों वाली काश्यप सहिता दी थी। परन्तु उन आठ संस्थानों में अनेक महत्त्वपूर्ण विषय या तो विशद होने से रह गए या दुर्भाग्य से विलुप्त हो गए थे। वात्स्य ने उन सबको विशद करने के लिए प्राचीन आठ संस्थानों के अतिरिक्त नवाँ ‘खिलस्थान’ संहिता के अन्त में और जोड़ दिया। वात्स्य का यह नवाँ संस्थान भी बड़े महत्त्व का है। किन्तु खेद है, आज वह भी पूरा नहीं मिलता। संस्कृत साहित्य में कश्यप तथा काश्यप नाम के अनेक आचार्यों का वर्णन मिलता है। आयुर्वेद की ‘काश्यप संहिता’ के उपदेष्टा कौन-से कश्यप हैं यह निश्चय करना भी आवश्यक है। संस्कृत के प्राचीन ग्रन्थों में ‘कश्यप’ और ‘काश्यप’ शब्द का प्रयोग व्यक्तिवाची अथवा गोत्रवाची दोनों ही प्रकार का है दोनों शब्द दोनों ही अर्थों में प्रयोग किये जाते हैं।

सूत्र-ग्रन्थों और ब्राह्मण-ग्रन्थों में ऐसे अनेक प्रयोग हैं। ऐसी दशा में यह जान लेना चाहिए कि वर्णनीय कश्यप मूल कश्यप थे या कश्यप गोत्र में उत्पन्न काश्यप ।
‘काश्यप संहिता’ को देखने से ज्ञात होता है कि संहिता में अनेक स्थानों में महर्षि का नाम कश्यप’ आया है’ और अनेक स्थानों पर उन्हें ‘मारीच’ नाम से सम्बोधित किया
गया है। इससे यह तो स्पष्ट है कि मारीच और कश्यप एक ही व्यक्ति थे। दूसरे यह कि कश्यप के पिता का नाम मरीचि था। दूसरे, समान नाम के व्यक्तियों से भेद-
बोध कराने के लिए पिता का नाम पहले जोड़कर अपना नाम लिखने की परिपाटी भारत की प्राचीन परम्परा है। आत्रेय पुनर्वसु, दाशरथि राम, ‘मारीचि कश्यप’ ऐसे ही प्रयोग बोधायन आदि प्राचीन विद्वानों ने मरीचि के पुत्र कश्यप को ही काश्यप गोत्र का प्रवर्त्तक लिखा है। किन्तु ‘चरक संहिता’ से यह प्रतीत होता है कि कश्यप, मारीचि और काश्यप-यह भिन्न-भिन्न तीन व्यक्ति थे। उपलब्ध होनेवाले प्रमाणों से हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि संहिताकार कश्यप से पूर्व भी एक कश्यप थे। उनके लिए ग्रन्थों में ‘वृद्ध कश्यप’ नाम प्रयुक्त होता है, किन्तु उसी काल में मारीचि के पुत्र का नाम भी कश्यप ही था। दोनों का भेद प्रकट करने के लिए एक वृद्ध कश्यप और दूसरे मारीच कश्यप लिखे जाते हैं। चरक संहिता देखने से यह बात और अधिक स्पष्ट हो जाती है। वात कला कलीयाध्याय’ में एक को ‘मारीच’ लिखा और दूसरे को रसायनपाद में ‘कश्यप’। ऋषि कक्षा के इन दोनों ही कश्यपों के गोत्र प्रचलित हुए। वृद्ध कश्यप तथा मारीच कश्यप के गोत्र ‘काश्यप गोत्र’ के एक ही नाम में समाविष्ट हैं। मत्स्यपुराण और प्रवरदर्पण आदि में ‘अथकश्यपाः’ इस प्रकार सामान्य संज्ञा से काश्यप गोत्र के अधिकार में जो कश्यप और मारीच दोनों नाम मिलते हैं, उसका तात्पर्य यही है कि दोनों काश्यप गोत्र एक ही संज्ञा के अन्तर्गत हैं। माधव निदान के विष-रोग निदान में व्याख्या लिखते हुए आचार्य श्रीकण्ठ ने उद्धरण देकर लिखा-‘वद्ध कश्यप का ऐसा विचार है। इतना ही नहीं, स्वयं ‘काश्यप संहिता’ में ही यह भेद स्पष्ट वर्णित है । सिद्धिस्थान के
वमन विरेचनीय तीसरे अध्याय में विभिन्न आचार्यों के विचार उद्धृत किये गए हैं। इन आचार्यों में वृद्ध कश्यप का नाम भी है। फलतः मारीच काश्यप से पूर्व एक और कश्यप अवश्य थे जिन्हें ग्रन्थकारों ने ‘वृद्ध कश्यप’ नाम से लिखा । ‘काश्यप संहिता’ में विचार उद्धृत किये गए, अतएव यह भी स्पष्ट है कि वृद्ध कश्यप ने भी कोई आयुर्वेदिक ग्रन्थ लिखा था। इस प्रकार यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि वृद्ध कश्यप और मारीच कश्यप दो भिन्न व्यक्ति ही थे।

