अगस्त्य मुनि से क्या सीखें ?

अगस्त्य मुनि से क्या सीखें ?

अगस्त्य मुनि या सप्तकऋषियों में से किसी भी दूसरे को तैयार करने का सबसे खास पहलू है- उनकी साधना। उनका पूरा जीवन तैयारी और सिर्फ तैयारी में गुजरा। कहा जाता है कि उन्होंने चौरासी साल साधना की। चौरासी साल का समय इंसानी सिस्टम और ब्रह्मांड की प्रक्रिया के लिहाज से बहुत मायने रखता है। एक इंसान के साथ जो कुछ भी किया जा सकता है, उन्होंने उन सभी प्रक्रियाओं को पूरा किया। उन्होंने इंसानी सिस्टम के सभी चौरासी पहलुओं को छुआ, उन पर काम किया और खुद को तैयार किया। सवाल उठता है कि आदियोगी शिव को असली शिक्षा देने में कितना समय लगा ? इसकी जो संख्या है, वह वास्तविकता से ज्यादा प्रतीकात्मक है। हो सकता है कि इसमें बारह महीने लगे हों, बारह साल लगे हों या फिर एक सौ चवालिस साल लगे हों। यह हमें नहीं पता। लेकिन जो कुछ भी पता लगाया या खोजा जा सकता था, वो सब सिर्फ इन सात लोगों के द्वारा किया गया। इस काम के लिए तो आदियोगी शिव ने पार्वती को भी मना कर दिया था ।

What to learn from Agastya Muni?
What to learn from Agastya Muni?

हालांकि आदियोगी ने पार्वती को इसका अनुभव तो लेकिन उन्होंने इसका विज्ञान पार्वती को नहीं दिया। क्योंकि आदियोगी को उनमें तैयारी का वो स्तर नहीं दिखा। उनको इन सप्तऋषियों में ग्रहण करने की जबरदस्त काबिलियत नजर आई, इसलिए करवाया, उन्होंने सबकुछ उनके साथ साझा कर दिया। उन्होंने समूचे ज्ञान को सात भागों और सोलह तरीकों में बांटकर उन्हें सिखाया । उसके बाद उन्होंने उन सब की अंतिम परीक्षा ली, जिसमें उन सब ने वे सोलह तरीके आदियोगी को ही समर्पित कर दिए, जो उन्हें आदियोगी से मिले थे। अपनी परम के प्रति इन सातों ऋषियों की तैयारी, ध्यान व एकाग्रता इतनी जबरदस्त थी कि इतने सालों बाद उन्हें जो कुछ भी मिला था, वे उस सब को छोड़ने के लिए तैयार थे।

दूसरे शब्दों में, यह सारी कथा बताती है कि सप्तऋषि आकाश से नहीं टपके थे। उनके जन्म के समय भी ऐसा कुछ खास नहीं हुआ था- न कोई नया तारा निकला, न आसमान में गड़गड़ाहट हुई थी। बेहद सामान्य तरीके से सबका जन्म हुआ। किसी को यह भी जानकारी नहीं कि भारत में उनका जन्म कहां हुआ था। किसी औरत ने किसी मामूली सी जगह पर उन्हें जन्म दिया होगा। वे लोग स्वर्ग से नहीं आए थे, उन्होंने खुद को यहीं तैयार किया था। यानी इससे कोई फर्क नही पड़ता कि आप कौन हैं, आप कैसे पैदा हुए, आपके माता-पिता कौन थे, आपके
कर्म किस तरह के हैं, अगर आप इच्छुक हैं तो आप खुद को बना सकते हैं। यहां तक कि जंगल के सबसे बड़े पेड़ ने भी खुद ही अपने को तैयार किया होगा। आज हम विशालकाय पेड़ को बेहद हैरानी से देखते हैं, लेकिन महज कुछ साल पहले यह एक नन्हा सा पौधा रहा होगा। आप जरा सोचकर देखिए कि पिछले साठ सालों में इस पेड़ ने अपने अस्तित्व के लिए कितना संघर्ष किया होगा। विनाशकारी जंगली जीवन, कभी सूखा मौसम, धूप व पानी पाने के लिए साथी पेड़ों से संघर्ष, वह किन-किन हालातों से होकर गुजरा होगा। क्योंकि उनके लिए खाना थाली में परोसकर सामने नहीं आता। उनके लिए यह एक अभूतपूर्व साधना है। आज हम मुंह- बाये हैरानी से उन्हें ताक रहे हैं। इसी तरह से हमें अगस्त्य व अन्य सप्तऋषियों को मुंह-बाये हैरानी से देखना होगा, क्योंकि ये इंसान, आम इंसानों जैसे लगते ही नहीं हैं। ये लोग बेहद खास लगते हैं और इन्होंने खुद ही अपने को बनाया है।


आखिर उन्होंने कैंसे काम किया होगा? उनकी यह तैयारी ही उनके।व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था। उन्हें तैयारी के लिए चौरासी जन्म भी लेने पड़ते, तो वे इसके लिए भी तैयार थे। चलिए हम मान लेते हैं कि अगस्त्य मुनि यहां के एक स्थानीय गांव में पैदा हुए थे। वह आदियोगी शिव को पाने के लिए हिमालय चले गए। आपको क्या लगता है कि गांव वाले अगस्त्य के बारे में क्या बात कर रहे होंगे? क्या आपको लगता है कि वे लोग अगस्त्य मुनि के माता-पिता से उनकी तारीफ कर रहे होंगे कि ‘अरे आपका बेटा तो एक महान संत बन गया!’ नहीं। उन्होंने उनके माता-पिता का मजाक उड़ाया होगा, अरे आपका मूर्ख बेटा कहां है अब?’ अगर वह कई सालों बाद वापस भी आए।होंगे, तो क्या आपको लगता है कि वे उन्हें देखकर।रोमाचिंत व उत्तेजित हुए होंगे कि वह हिमालय गया और आदियोगी शिव से मिलकर वापस आ गया नहीं, वे लोग उसे देखकर हंसे होंगे कि देखो यह बाघ की खाल पहनकर वापस आ गया और देखने में बिलकुल जंगली जीव सा लग रहा है! आज भले ही हम ऐसे लोगों को मुंह बाए हैरानी से देखें, लेकिन उनके अपने समय में इसकी कोई अहमियत नहीं थी। इसके लिए उन्हें कोई पहचान या सराहना नहीं मिलती थी। किसी ने उनके लिए तालियां नहीं बजाई। हर किसी को लगा होगा कि वह बेकार व्यक्ति है, जो अपने माता-पिता को छोड़कर चला गया। इन सारी परिस्थितियों के बीच वह अपने मार्ग से डिगे नहीं, बह बस अपनी राह पर चलते गए, चलते गए। एक बात थी कि उनकी दिशा तय थी, दूसरी यह कि चाहे कुछ भी हो जाए, उन्होंने कृपा में जीने और अपने काम से पीछे न हटने का रास्ता चुना।।

Leave a Comment

error: Content is protected !!