अब चरक संहिता के तीसरे कश्यप का प्रश्न रह जाता है। इनका कोई ग्रन्थ सम्बन्धी उद्धरण नहीं मिलता। हो सकता है कि चरक संहिता का वास्तविक पाठ ‘धौम्य
मारीचि-काश्यपौ’ इस प्रकार रहा हो । धौम्य के आगे एकवचनान्त प्रथमा विभक्ति गलती से लिख गई हो। या यह भी हो सकता है कि जैसे आज दो कश्यपों का परिचय मिल गया है, कभी तीसरे का भी मिल जाय । हमने लिखा है कि मारीच और मारीच-काश्यप एक ही व्यक्ति है। इसके लिए ‘काश्यप संहिता’ के लेख ही सर्वोत्तम प्रमाण हैं। ‘चरक संहिता’ के वातकलाकलीयाध्याय में जो मारिचि नाम आया है वह मारीच-काश्यप का ही आधा नाम है। ‘चरक संहिता’ में मारीचि और राजर्षि वायोविद के संवाद का उल्लेख है, ‘काश्यप संहिता’ में भी वायोविद के साथ मारीच काश्यप के विचार विनिमय का वर्णन है। ‘चरक संहिता’ के मारीचि और काश्यप सॉंहिता के मारीच एक ही अर्थ के बोधक हैं, यह भी स्पष्ट है। चरक संहिता में शरीर विचयाध्याय गत माता के गर्भाशय में शरीर का रचनाक्रम बताते हुए अनेक आचार्यों के नाम उद्धृत किए गए हैं, वहाँ ‘मारीचिः कश्यपः’ इस प्रकार पूरा नाम ही लिखा है। उपलब्ध काश्यप संहिता के उपदेष्टा यहाँ मारीचि काश्यप हैं।

समस्त चरक संहिता में वृद्ध कश्यप और मारीचि कश्यप इन दो व्यक्तियों को छोड़कर तीसरे ‘मारीच काश्यपौ’ वाले काश्यप का कहीं उल्लेख नहीं मिलता । सूची में दिए गए सभी आचार्यों का नाम कहीं न कहीं आया ही है। इस कारण यह तीसरा नाम लेखक या प्रेस की गलती से धौम्य के आगे प्रथमान्त विसर्ग लगा देने से बन गया है। वस्तुतः तीसरा कश्यप कोई नहीं है। इस प्रकार दो कश्यप ही प्रमाणसिद्ध हैं-प्रथम वृद्ध कश्यप, दूसरे मारीच कश्यप। गोत्र दोनों के मिले-जुले । काश्यप संहिता के शिष्योपक्रमणीयाध्याय में आयुर्वेद का उद्भव लिखते हुए लिखा है कि यह ज्ञान ब्रह्मा से अश्विनीकुमारों को और उनसे इन्द्र को प्राप्त हुआ। इन्द्र से कश्यप, वसिष्ठ, अत्रि और भूगु-इन चार महर्षियों ने इसे प्राप्त किया। ‘चरक सहिता’ में भी यह प्रारम्भिक सूची इसी क्रम से लिखी गई है- ‘वसिष्ठ कश्यपो रात्रेयः यहाँ अत्रि के स्थान पर उनके पुत्र आत्रेय का नाम रख दिया है। चरक सोहिता के आयुर्वेद समुत्थानीय रसायन पाद में इन्द्र से ज्ञान प्राप्त करने के लिए जाने वाले महर्षियों में भी-“भूगु, औगेरा, अत्रि, वसिष्ठ और कश्यप के नाम हैं। इस प्रकार देवताओं से मनुष्य समाज तक आयुर्वेद का ज्ञान लाने वाले जिन महर्षियों ने प्रथम प्रयत्न किया था, उनमें सर्वत्र जिन कश्यप का नाम मिलता है वे ही आदि कश्यप हैं। मारीच- कश्यप का नाम उस गणना में नहीं है। इन उपर्युक्त महर्षियों द्वारा मनुष्यों तक आयुर्वेद विज्ञान आ जाने के उपरान्त ही मारीच कश्यप ने संहिता लिखी थी। चरक संहिता में प्रारम्भ में पहले एक कश्यप का नाम लिखकर पीछे से मारीच कश्यप का नाम लिखना यह स्पष्ट करता है कि प्रथम कश्यप ही वृद्ध कश्यप थे और दूसरे मारीच-कश्यप। किन्तु आयुर्वेद का प्रसार करने के लिए हिमालय के पाश्श्व में महर्षियों की जो विशाल सभा हुई थी उसमें वृद्ध कश्यप के साथ मारीच-कश्यप भी गए थे। सूची में कश्यप के बाद मारीच कश्यप का नाम भी चरक सौहिता में लिखा है। किन्तु आयु में एक वृद्ध थे, दूसरे कनिष्ठ। इस प्रकार ‘काश्यप’ गत्र वृद्ध कश्यप का चलाया हुआ ही था, यह मानना होगा। मनु ने धर्मशास्त्र में गोत्र-प्रवर्तक कश्यप को लिखा है, मारीच कश्यप को नहीं।

तो भी मरीचि का बड़ा सम्मान था। वे दश प्रजापतियों में एक थे। मनु ने उन्हें प्रथम स्थान दिया है तथा यह भी लिखा है कि मरीचि के पुत्र अग्निष्वाता कहे जाते थे। वे सामाजिक कार्यों में उत्कृष्ट पूजा के अधिकारी माने जाते थे।’ इन्हें चाँदी के बर्तनों में अन्नपान देने का आदेश मनु ने दिया है। मारीच कश्यप निस्सन्देह इस सम्मान के अधिकारी थे। किन्तु कश्यप वंश इतना विस्तृत हुआ कि उसमें बहुत से प्रतिष्ठित व्यक्ति हुए। वृहदारण्यक उपनिषद के वंश ब्राह्मण में हरित कश्यप, शिल्प कश्यप, नैघुवि कश्यप आदि अनेक नाम दिए गए हैं। व्याकरण में भी कश्यप नामक कोई विद्वान् पाणिनि ने स्मरण किया है। हो सकता है पीछे से मारीच कश्यप का गोत्र भी चला हो। और गोत्र-प्रचलन इतना मिल-जुल गया कि उसमें वृद्ध कश्यप और मारीच कश्यप का भेद करना संभव नहीं प्रतीत होता। बौधायन आदि आचार्यों ने मारीच कश्यप को मूल कश्यप लिखा है, वहाँ उनका तात्पर्य अवान्तर कश्यप गोत्र के संस्थापक से ही हो सकता है। काश्यप संहिता के शिष्योपक्रमणीयाध्याय में अग्निहोत्र का विधान है। वहाँ अग्नि, सोम और प्रजापति के बाद ‘कश्यपाय स्वाहा’ इस प्रकार अपने से पूर्ववर्ती के लिए ही सम्मानार्थ आहुति हो सकती है। पूर्ववर्त्ती वृद्ध कश्यप ही थे। स्मरण रहे, कश्यप और काश्यप समानार्थक हैं और गोत्रवाची भी। मारीच और मरीचि भी समानार्थक ही हैं किन्तु गोत्रवाची काश्यप और व्यक्तिवाची कश्यप का स्पष्ट उल्लेख वाग्भट ने किया है।

काश्यप संहिता में कहीं मारीच और कही कश्यप और कहीं-कहीं मारीच कश्यप- तीनों ही प्रकार से लिखा गया है। किन्तु आथर्वण सर्वानुक्रम सूत्र में कश्यप के बजाय मारीचि काश्यप नाम लिखा है। चरक संहिता में पूर्वज कश्यप को केवल कश्यप ही लिखा है। किन्तु काश्यप संहिता में उन्हें वृद्ध कश्यप कहकर सम्मानित किया गया है। आचार्य श्रीकण्ठ ने भी माधव निदान के विष-निदान की व्याख्या में- ‘वृद्ध काश्यपः’ ऐसा ही लिखा है। हस्व ककार वाला कश्यप व्यक्तिवाची तथा दीर्घ (वृद्धि-युक्त) ककार वाला गोत्रवाची है, व्याकरण का यह प्रतिबन्ध प्रायः नहीं रहा है। इसीलिए वार्तिककारों ने उस नियम को शिथिल ही कर दिया। वह प्रतिबन्ध चिरकाल से समाप्त हो चुका। हाँ, कश्यप का यह सिद्धान्त है, इस भाव से (तस्येदम्) काश्यप शब्द प्रयोग किया गया हो तो कश्यप के लिए काश्यप प्रयोग उचित ही है। महाभारत के आदि-पर्व (अ. 36) में लिखा है कि महर्षिकश्यप के वंश का बड़ा विस्तार है। कश्यप के दो पल्नियाँ थीं-अदिति तथा दिति । अदिति के गर्भ से बारह पुत्र उत्पन्न हुए। इनमें सबसे बड़े इन्द्र तथा सबसे छोटे विष्णु थे। बारह आदित्यों के नाम से यही बारह पुत्र प्रसिद्ध हैं । क्योंकि उनकी माँ अदिति थी इसीलिए उनका वंश आदित्य वंश या सूर्यवंश हो गया।

कश्यप की दूसरी पत्नी दिति थी। दिति की सन्तान दैत्य कहलाये । दैत्य अपनी विमाता के तथा उससे उत्पन्न अपने भाइयों के शत्रु थे। दैत्यों का वंश ही असुरों का वंश है। छान्दोग्य उपनिषद्’ में लिखा है कि देवता और असुर युद्ध करने लगे, यद्यपि दोनों प्रजापति के वंशज थे। पीछे हम मनुस्मृति का उल्लेख कर चुके हैं, वहाँ मरीचि को प्रजापति लिखा है। इसलिए हमें यह स्वीकार करना होगा कि मरीचि कश्यप के वंशज ही असुर थे जो देवों से लड़े। वृद्ध कश्यप प्राजापत्य नहीं थे।

भारत के आदिकालीन इतिहास में प्रमुख तीन वंश मिलते हैं-(1) अत्रिवंश (2) मनु वंश, (3) कश्यप का वंश। अत्रि का चन्द्रवंश। मनु का मानव वंश। कश्यप का सूर्यवंश तथा दैत्य वंश प्रसिद्ध हैं। मरीचि कश्यप प्रजापति जैसे उच्च पद वाले पिता पुत्र थे, और योग्य विद्वान भी । किन्तु वे प्रारंभिक जीवन में आदर्शवादी व्यक्ति नहीं थे। यही कारण है कि उनके दो पल्नियाँ थीं । एक के सूर्यवंशी आदित्य हुए किन्तु दूसरी के देशद्रोही दैत्य अथवा असुर हो गये। इन्हीं असुरों में हिरण्यकश्यप जैसा आततायी हुआ, जो सदैव भारतीय राष्ट्र और संस्कृति का द्रोही बना रहा। इधर कश्यप भी के झगड़ों से अलग मस्ती का जीवन बिता रहे थे। कश्य एक विशेष प्रकार
की सुरा को कहते हैं। कश्य पीने के कारण ही उन्हें कश्यप नाम से लोग पुकारने लगे । संभव है उनका नाम कुछ और ही रहा हो। किन्तु जनता उन्हें इसी नाम से स्मरण करती के भी इन रही। धूल कितनी भी छा जाये, सूर्य चमकता ही है। इस विलासी और अनादर्श जीवन के बाद जब विरक्त जीवन में कश्यप आये, प्रथम श्रेणी के महर्षि तथा तत्त्ववेत्ता बन गये । वे एक उच्च कोटि के वैज्ञानिक और शिक्षाशास्त्री बने । उनकी प्रतिमा भारत के इतिहास में आज भी अप्रतिम है। विद्वानों ने उनके इसी नाम को वर्ण व्यत्यय करके विश्लेषित किया-वे पश्यक (सूझबूझ वाली प्रतिभायुक्त) थे, इसलिए उन्हें कश्यप कहना भी कम शोभनीय नहीं है। ऋषि और पश्यक समानार्थक हैं, इसलिये कश्यप भी महर्षि का पर्यायवाची बन गया। महर्षि कश्यप और वृद्ध जीवक का आश्रम एवं महाविद्यालय गंगा के किनारे कनखल (हरद्वार) में था, यह कहा जा चुका है। महाभारत में गालव के उपाख्यान से भी यही वास्तविकता सिद्ध होती है।

एक बार महर्षि विश्वामित्र की परीक्षा लेने के लिए धर्मराज महर्षि वसिष्ठ का रूप बनाकर उनके आश्रम नैमिषारण्य में पहुँचे। धर्मराज ने वसिष्ठ की ऐसी मद्रा बनाई जिससे यह प्रतीत होता था कि वे कई दिन से भूखे हैं। उन्हें भूखा देखकर विश्वामित्र ने उनके लिए उत्तम भोजन तैयार किया। किन्तु महर्षि विश्वामित्र अभी भोजन बना ही रहे थे कि वसिष्ठ ने दूसरे मुनियों से भोजन माँगकर खा लिया। महर्षि विश्वामित्र भी तब तक ताजा-ताजा भोजन परोसकर ले गये। विश्वामित्र को भोजन लाये हुए देखकर, छट्मवेशी धर्मराज बोले-‘ऋषिवर! अब तो मैं भोजन कर चुका। तुम अपने बनाये भोजन को लेकर यहीं मिलना। मैं फिर किसी समय आकर खा लँगा ।’ इतना कहकर धर्मराज चले गये।

विश्वामित्र अपने बनाये भोजन का थाल अपने सिर पर रखे वहीं खड़े रहे। धर्मराज बहुत दिन तक नहीं लौटे । विश्वामित्र भी भूखे-प्यासे केवल वायु रहकर भोजन का वह पात्र सिर पर रखे वहीं खड़े रहे। विश्वामित्र सूखकर कॉटा हो गये किन्तु धर्मराज की प्रतीक्षा करते रहे। उस दशा में विश्वामित्र के शिष्य गालव ने गुरु के प्रति सम्मान और भक्ति-भाव से सेवा करते हुए दिन-रात एक कर दिया। इस प्रकार बहुत दिन बीत गये धर्मराज वसिष्ठ का वैसा ही रूप धरकर फिर आये। देखा कि निष्ठावान विश्वामित्र भोजन का पात्र सिर पर लिये उसी प्रकार उनकी प्रतीक्षा में खड़े हैं। धर्मराज ने आकर प्रसन्नता से भोजन पा लिया। भोजन करके वे बोले-महर्षि ! मैं
तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम जिस भाव से तपोनिष्ठ हो वह आदर्श है। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि आज से तुम क्षत्रिय नहीं, ब्राह्मण हो।’ यह कहकर वसिष्ठ-रूपी धर्मराज चले गये ।

अपने शिष्य गालव की अपूर्व सेवा और भक्ति से प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने उन्हें आशीर्वाद दिया-‘वत्स! जहाँ चाहो जाओ, तुम्हारी मनोकामनायें पूर्ण होंगी।’
-‘मुनिश्रेष्ठ! मेरी इच्छा है कि मैं आपको गुरु-दक्षिणा देकर कहीं जाऊँ । इसलिए मुझसे कुछ न कुछ गुरु-दक्षिणा
अवश्य ले लीजिये।’ गालव की यह बात सुनकर महर्षि बोले-‘पुत्र! जाओ, मैं तुम्हारी सेवा से संतुष्ट हूँ, गुरु-दक्षिणा मुझे नहीं चाहिए। परन्तु गालव अपने हठ से न हटे। गालव का यह दुराग्रह देखकर महर्षि को झुँझलाहट आ गयी वे बोले-‘यदि देते हो तो चन्द्रमा के समान उज्ज्वल आठ सौ श्यामकर्ण घोड़े लाकर दो’ श्यामकर्ण घोड़े बहुत कम होते हैं। गालव ऐसी दुष्प्राप्य गुरु-दक्षिणा का नाम सुनकर घबरा गया। धीरे-धीरे चिन्ता में घुलने लगा। गालव की यह दशा देखकर उसके मित्र विष्णुवाहन गरुड़ ने उसकी सहायता की। गरुड़ अपनी पीठ पर गालव को चढ़ाकर अश्व ढूँढ़ने के लिए राजी हो गये। चलने के लिए पश्चिमोत्तर दिशा का वर्णन करते हुए गरुड़ ने गालव को बताया कि इस वायव्य दिशा कोण में मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप रहते हैं। कश्यप संहिता में भी महर्षि के स्थान का उल्लेख गंगाद्वार पर ही किया गया है, जो पश्चिमोत्तर कोण में ही है। आज तक आर्यों की सन्तान उस स्थान को श्रद्धा से पूजती है। महर्षि की शिष्य-परम्परा के सम्बन्ध में ‘काश्यप संहिता’ के उल्लेखों से हमें थोड़ा परिचय मिलता है। वृद्ध जीवक के वर्णन में जैसा कहा जा चुका है, महर्षि के पिता का नाम मरीचि था। मरीचि दस प्रजापतियों में प्रतिष्ठित एक व्यक्ति थे :
गुरु का यह आशीर्वाद पाकर भी गालव ने विनयपूर्वक कहा- मनु युग में मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु तथा नारद-ये दस व्यक्ति प्रजापति पदवी से सम्मानित थे। मरीचि का यश महान् था। कश्यप की माता का नाम ‘कला’ था। कला भी बड़ी विदुषी औरसम्मानित देवी थी 1 वह इतनी सुन्दरी भी थी कि प्रत्येक सौन्दर्य का पर्याय ही कला शब्द बन गया है ।


महाभारत में महर्षि की पत्नियों का भी उल्लेख है। अदिति दक्ष प्रजापति की पुत्री थी। उसके गर्भ से महा तेजस्वी और विद्वान् बारह पुत्र कश्यप के थे। उनके नाम (1) इन्द्र, (2) धाता, (3) मित्र, (4) अर्यमा, (5) वरुण, (6) अंशु, (7) भग, (8) विवस्वान्, (9) पूषा, (10) त्वष्टा, (11) सविता और (12) विष्णु थे। स्वर्ग के गण प्रमुख सबसे बड़े इन्द्र ही थे। महाभारत में दक्ष की पचास पुत्रियों का उल्लेख है। उनमें तेरह महर्षि कश्यप को व्याही गयीं अदिति के अतिरिक्त शेष बारह के भी सन्तानें हुई थीं। मनुष्य-समाज का एक बड़ा भाग उन्हीं के वंशजों से भर गया है। वे सभी काश्यप गोत्रीय ही कहे जातने किन्तु दिति सपल्नी द्वेष से कुटिल रहकर भी उंन दैत्यों को जन्म दे गयी जिन्होंने आर्य देश के इतिहास को कलङ्कित ही किया है। अदिति के शील स्वभाव और विवेक के कारण प्रजाजन उसे ‘देव माता’ कहकर स्मरण करते रहे हैं। उसके पुत्रों ने भी विद्या, विज्ञान, पराक्रम और बुद्धिमत्ता में अपना आदर्श स्थापित कर दिया। सत्य यह है कि अदिति ने ही अपने पति की प्रतिष्ठा को उज्ज्वल बनाये रखा।

महर्षि कश्यप के पुत्र विभाण्डक की परम्परा का एक वर्णन महाभारत इस प्रकार है-कश्यप के पुत्र विभाण्डक एक बार किसी सरोवर में स्नान कर रहे थे। वहाँ स्वर्ग से निर्वासित मृगी जैसे कमनीय नेत्र वाली किसी देवकन्या के प्रसंग से उनको एक पुत्र उत्पन्न हुआ। इसका नाम ऋष्यशृग रखा गया। अयोध्या-पति राजा दशरथ के एक पुत्री भी थी, जो अङ्गराज (बिहार के शासक) रोमपाद ने अपत्य-धर्म से गोद ली थी। इसका नाम शान्ता था। राजा रोमपाद ने शान्ता का विवाह महर्षि ऋष्यशृङ्ग से कर दिया। वह स्थान जहाँ कष्यशृङ्ग रहते थे, हिमालय के हेमकूट शिखर पर था। ‘उत्तररामचरित नाटक’ में भवभूति ने दशरथ की इस पुत्री शान्ता का उल्लेख नाटक के प्रारंभ में किया महर्षि कश्यप का काल के समयों महर्षि कश्यप राजर्षि दिवोदास, भगवान् आत्रेय पुनर्वसु और में बहुत कुछ समानता है। वे प्रायः एक ही काल के थोड़े आगे-पीछे के उनके सम्बन्ध में जो वर्णन मिलते हैं वे परस्पर में प्रायः सम्बन्धित हैं। नीचे की युक्तियाँ इसे और स्पष्ट करेंगी-

श्यामकर्ण अश्व ढूँढ़ते समय पश्चिमोत्तर (वायव्य) दिशा में मरीचि कश्यप के आश्रम का परिचय दिया गया है, जहाँ वे रह रहे थे।

गालव काशिपति राजर्षि दिवोदास से दो सौ श्यामकर्ण घोड़े लाये थे । इस प्रकार गालव, कश्यप और दिवोदास समकालीन

मारीच कश्यप और आत्रेय पुनर्वसु का संवाद चरक और काश्यप संहिताओं में मिलता है।

गालव विश्वामित्र के शिष्य थे और सुश्रुत विश्वामित्र के पुत्र । राजर्षि दिवोदास ने गालव को विश्वामित्र के लिए दो सौ श्यामकर्ण घोड़े दिये थे तथा विश्वामित्र ने
सुश्रुत को दिवोदास के पास आयुर्वेद पढ़ने भेजा । सुश्रुत महापुरुष

आत्रेय पुनर्वसु, वाय्योविद राजर्षि, भेल वैदेह जनक, वृद्ध कश्यप, काङ्कायन, दारुवाह एवं मारीच कश्यप इन विद्वानों का वार्तालाप चरक-संहिता और काश्यप संहिता
दोनों में है।’ यह विचार-विनिमय इन महापुरुषों की समकालीनता प्रकट करता है। ऊपर के उल्लेख से यह ज्ञात होगा कि कश्यप उन उच्चकोटि के विद्वानों में रहे जो प्रथम श्रेणी के विचारक थे। वैदिक साहित्य में भी कश्यप के विचार सम्मानित हैं। कात्ययनीय ऋक्सर्वानुक्रम सूक्त में कश्यप तथा उनके गोत्र के अन्य विद्वानों के विचार हैं। वहाँ ‘जात वेदस्’ नामक एक हजार सुक्तों के ॠषि कश्यप ही कहे गये हैं। उक्त प्रसंग की व्याख्या करते हुए आचार्य षड्गुरु शिष्य ने कश्यप ॠषि का परिचय दिया है-यह मन्त्रदृष्टा ऋषि मरीचि के पुत्र कश्यप हैं। वृहद्देवता में भी उक्त एक हजार सूक्तों का दृष्टा कश्यप को ही लिखा गया है। आथर्वण सर्वानुक्रम सूक्त में भी यही बात प्रतिपादित हुई है। सायणाचार्य ने भी जातवेदस मन्त्र की व्याख्या में उसका ऋषि मारीच कश्यप को ही लिखा है। आज वे एक हजार सूक्त नहीं मिलते। हमारी उपेक्षा से काल-कवलित हो गये.
कुछेक ही प्राप्त हैं। महर्षि कश्यप के जो सूक्त मिलते हैं उनमें सोम नामक ओषधि का वर्णन है। संभव है उन विलुप्त हजार सूक्तों में इसी प्रकार ओषधियों और रोगों का विज्ञान होगा। ज्ञात होता है इसी महातन्त्र को वृद्ध जीवक ने महर्षि से प्राप्त किया होगा । चरणव्यूह आदि कुछेक प्राचीन ग्रन्थों में इन्हीं सूक्तों के आधार पर आयुर्वेद को कग्वेद का उपवेद कहा है। ‘काश्यप संहिता’ नाम के एक अन्य छोटे ग्रन्थ में भी इसी भाव का उल्लेख है। ऋग्वेद साहित्य में से महर्षि कश्यप के महान् इस ज्ञानकोष के विलुप्त हो जाने पर महर्षियों को वह ज्ञानकोष अथर्ववेद में सङ्कलित करना पड़ा। और तब से अथर्ववेद ही आयुर्वेद का आधार माना जाने लगा। ‘काश्यप सहिता’ में संहिता कल्पाध्याय का भी यही तात्पर्य प्रतीत होता है जिसमें लिखा है कि जीवक ने कश्यप के विशाल साहित्य को संक्षिप्त कर दिया था।

जो भी हो, यहाँ हम यह कहना चाहते हैं कि कश्यप का आविर्भाव उस युग में हुआ था जब ऋग्वेदादि संहिताओं का मौलिक सम्पादन हो रहा था, और महर्षिगण मन्त्रों में प्रतिपादित तत्त्वों के साक्षात्कार द्वारा ज्ञान की गूढ़ ग्रन्थि खोल रहे थे। आज उस काल की अंकों में गणना कर देना सरल काम नहीं है। यद्यपि अनिक विद्वानों ने गणना की है। किन्तु उसके विवाद में पड़ना उचित नहीं है। वह काल अब से दस हजार वर्ष से कम नहीं है। हमने लिखा है कि आत्रेय पुनर्वसु और मारीच कश्यप समकालीन हैं, क्योंकि दोनों ने एक-दूसरे को उद्धृत किया है। दोनों का विचार-विनियम दोनों संहिताओं में निबद्ध है । पुनर्वसु के पिता अत्रि और कश्यप के पिता मरीचि सगे भाई थे । मरीचि बड़े और अत्रि छोटे थे। ये दोनों महर्षि ब्रह्मदेव के पुत्र कहे जाते हैं। हमने पीछे मनु का उद्धरण दिया है। मरीचि और अत्रि के अतिरिक्त ब्रह्मदेव के क्रमशः अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम के पुत्र और थे। प्राचीन संस्कृत साहित्य में उनका वर्णन मिलता है। आत्रेय पुनर्वसु के वर्णन में सी. वी. वैद्य महोदय के आधार पर पुनर्वसु का काल ईसा से ढाई हजार वर्ष पूर्व है। इसलिए मरीचि कश्यप का काल भी वही ठहरता है। परन्तु अर्वाचीन ऐतिहासिक काल निर्णय-आनुमानिक ही होता है। उससे यथार्थ काल का परिज्ञान कम होता है। यह अवश्य ज्ञात होता है कि आधुनिक इतिहास का विद्यार्थी प्राचीन इतिहास में काल-परिज्ञान के लिए जिज्ञासु अवश्य है, अतएव वह प्रमाणों की खोज में रहता है। निर्णय किये गये कितने ही काल भूगर्भ और पुरातत्व ने खांडेत कर दिये।

नग्नजित और उसके ‘स्वर्णमार्गदः विशेषण के आधार पर ही पारस् के राजा दारायस के साथ मेल मिलाने, और आत्रेय पुनर्वसु को ईसा से पाँच सौ वर्ष पूर्व अनुमान लगाने वाले इतिहास-प्रेमी भी तो हैं। ऐसी दशा में सी. वी. वैद्य का अनुमान ही अच्छा है, जो उन्होंने ऐतरेय और शतपथ ब्राह्मणों में नग्नजितु को ढूँढ़ने के बाद स्थिर किया। इतना अन्वेषण करने के बाद उन्होंने इतिहास की परिधि की ओर कदम तो बढ़ाया। इस प्रयास के लिए हमें उनका आभारी होना चाहिए। महाभारत में आत्रेय पुनर्वसु और मारीच कश्यप का उल्लेख ‘पुराकल्प’ के रूप में किया गया है। अतीत की घटनाओं का अनेक नायकों से युक्त अनिर्दिष्ट तिथिक्रम उल्लेख ‘पुराकल्प’ है। यह उल्लेख सिद्ध करता है कि उक्त महर्षि महाभारत से भी बहुत पूर्व हुए थे। महाभारत का समय ही ईसा से तीन हजार वर्ष से प्राचीन सिद्ध है, तब इन महर्षियों का समय महाभारत से भी कई हजार वर्ष पूर्व स्वीकार करना चाहिए। आत्रेय पुनर्वसु की माता देवी अनसूया ने वन में राम और सीता का स्वागत किया था। अतएव कश्यम का समय भी राम के राज्यकाल में ही ठहरता है।

महाभारत का संग्राम द्वापर के अन्त में हुआ था, जिसका समय ईसा से तीन हजार वर्ष पूर्व है। आत्रेय पुनर्वसु ने अपने प्रवचनों में त्रेता युग तक का वर्णन किया है, इसलिए वे द्वापर के प्रारम्भ या त्रेता के अन्त में हुए होंगे। यदि हम द्वापर का समय 6 हजार वर्ष ही मान लें तो पुनर्वसु और कश्यप का समय ईसा से 6 हजार वर्ष से अवाचीन नहीं है। पृथ्वी के क्रान्ति परिभ्रमण और याम्योत्तर परिवृत्ति के आधार पर युगों की गणना होती है । यदि उस परिगणन शैली से उक्त समय निकाला जाएगा तो अधिक ही होगा, कम नहीं ।

हमने लिखा है मारीच कश्यप से भिन्न वृद्ध कश्यप भी दूसरे ऋषि थे। चरक संहिता के के ही वमन विरेचनीयाध्याय में उनका उल्लेख है। माधव निदान की मधुकोष व्याख्या में अनुसार वे मारीच कश्यप के समसामयिक और वयोवृद्ध थे। काश्यप संहिता वृद्ध कश्यप के उद्धरण हैं। सुश्रुत व्याख्या में आचार्य डल्हण ने कश्यप को है। महाभारत में एक बार शिकार खेलते हुए राजा परीक्षित ने मौन-व्रती शमीक ऋषि के गले में मरा हुआ सर्प डाल दिया। कुछ देर बाद शरमीक के पुत्र शृङ्गी ने आकर यह देखा तो वह अभिशाप देकर बोला कि मेरे पिता के गले में सर्प डालने वाले को एक सप्ताह में सर्प काट ले और उससे ही उसकी मृत्यु हो।

परीक्षित को ज्ञात हुआ तो अपने बचने का प्रबन्ध किया। किन्तु तक्षक नाग राजा को काटने के लिए चला। तक्षक एक ब्राह्मण वेश में था। इधर कश्यप राजा को बचाने के लिए चले। मार्ग में दोनों मिले । तक्षक ने कश्यप को धन देकर लौटा दिया। क्योंकि उद्धृत किया एक अन्य काश्यप चिकित्सक की कथा लिखी है। कश्यप ने तक्षक के विष से सूखे वृक्ष को हरा-भरा कर दिया, इसलिए कश्यप को लौटाना ही एक उपाय था, ताकि तक्षक सफल हो सके। तक्षक फल में कीड़ा बनकर राजा के खाने वाले फलों में बैठ गया। राजा ने ज्योंही फल काटा, तक्षक ने उग्र रूप लेकर काट खाया। परीक्षित की जीवन-लीला समाप्त हो गई। महाभारत में वर्णित यह कश्यप वृद्ध कश्यप और मारीच कश्यप से भिन्न हैं।

वाग्भट ने अष्टांग-हृदय में ‘बालामय प्रतिषेधाध्याय’ में कश्यप और वृद्ध कश्यप नाम से भिन्न-भिन्न दो प्रयोग लिखे हैं। उन योगों में जो योग वृद्ध कश्यप नाम से लिखा है वह उपलब्ध काश्यप संहिता में नहीं मिलता । किन्तु जो योग कश्यप के नाम से लिखा है। वह ‘काश्यप संहिता’ में प्रकारान्तर से मिलता है। इसी प्रकार बालकों की भूतबाधा निवारणार्थ जो ‘अभय घृत’ प्रयोग ‘काश्यप संहिता’ में है वही वाग्भट ने अपने शब्दों में लिखा है। सम्भव है विष-निदान की मधुकोष व्याख्या में जो उद्धरण है, वह उन कश्यप के रचे हुए किसी ग्रन्थ का हो जो परीक्षित को विष से मुक्त करने जा रहे थे वह ग्रन्थ अब प्राप्त नहीं होता। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि विषवैद्य कश्यप वृद्ध कश्यप और मारीच कश्यप से भिन्न और पीछे के हैं।

महर्षि पाणिनि ने भी अपनी अष्टाध्यायी में कश्यप का नामोल्लेख किया है तथा तैत्तिरीय संहिता में कश्यप को शिल्पाचार्य के रूप में स्मरण किया गया है। यह दोनों वैय्याकरण और शिल्पाचार्य कश्यप एक हैं या भिन्न-भिन्न, यह कहना भी कठिन है। दोनों के अभिन्न या भिन्न होने का प्रामाणिक आधार होना चाहिए। एक ही कश्यप वेद, ब्राह्मण और आयुर्वेद में मिलते हैं। किन्तु आयुर्वेद में ही अनेक कश्यप और काश्यप हैं। पाँच कश्यपों का उल्लेख हमें मिला है-
वृद्ध कश्यप मारीच कश्यपविषवैद्य कश्यप (परीक्षित-कालीन) वैय्याकरण कश्यप शिल्पी कश्यप। ऊपर के तीन कश्यप काल-भेद से भिन्न-भिन्न हैं। वैय्याकरण और शिल्पी कश्यपों
का परिचय अभी संदिग्ध है।

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